उम्मीद है कि आज शाम तक सुलह हो जायेगी ।

चुनाव आयोग ने ऊपी का चुनाव कार्यक्रम घोषित कर दिया है ।
पहला वोट 11 फरवरी को पडेगा ।
इधर चुनाव आयोग dates declare कर रहा था उधर मुलायम अपने बेटे कलेस को समझा रहे थे कि बेटा मान जाओ नहीं तो साइकिल से उतर के पैदल हो जाना पड़ेगा ।
इधर कुछ लोगों ने दोनों बाप बेटा को समझा दिया है कि भैया ……. जादो जी लोग ……. दो नाव या दो घोड़े की सवारी करने वाले सवार की गाँड फट के flower हो जाया करती है ।
तुम दोनों तो अपने अपने रास्ते चले जाओगे पर हम मने cadre कार्यकर्ता और भोटर ……. हमारा क्या होगा । अबे तुम दोनों के चक्कर में फटेगी तो हमारी ।
उधर आजमखान ने समझाया बतावें कि अगर सपा बँटी और कमजोर हुई तो मुसलमान भोटर तुमको लात मार भेनजी की गोदी में जा बैठेगा ।
मुसलमान 2014 का खार खाये बैठा है । लोस चुनाव में मोदी ने ऐसी मारी बिना तेल के कि अब तक सहला रिये हैं भाई जान । आपको याद होगा कि 2014 में एक भी मुसलमान सांसद UP से जीत के नहीं गया । मुसलमान जानता है कि बँटा तो कटा ………
दोफाड़ सपा मने बसपा को फायदा । इसीलिए मुल्लायम आखिरी कोशिश कर रहे हैं और समझ अखिलेश भी रहे हैं ।
और इस खतरे को समझ भाजपा भी रही है ।
भाजपा शुरू से ही मुलायम और उनकी सपा को मुसलमानों के खिलाफ एक safety valve के रूप में इस्तेमाल करती आई है । मुलायम और मुसलमान का रिश्ता बड़ी प्यार मुहब्बत का रहा है । दोनों 69 में रहे । मुलायम इनको lollypop देते रहे चुसाते रहे । मुसलमान समझ ही न पाए आज तक कि lollypop चूस के आज तक कोई मोटा न हुआ । कड़वा सच है कि मुलायम ने कभी मुसलामानों को बढ़ने न दिया ……. तरक्की की सीढ़ी चढ़ने न दिया ……… हमेशा appeasement का lollypop चुभलाते रहे ।
इधर मुलायम कलेस दोनों जानते हैं कि वो तो हार ही रहे हैं पर ऐसा न हो कि भैंसवती जीत जाए । यही सोच अहीर भोटर की भी है । BMW न आये बेशक भाजपा आ जाए ।

खबर है कि परदे के पीछे सुलह के प्रयास अमित शाह कर रहे हैं । दो फाड़ सपा की बजाय एक कमजोर सपा भाजपा को ज़्यादा मुफीद है ।

उम्मीद है कि आज शाम तक सुलह हो जायेगी ।

बहु कोणीय चुनाव में एक एक भोट माने रखता है

इस समय जब कि मैं ये पोस्ट लिख रहा हूँ , मुलायम सिंह के लखनऊ आवास पे सुलह का अंतिम प्रयास चल रहा है । शिवपाल और अखिलेश दोनों को आमने सामने बैठाया गया है ।
ये कहना बहुत आसान है कि पूरी पार्टी और सभी विधायक अखिलेश के साथ शिफ्ट कर गए हैं और अब वही असली समाजवादी पार्टी हैं ।
काश चुनावी लोकतंत्र में सब कुछ इतना ही सीधा , सरल और सपाट होता ।
माना कि चुनाव में पार्टी का बहुत बड़ा महत्त्व है ।
पर प्रत्याशी भी महत्वपूर्ण होता है ।
और तब जब कि पार्टी विभाजित हो दो फाड़ हो गयी हो तो प्रत्याशी का महत्त्व 100 गुना बढ़ जाता है । चुनाव में जब बहुकोणीय संघर्ष होता है तो एक एक भोट का महत्त्व होता है ।

आपको एक किस्सा सुनाता हूँ । बहुकोणीय संघर्ष में क्या होता है ।
2014 लोस चुनाव होने वाले थे । हमारे गाज़ीपुर लोस क्षेत्र से भाजपा के जुझारू नेता , अरुण सिंह जिन्हें राजनाथ का वरद हस्त था वो एक Gypsy ले के घूमने लगे थे । आश्वस्त थे कि टिकट पक्का है ।
ऐन मौके पे भाजपा ने टिकट मनोज सिन्हा जी को दे दिया और आहत अरुण सिंह बागी हो गए ।
उधर सपा ने डेढ़ साल पहले से बाँट दिया गया एक टिकट काट के शिवकन्या कुशवाहा को साइकिल पे चढ़ा दिया ।
हाथी पे कैलाश नाथ यादव सवार थे ।
उधर संभल से बाहुबली DP Yadav चले आये और मुख्तार अंसारी के समर्थन से चुनाव लड़ गए ।

Final result इस प्रकार रहा ।

Bjp(मनोज सिन्हा ) 3,06,000
SP ( शिवकन्या कुशवाहा ) 2,74,000
Bsp. (कैलाश जादो ) 2,41,000
Dp yadav ( मुख्तार अंसारी ) 59,000
Arun singh बागी 34,000

अब इस मुकाबले का विश्लेषण कीजिये ।
यादव 3 जगह बंटे । सपाई यादव शिवकन्या की झोली में , मौक़ा परस्त बिकाऊ यादव बसपा के कैलाश यादव की झोली में , progressive राष्ट्रवादी विकासवादी यादव मोदी लहर में बह के भाजपा की झोली में जा गिरे ( जी हाँ , 2014 में गाज़ीपुर में भाजपा को यादवों का बम्पर भोट मिला था ) .

कुछ गए गुजरे अहीर DP यादव के टुकड़े भी तोड़ते पाये गए ।
मुसलमान सपा और मुख्तार अंसारी में बंटे पर ज़्यादातर सपा में गिरे । कुछ 10 या 20 % मुख्तार अंसारी समर्थित DP जादो की झोली में गिरे ।
अरुण सिंह भाजपा के बागी हुए और 34,000 भोट का नुक्सान किये । मनोज सिन्हा ने बड़ी मुश्किल से 32,000 की लीड से चुनाव जीता ।

अब सुनिये …… DP Yadav न होते तो सपा जीत जाती ।
अरुण सिंह बागी न होते तो भाजपा के मनोज सिन्हा 70,000 के ठीक ठाक मार्जिन से जीतते ।
बसपा कैलाश यादव को टिकट न दे के अगर किसी अन्य जाति वाले को टिकट दे देती तो शायद सपा ये सीट 2 लाख के भारी अंतर से जीतती ।
अगर गाज़ीपुर से शिवकन्या कुशवाहा को टिकट न देती तो 90% कुशवाहा वोट भाजपा को मिलता पर अब 70 % से ज़्यादा शिवकन्या / सपा की झोली में जा गिरा ।

इस उदाहरण को ध्यान में रखते हुए सपा की वर्तमान कलह पे नज़र दौड़ाइये ।
अगर वाकई अखिलेश शिवपाल में सुलह न हुई तो शिवपाल भी 403 प्रत्याशी मैदान में उतरेंगे ।
हर सीट पे 2 – 4 सपाई ऐसे हैं जो पिछले 20 साल से दिन रात एक कर जमीनी राजनीति करते हैं और अपनी अपनी जाति बिरादरी समूह वर्ग धर्म में ठीक ठाक पकड़ रखते हैं । ऐसा कोई प्रत्याशी अखिलेश का बागी हो मुलायम सिपाल के आशीर्वाद से चुनाव लड़ जाए तो 10 – 20 या 50,000 वोट ले मारेगा ।
और दो बंदरों की लड़ाई में न जाने कौन सा तीसरा बन्दर बाजी मार जाए ।

सपा की लड़ाई असली है । जो तलवारें निकली वो भी असली हैं । जो खून बहेगा वो भी असली होगा ।
ऊपर से चाहे जो कहें , समझ अखिलेश और सिपाल दोनों रहे हैं ।
मोदी की आंधी नहीं सुनामी आएगी ये भी जानते हैं दोनों ।
इसीलिए सुलह का अंतिम प्रयास हो रहा है ।
पर कुछ भी हो …….. शिवपाल को राजनीति में relevent रहने ज़िंदा रहने के लिए इस बार अखिलेश का सूपड़ा साफ करना बहुत ज़रूरी है ।
इस चुनाव में शिवपाल के आदमी सरेआम भाजपा के लिए भोट मांगते गिराते दिखें तो मुझे ज़रा भी ताज्जुब न होगा ।
मैंने 2009 में इसी बनारस में कांग्रेसी अजय राय को भाजपा के मुरली मनोहर जोशी के लिए भोट गिरवाते देखा है ।