The tale of a dog ……… Daisy की कहानी भाग 2

The tale of a dog ……… Daisy की कहानी भाग 2

नए घर में वो बात न थी ।
सबसे पहले तो माँ न थी । हालांकि माँ तो पहले ही छिन गयी थी , जब से युग आया था ।पर फिर भी इतना संतोष तो रहता था कि वो आसपास ही हैं । उनकी गंध तो मिलती रहती थी । आवाज़ भी सुनाई देती थी ।
अब बेशक उनके कमरे में जाने की इजाज़त न थी ……. फिर भी वो ऊपर आती थीं ……. रोज़ाना …… खाना खिलाने …… दुलारने पुचकारने ।
पर नए घर में आयी तो माँ पीछे छूट गयी ।
पर नए घर में भी उसने जल्दी ही adjust कर लिया । यहां भी , उसे अंदर घर में आने की इजाज़त न थी । खाना समय पे मिल जाता था । पर न कोई बात करने वाला था , न कोई दुलारने पुचकारने वाला ……. न कोई बाहर घुमाने फिराने वाला ……… नयी मालिकिन बहुत व्यस्त रहती थी । यूँ भी उसे और बहुत से काम थे , कुत्तों को पुचकारने के अलावा …….. सो उसी घर में मेरी पहली मुलाक़ात हुई Daisy से । बड़ी गुमसुम सी लगी । उदास सी । हम पहली बार मिले । हेल्लो हाय हुई ।
मैंने उसे सहलाया पुचकारा ……. उसने कोई ख़ास response न दिया ।
फिर मेरी पत्नी आयीं । मोनिका ।
Daisy जल्दी ही उनके साथ घुल मिल गयी ।
यूँ तो daisy को घर में घुसने की मनाही थी पर जैसे ही मोनिका घर आतीं , वो उसे घर में घुसा लेती । अपने साथ बैठा लेती । खूब दुलारती पुचकारती । सोफे पे भी अपने बगल में बैठा लेतीं । इस तरह मोनिका के साथ daisy की घनिष्ठता बढ़ने लगी । पर Daisy की ये मौज तभी तक रहती जब तक मोनिका रहतीं । उनके जाते ही तुरंत बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता ।
साल में तीन चार बार ऐसा होता कि हमारी बहिन जी पहाड़ों पे चली जातीं ……. कभी घूमने टहलने तो कभी विपश्यना करने ……..उस दौरान Daisy बिलकुल अकेली हो जाती । उन दिनों विभिन्न लोगों की duty लगायी जाती कि वो पीछे से आकर एक ताला बंद gate के उस पार Daisy के लिए कुछ बिस्किट या bread फेंक देते ……. वहाँ एक नलके के नीचे एक बाल्टी में बूँद बूँद कर टपकता पानी ……. और उस तनहाई में जेल काटती Daisy ।
सच कहूँ तो वो दो तीन साल Daisy के जीवन के सबसे बुरे दिन बीते । अकेले ……. तन्हां …….
हालांकि इस बीच पन्ना दीदी अक्सर मिलने आती रहती थीं ……. और उन्हें देख के हर बार Daisy ऐसे मिलती …….. छाती पे चढ़ जाती ….. रोती …… उन्हें चूमती चाटती …….. पर ये सुख कभी कभार ही नसीब होता ……. महीने दो महीने में कभी एकाध बार …… सच बताऊँ तो उन दिनों मुझसे Daisy का ये कष्ट देखा न जाता था । मेरा मन करता कि मैं इसे इस अकेलेपन से , इस उपेक्षा से , इस कष्ट से हमेशा के लिए दूर कर दूं …….
खैर किसी तरह समय बीतता गया ।
3 -4 साल इसी तरह निकल गए ।

फिर एक बार ……… गर्मियों की बात है । जून का महीना था । हम दोनों पति पत्नी का प्रोग्राम बना , मनाली जा के वहाँ AVIMAS मने Atal Bihari Institute of Mountaineering and Allied Sports में जा के Basic Mountaineering Course करने का । एक महीने का course था । seats बुक करा ली गईं । जाने की तैयारी हो गयी । ऐन मौके पे न जाने क्या हुआ कि मेरा प्रोग्राम रद्द हो गया और मेरी जगह मेरी बेटी नंदिनी का जाना तय हुआ ।
मने अब माँ बेटी जाएंगी ……. basic mountaineering करने ।
शाम के चार बज रहे थे । 5 बजे की बस थी ।
तभी नंदिनी ने कहा ……. मौसी आप भी चलिए न ?
और मौसी झट से तैयार ।
पर फिर ख़याल आया …….. Daisy ?
वो कहाँ रहेगी ? उसकी देखभाल …… उसको कौन रोटी डालेगा पीछे से ?
मैंने मौसी से पूछा …….. you wanna go ? If you have to go …… Go …….
Daisy मेरे भरोसे ।
इत्तेफ़ाक़ से मैं उन दिनों अपने दोनों बेटों के साथ पटियाला में रहता था ……. अखाड़े में ।
मैंने इन तीनों मने माँ बेटी और मौसी को तो बस में चढ़ा दिया मनाली के लिए और Daisy को गाडी में लाद के पटियाला ले आया ……… अखाड़े में ……..
और यहां से Daisy के जीवन का एक नया अध्याय शुरू हुआ ।

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