फ़ौज के ये अर्दली

कुछ साल पुरानी पोस्ट है पर सामयिक है .

अक्सर अखबारों में ऐसी खबरें पढने को मिल जाती हैं की  फलां फलां जगह पे बेटों ने बाप को पीट दिया या मार डाला …….सो लोग इसे , कलयुग है ……कह के पल्ला झाड लेते हैं ……सो अब खबर आयी  कि वहाँ दूर लेह लद्दाख में फ़ौज के जवानों ने अपनी पलटन  के अफसरों को दौड़ा दौड़ा के ……खोज खोज  के पीटा. आज सेना के एक प्रवक्ता का बयान आया है की घबराने की कोई विशेष बात नहीं है …..कोई सैन्य विद्रोह नहीं हुआ है ….बस यूँ ही थोड़ी तकरार हुई है . मैंने बीसियों साल फ़ौज को बड़े नज़दीक से देखा है ……….बहुत कुछ महसूस किया है ….पढ़ा है , लिखा भी है . अब सेना की लीडरशिप को ये मामूली सी बात लग सकती है पर ज़रा सोच के देखिये ……..मैंने जान बूझ के ये anology दी है …… बाप को पीट  कर बेटों को कैसा महसूस होता होगा ….या फिर बच्चों से पिट के बाप को क्या फील होता होगा …….क्या उनमे से किसी  को डूब मरने का ख़याल आता होगा ……..यकीन मानिए मुझे इस घटना से बहुत ज्यादा शर्मिंदगी हुई है ……..फिर मैंने शर्माते शर्माते इस घटना की  ज्यादा जानकारी जुटाई तो मुझे ये समझ आया की वहां लेह से कोई 120 किलोमीटर आगे  एक firing range पे सैन्य युद्धाभ्यास को अफसरों ने पारिवारिक पिकनिक में तब्दील कर दिया था और एक Major साब की धर्म पत्नी ने पतिदेव से अर्दली ( घरेलू नौकर ) की शिकायत की . सो साहब नाराज़ हो गए और उन्होंने उस सिपाही ….जवान ….अर्दली …..या घरेलू नौकर ( आप चाहे जिस नाम से बुला लें ) को पीट दिया ……फिर उसे फौजी अस्पताल भी नहीं जाने दिया की कही बात खुल न जाए ……..इसपे बाकी के जवान भड़क गए …..उनकी अफसरों से तकरार होने लगे जो जल्दी ही बढ़ते बढ़ते मारपीट में तब्दील हो गयी और बात यहाँ तक पहुँच गयी की जब कमांडिंग ऑफीसर ……कर्नल साहब ……आये , और सुनते हैं की उन्होंने जवानों का पक्ष लिया तो अफसरों ने उन्हें भी मारा और ये देख के जवान और भड़क गए और फिर उन्होंने पूरी रेजिमेंट  के अफसरों को खोज खोज के दौड़ा दौड़ा के पीटा ……… एक दम फ़िल्मी सीन हो गया …….

अब अर्दली की बात पे मुझे अपना बचपन याद आ गया …….तब जब हम फौजी माहौल में पल बढ़ रहे थे ….पिता जी फ़ौज में JCO थे ……हमारे घर  में भी एक अर्दली आया करता था ……बात है 1975 की ……..राम स्वरुप नाम था उसका ……घर का झाड़ू पोंछा साफ़ सफाई सब करता था ….बड़े मनोयोग से करता था ……..फर्श पे बैठ के पूरे जोर से घिस घिस के पोंछा लगाता था ….सब्जी भी काटता था ……..कपडे भी सुखाता था ……..उसका पूरा व्यक्तित्व ही घरेलू नौकर का था ……फिर पिता जी की अगली पोस्टिंग में एक नया अर्दली आया …वो एक स्मार्ट सजीला नौजवान था ……उसका अर्दली के रूप में काम करने का वो पहला अनुभव था सो वो असहज रहता था पर जल्दी ही वो इस काम में रम गया ……कुछ महीने बाद  उसे किसी अन्य अफसर के घर लगा दिया गया ………….फिर लगभग दो साल बाद एक दिन मुझे वो दिखा ….उसका पूरा व्यक्तित्व बदल गया था और वो  सजीला फौजी नौजवान एक घरेलू नौकर में तब्दील हो गया था ……फिर कुछ साल बाद एक बार हमारे घर एक नया अर्दली आया ……..और आते ही वो पिता जी के सामने पेश हुआ और सम्मान पूर्वक पर पूरी दृढ़ता से उसने कहा की वो किसी भी कीमत पे अर्दली ( घरेलू नौकर )  की ड्यूटी नहीं करेगा  .सो बिना किसी हील हुज्जत के उसे बदल कर एक अन्य अनुभवी अर्दली को लगा दिया गया …….

सो अब इस ताज़ा तरीन झगडे की शुरुआत भी एक ऐसे फौजी जवान से हुई जिसे ज़बरदस्ती जवान से नौकर बनाया जा रहा था और उसके प्रतिकार  कीवजह से इतनी बड़ी घटना हो गयी …….इस घटना  से मुझे एक और फौजी अर्दली की कहानी  याद आती है ….सिपाही जगमाल सिंह की …….जो वहाँ कारगिल युद्ध में कैप्टेन विजयंत थापर का अर्दली था और उस रात 28 जून की रात 17000 फुट पे उस बर्फीली चोटी पे सबसे पहले शहीद हुआ था  …..और फिर याद आती है उस फौजी अफसर की कहानी ……Capt विक्रम बत्रा की ……जो पूरे युद्ध में अपने जवानों से आगे आगे चला , ये कहता हुआ की तू पीछे चल ……तू बाल बच्चे दार है ……….जगमाल सिंह को वो गोली लगी जो विजयंत थापर के लिए चली थी और विक्रम बत्रा ने वो गोली खाई जो सूबेदार रघुनाथ सिंह के लिए चली थी ……..

फ़ौज के प्रवक्ता ने कहा है की मामूली सी घटना है ……… हो सकता है की वाकई मामूली सी बात हो , पर मुझे दुःख इस बात का है की जो मान दंड सिपाही जगमाल सिंह और Capt बत्रा ने स्थापित किये थे…. वहाँ उस रात कारगिल में ………उन्हें तहस नहस कर दिया गया उस शाम लेह में ……..

 

सुनते हैं की मारपीट के बाद तोपचियों की उस पलटन को लेह में न्योमा से हटा के वापस नीचे भेज दिया गया है

(हथियार सब जब्त कर लिए  हैं , और आबरू भी ) ………

उसी सड़क पे कुछ नीचे …….वहाँ द्रास में ……

संगे मरमर  के कुछ पत्थरों पे उन 542  शहीदों के नाम खुदे हैं ,

जो सुनते हैं की उन सुनसान , उजाड़ , बीहड़ पत्थरों को ,

पाकिस्तानी घुसपैठियों के कब्जे से छुडाने और इज्ज़त बहाल करने के चक्कर में मर मिटे ……….

और वहीं कुछ ऊपर , उस चोटी के ऊपर से , झांकती है वो पोस्ट……….

Batra top कहते हैं जिसे ………

वहाँ से साफ़ नज़र आती है वो सड़क , जिस से गुज़र के तुम्हे जाना है ……….

वहाँ से ज़रा जल्दी निकल लेना ………..

खाम खाह शर्मिंदगी होगी उन्हें ……….

 

 

 

 

फ़ौज में नया नया भर्ती हुए एक फौजी की कहानी ।

फ़ौज में नया नया भर्ती हुए एक फौजी की कहानी ।
मेरे बेटे के साथ के जिला गाज़ीपुर के कुछ लड़के , जो इसके साथ ही पहलवानी करते थे , जब धीरे धीरे जवान हुए तो उन्हें रोज़ी रोज़गार की चिंता सताने लगी ।
खिलाड़ियों के लिए बड़े सीमित विकल्प होते हैं । खिलाड़ी आमतौर पे लिख लोढ़ा पढ़ पत्थर होते हैं । उनके बस का नहीं कि कोई entrance exam पास कर नौकरी पा लें ।
ऐसे में ले दे के एक sports quota का ही आसरा होता है ।
सो हुआ यूँ कि आज से कोई 5 साल पहले गोंडा में senior national championship हुई तो वहाँ army और Navy के coaches 18 – 19 साल के लड़कों को खोज खोज के भर्ती का offer दे रहे थे ।
नन्हे के साथ का एक लड़का जो बड़ा बेहाल परेशान था , उसने army की एक regimental टीम में भर्ती होना स्वीकार कर लिया ।
हमने उसे बहुत समझाया …….. रहन दो पहलवान ……. तुमरे बस की ना है फ़ौज की नौकरी ……..
साले छुट्टा सांड की तरह खेत खलिहान सीवान में घूमने चरने की तुमको आदत है । फ़ौज की नौकरी तुमको जेल सी लगेगी । अभी कुछ दिन में रेलवे की तमाम vacancy निकलेगी गोरखपुर , मुग़ल सराय , बनारस और DLW में , रेलवे की नौकरी आसान है , तुमसे निभ जायेगी ।
पहलवान परेशान था । decision ले नहीं पाया । थाली में सजा के नौकरी मिल रही है । इसे छोड़ दूं और कहीं वो भी न मिले ? इस से भी जाऊं और वो मिले न ।
अंततः उसने Army ज्वाइन कर ली । इधर उसका फ़ौज में हुआ उधर हमारे पहलवान ने रेलवे join कर ली ।
पूर्वांचल में आजकल unemployed लड़कों की कोई पूछ नहीं matrimony बाज़ार में । हर बाप , चाहे उसकी बिटिया कितनी भी निकम्मी क्यों न हो , उसे दामाद सरकारी नौकर ही चाहिये ।
सरकारी नौकरों में भी , फौजी आखिरी पायदान पे हैं । ससुर जी चाहते हैं कि दामाद या तो राज्य सरकार या केंद्र सरकर में सिविल नौकरी में हो । अगर belt वाली job है तो फिर पुलिस में हो ……. थक हार के जब कोई न मिले तो फौजी ही सही …….
उधर बेरोजगार लौण्डों का भी यही हाल है । अगर एक लड़के के हाथ में आप दो appointment letter रख दें , एक फ़ौज का और दूसरा निगम के सफाई कर्मी का , तो 100 में 90 लौंडे सफाईकर्मी लग जाएंगे , फ़ौज में सिपाही न बनें ।
फिर भी मरा हुआ हाथी भी लाख का …….. सो पूर्वांचल के matrimony बाजार में फौजी भाई का भी ठीक ठाक भाव लग जाता है , मने लाख दो लाख रु नगद और कम से कम एक Bike तो मिल ही जाती है । हमारे पहलवान फौजी भाई को भी मिल गयी । दुलहनिया घर आ गयी ।
अब शुरू हुई असली समस्या । कल तक जिस नौकरी के लिए तरसता था अब वही नौकरी काटने को दौड़ती थी ।
बेरोजगार आदमी को साल भर पगार मिल जाए तो वो बेरोजगारी का सारा दर्द , सारे कष्ट भूल जाता है । हमारे फौजी भाई के साथ भी वही हुआ । घर बैठी नयी नवेली दुल्हन को छोड़ कौन जाना चाहता है बॉडर पे ? अब उसे भी फ़ौज की नौकरी में सौ खामियां दिखने लगी हैं । छुट्टी आता है तो वापस जाना नहीं चाहता । खाना अच्छा नहीं है । अफसरों की गुलामी करनी पड़ती है …….. इसके अलावा और 100 कारण है जिनके कारण वो फ़ौज की नौकरी नहीं करना चाहता ।
25,000 रु तो कैसे भी कमाया जा सकता है ।
फ़ौज की नौकरी नहीं करनी ।

आज जो अचानक बाढ़ आ गयी है सोशल मीडिया पे , फ़ौज और अर्ध सैनिक बलों के जवानों की …….. कोई कह रहा की खाना अच्छा नहीं और कोई छुट्टी का रोना रो रहा , किसी को फ़ौज की सेवादारी बहुत बुरी लग रही …….. ये सब वही लोग हैं जिनसे belt की नौकरी हो नहीं रही , वो जो बेरोजगारी का दर्द और दंश भूल गए हैं ……..

कड़वा सत्य ये है कि आज सेना में कोई नहीं रहना चाहता । सबको मुफ्त की पगार चाहिए , सुविधा सब चाहिए , पर काम न करना पड़े ………

फ़ौज के लिए ये अच्छे लक्षण नहीं ।

मुझे अपने बचपन का वो किस्सा याद आता है जब 1971 की लड़ाई अभी बस ख़त्म ही हुई थी ।
पिता जी की regiment कश्मीर के छम्ब ज्योड़ियां sector में posted थी । जम्मू से आगे अखनूर जिले में छम्ब और ज्योड़ियां नामक दो गाँव हैं जो पकिस्तान सीमा से लगते हैं । बताया जाता है कि 1971 में इस छम्ब sector में भीषण युद्ध हुआ था ।
जिस समय युद्ध चल रहा था , हम लोग मने परिवार पठानकोट में था और पिता युद्धभूमि में ।
मेरी उम्र 6 साल थी …….. 6 साल का बालक युद्ध की विभीषिका का अंदाज़ा नहीं लगा सकता ।
उसे नहीं मालूम कि उसका पिता किस दशा में है । जीवित लौटेगा या नहीं ।
पर माँ ने वो दिन कैसे बिताये होंगे , पता नहीं ।
पर मुझे वो दिन आज भी याद है जब पिता जी गए थे । उन्होंने माँ से कहा था , फ़िक्र मत करना , अगर मुझे कुछ हो गया तो ये राष्ट्र तुम्हारा ध्यान रखेगा ।
तब की सेना में और आज की सेना में तो जमीन आसमान का फर्क है । वेतन भत्ते सुविधाएं और ex gratia पेमेंट ……. हर चीज़ में सुधार है । 1971 में ऐसा नहीं था । तब सेना के शहीदों को लाखों करोड़ों रु और ये petrol pump और Gas agency नहीं मिलती थी …….. 62 की indo China war में तो सैनिकों के पास जूते तक न थे । फिर भी , मुझे याद है , पिता जी पूरे उत्साह के साथ , हँसते खेलते गए थे ।
कुछ दिन बाद , जब कि युद्ध विराम हो गया और सेनाएं barracks में लौट आईं , और जब कि सैनिक अपने परिवारों से मिलने को मचल रहे थे , सबको छुट्टी देना संभव न था , सो पिता जी के CO कर्नल अर्जुन देव खन्ना ने अपने फौजियों से कहा , अपने परिवारों को यहीं बुला लो ।
और रेजीमेंट से कुछ दूर , एक खुले मैदान में , टेंट गाड़ दिए गए ।
उन दिनों ये रेल लाइन सिर्फ पठानकोट तक ही थी । सो पठानकोट रेलवे स्टेशन पे Jawan Bus लगा दी गयी । हर रेल से उतरने वाली families को ले के गाड़ियां छंब जाती ।
मुझे वो यात्रा आज भी याद है ………. जब उस 3 Ton गाडी में बैठ के हम छम्ब पहुंचे । लगभग सारा दिन ही लग गया ।
माँ ने ढेर सारी पूड़ियाँ और पतीला भर सब्जी बना रखी थी । रेल से उतरने वाले परिवारों के लिए ।
मुझे आज भी याद है वो picnic जब हम सबने पेड़ के नीचे बैठ के पूड़ियाँ खायी थी । उस 3Ton के driver और डंडा Man ने भी …….. जी हां फौजी गाडी के ड्राइवर के साथ जो खलासी helper होता था उसे उन दिनों डंडा Man कहा जाता था …….. वो एक डंडा लिए रहता था और driver को दिशा निर्देश देता था ।
Regiment में सुबह दोपहर शाम को लंगर से खाना नाश्ता ले के गाडी आती थी , सभी परिवारों के लिए । दूध के लिए Milk Maid के condensed milk के डब्बे और milk powder के कनस्तर । अमूल मक्खन के डिब्बे …….. राशन की कोई कमी नहीं थी ।
समस्या ये आयी कि बहुत से परिवार जो दक्षिण से आये थे उनके पास कोई गर्म कपड़ा न था जबकि छम्ब में भीषण सर्दी पड़ रही थी । ऐसे में मोटे मोटे काले खुरदुरे फौजी कंबल ……..
इफरात राशन होने के बावजूद भोजन का स्वाद अच्छा नहीं था ।
मूल समस्या थी अच्छे cooks का आभाव ।
मुझे याद है कि माँ लंगर से आयी दाल सब्जी को फिर से छौंक लगाती थी ।
फौजी रोटी की सबसे बड़ी खासियत कि उसे झाड़ झाड़ के खाना पड़ता था ।
क्योंकि बेलते समय रोटी को सीधे सीधे आटे पे रख के ही बेलते हैं जिस से उसमे अत्यधिक सूखा आटा जिसे परथन लग जाता था ।
पर फिर भी मुझे याद है कि वो खाना स्वाद रंग रूप में 19 हो सकता था पर पौष्टिक पूरा था , quality और quantity में कमी न थी ।
मुझे बचपन का वो दृश्य भी याद है कि हर फौजी पलटन में एक सूअर बाड़ा होता था जिसमे सूअर पाले जाते थे और उन सूअरों की खुराक पल्टन के लंगर और mess की जूठन ही होती थी जो इतनी ज़्यादा होती थी कि 30 – 40 सूअर पल जाते थे ।
कहने का मतलब ये कि फ़ौज को राशन की कमी कभी नहीं रही ।
एक बात और …….. आज के फौजी और तब के फौजी में अंतर था ।
मेरे पिता जी 1964 में सेना में गए ।
ये वो समय था जब कि 62 का युद्ध बस हुआ ही था और उसमें china ने भारयीय सेना को बुरी मार मारी थी । सेना के पास साजोसामान की भयंकर कमी थी । जूते और Rifles तक न थीं । सेना बाबा आदम के जमाने की 303 Rifles से लड़ रही थी । ऐसे बुरे हालात में जबकि चीन ने भारत के 27000 वर्ग Km भूभाग पे कब्जा कर लिया था , सेना का मनोबल पूरी तरह टूटा हुआ था और नेहरू मरने वाले थे , पिता जी सेना में गए । अभी ट्रेनिंग अधूरी ही थी कि 65 का युद्ध छिड़ गया । उसके बाद 71 …….. तब का फौजी जान हथेली पे ले के सेना में जाता था ……..
अब तो मौज ही मौज है । 71 से ले के 90 तक तो पूरा समय शान्ति रही ।
इसके बाद इक्का दुक्का छोटे मोटे ops हुए ।
60 के दशक में लौंडा फ़ौज में भर्ती हो जाए तो घर परिवार में मातम छा जाता था ।
आज बाप लोग 5 लाख रु ले के जुगाड़ खोजते फिरते हैं कि लौंडा किसी तरह भर्ती हो जाए ।
पूरब में अब फौजी लौंडों को दहेज़ में car मिल रही है ।
आजकल फौजी barrack के आगे 4 -6 swift और Dezire खड़ी दिख जाती हैं ।
25000 वेतन भी हो गया है ।
न फ़ौज अब पहले वाली रही न फौजी ।
पहले सिपाही निपट अनपढ़ अंगूठाटेक होते थे । अब BA , MA आम बात है ।
अब का सिपाही देश के लिए जान देने नहीं नौकरी करने गया है ।
अब वो अपने को अफसर से कमतर नहीं समझता ।
जबकि पैदल सेना का ये चरित्र है कि हर हाल में अफसर के हुक्म का पालन …….. yes Sir …….. अपना दिमाग बिलकुल नहीं लगाना …….. साहब ने कहा कि मौत के मुह में कूद जा तो कूद गया ……. न कुछ सोचा न समझा …….. न दिमाग लगाया …….. खुद को झोंक दिया ……..
युद्ध भूमि में दिमाग लगाने वाले लोग ही भगोड़े होते हैं ।

ये जो सेना और अर्द्धसैनिक बालों के जवानों के वीडियो धड़ाधड़ आ रहे हैं उस से लगता है कि योद्धाओं ने दिमाग लगाना शुरू कर दिया है । अफसरों को Villain बना के पेश किया जा रहा है ।
जबकि सेना में मान्यता है कि फ़ौज में सूबेदार मेजर साहब और Commanding Officer पिता सामान होते हैं जो अपने बच्चों से ज़्यादा ख़याल रखते हैं अपने जवानों का …….. Col. अर्जुन देव खन्ना ने सारे नियम कानून ताक पे रख के families को ही युद्ध भूमि में बुला लिया था ………. ये अपने योद्धाओं के welfare की पराकाष्ठा थी ।

पर आज जैसे अफसर बनाम NCO का माहौल बनाया जा रहा है , ये फ़ौज के लिए ये अच्छे लक्षण नहीं ।

काबुल में सब घोड़े ही नहीं होंते । कुछ गधे भी होते हैं ।

कहावत है कि काबुल में सब घोड़े ही नहीं होंते ।
कुछ गधे भी होते हैं ।
फ़ौज में भी सब विक्रम बतरा नहीं होते । कुछ मनीष भटनागर भी होते हैं ।
बहरहाल फौजियों ने social media में अपने grievances के वीडियो बना के डालने शुरू कर दिए हैं । देश द्रोही मीडिया इन ख़बरों को चटखारे ले ले के दिखा रहा है ।
उधर सुनते हैं कि एक फौजी ने तो बाकायदा धरना भूख हड़ताल शुरू कर दी है ।
किसी फ़ौज के लिए इस से ज़्यादा भयावह स्थिति और नहीं हो सकती । फ़ौज में हुक्म उदूली की सज़ा dismissal होती है । इसके अलावा किसी किस्म की हड़ताल , धरना प्रदर्शन या भूख हड़ताल इत्यादि अक्षम्य अपराध माने जाते हैं । इस लगभग विद्रोह या Mutiny मान लीजिए ।

मीडिया को ऐसे issues की गैर जिम्मेदाराना reporting से बचना चाहिए ।
एक फौजी ने फ़ौज में अफसरों द्वारा अर्दली बनाने को ले के आपत्ति की है ।
इस अर्दली को ले के एक किस्सा आपको सुनाता हूँ ।

हमारे एक मित्र जो फ़ौज से रिटायर हो के आये थे उन्होंने ये किस्सा सुनाया । हुआ ये कि जब वो फ़ौज में थे तो एक बार अपने Major साहब के पास उनके बंगले पे कुछ फौजी जवान आये हुए थे और gate पे खड़े अपने साहब से बातें कर रहे थे ।
बगल वाला बँगला Air Force के एक Squadron Leader का था और वो घर शिफ्ट कर रहे थे । Air Force का truck आ के खड़ा हुआ और Sq. Leader साहब स्वयं truck से सामान उतारने लगे और उनकी पत्नी इस काम में उनका हाथ बंटाने लगी । इसी बीच कोई भारी सामान था उसे उतारना था । Sq Leader साहब ने अपने truck के driver से गुजारिश की कि थोड़ा हाथ लगा दे । वो एक दक्षिण भारतीय Air Man था । साफ़ नट गया । Sorry Sir , मेरी यूनिफार्म गन्दी हो जायेगी ।
हार के दोनों पति पत्नी स्वयं कोशिश करने लगे ।
Major साब से ये देखा न गया । उन्होंने अपने जवानों को ललकारा ……. क्या जवान ? अब यही होगा । चारों जवान लपक के truck पे चढ़ गए और 10 मिनट में पूरा truck खाली कर सामान घर के भीतर पहुंचा दिया ।
फिर मेरे मित्र जब रिटायर हो के आ गए और उनका बेटा जो मेरे स्कूल का student था , वो NDA मने National Defence Academy में भर्ती हो गया तो उन्होंने अपने बेटे को समझाया , भूल के भी Airforce या Navy में मत चले जाना । अफसर बनने का मजा सिर्फ Army में ।
Airforce और Navy में Air Man और Sailor अफसरों की सेवा में हाजिरी नहीं लगाते ।
Army का जवान साहब की सेवा में सर्वदा तत्पर रहता है । सिर्फ Army अपने अफसर को सेवादार या Orderly बोले तो अर्दली देती है ।
क्यों भला ?
इसका मर्म एक बार मुझे फ़ौज के एक कर्नल साहब ने ही समझाया ।
Navy और Airforce बड़ी साफ़ सुथरी forces होती हैं । उन्हें जमीन पे नहीं लड़ना । फ़ौज जमीन पे लड़ती है । धूल मिट्टी , कीचड़ , पानी , दलदल , बर्फ , जंगल पहाड़ रेगिस्तान , सांप बिछ्छू सबसे लड़ना है । जमीन खोद के trench में भी रहना। है और jungle में tent गाड़ के भी रहना है ……. मीलों पैदल मार्च करना है और hand to Hand combat भी करना है दुश्मन से ……. कभी barack में तो कभी totally Inhospitable terrain में भी रहना है ।
कभी घी में चुपड़ी खानी है तो कभी ज़िंदा रहने के लिए घास पात और सांप केकड़े भी खाने हैं ……. पहाड़ से खुरच के काई भी खानी पड़ती है कभी …….. वहाँ युद्ध के मैदान में कोई ढाबा restaurant नहीं खुला है । front पे जैसी भी कच्ची पक्की मिले पेट भर खाओ …… न पेट भर मिले तो आधा पेट खाओ ……… पर मुह से उफ्फ नहीं निकलनी चाहिए ।
फौजी बताते हैं कि फ़ौज में कभी बहुत अच्छा खाना मिलेगा तो कभी बहुत खराब ।
फौजी अफसरों के बारे में एक बात और ।
कारगिल युद्ध के शहीदों की सूचि उठा के देख लीजिए ।
सारे मने 90% शहीद जवान लड़के थे । 20 – 22 – 25 के ।
फ़ौज में जब भी कोई operation होता है ……. कहीं धावा बोलना है …… कहीं घुस के attack करना है …….. तो फ़ौज की टुकड़ी में एक JCO , कोई एकाध हवलदार होगा , 4 -6 सिपाही नायक लांस नायक होंगे ……. पर उनका नेतृत्व करेगा एक जवान लड़का ……. वो जो बस अभी IMA बोले तो Indian Military Academy से निकल के आया ही है …… कोई Lieutenant या कप्तान …….. वो सबसे आगे चलता है । वही सबसे आगे रहता है । वही सबसे पहले दुश्मन की मांद में घुसता है । तो नेतृत्व करता है । सबसे आगे उसी का सीना रहता है ।
अक्सर पहली गोली भी वही खाता है ।
और जनाब , सामने से 12 बोर के छर्रे नहीं LMG का burst आता है …….… आपके ऊपर कोई LMG का burst झोंक दे न , या LMG की गोली आपके बगल से निकल भर जाए न , तो सुना है कि अच्छे अच्छे जांबाज़ लोगों की पैंट गीली औ पीली हो जाए …….. ऐसे में वो 22- 24 साल का लौंडा जान हथेली पे ले के सबसे आगे चलता है । सबको हौसला देता चलता है ……..
ऐसे मुश्किल हालात में जीती है फ़ौज और इन्ही हालात से निपटने के लिए ही फौजी अफसरों को अर्दली मने सहायक देने की परंपरा शुरू हुई ।
महाभारत में भी ऐसा वर्णन है कि जब सूर्यास्त के बाद सेनाएं शिविर में लौट आतीं तो उनकी सेवा सुश्रुषा में कुछ लोग लपट जाते ।
शायद वही लोग सेवादार या अर्दली हुए । सेना एक ऐसा institution है जिसका सतत विकास हुआ और military Science भी इसी प्रकार Science के रूप में धीरे धीरे evolve हुई जिसमें कि हज़ारों हज़ारों सालों का अनुभव छुपा है । इसे यूँ हलके में खारिज नहीं किया जा सकता ।
अक्सर हम सेना को शांतिकाल में देख के उनका आकलन करने लगते हैं ।
पर इतना याद रखना चाहिए कि शांतिकाल में भी हर सेना battle ready होती है ।
सेना में अर्दलियों के दुरुपयोग और उनसे घरेलू काम कराये जाने कक शिकायतें अक्सर मिलती रहती हैं पर मेरा ये निजी अनुभव है कि हर किसी को अर्दली बना के नहीं भेजा जाता ।
1000 – 1200 लोगों की पल्टन में होते हैं 10 – 20 ऐसे जो इन्ही कामों के लायक होते हैं । कुछ लांगरी , कुछ धोबी नाई , कोई sweeper और कुछ सेवादार ।
फ़ौज में कभी भी किसी जांबाज़ किस्म के सिपाही को अर्दली ( घरेलू ) की ड्यूटी नहीं दी जाती ।
किसी को भी सेवादार भेजने से पहले बाकायदा पूछा जाता है ।
मुझे वो किस्सा भी याद है जब अम्बाला छावनी में वो फौजी पिता जी के सामने पेश हुआ और उसने कहा कि साहब मैं घरेलू सेवादार नहीं बनना चाहता और तत्काल उसकी duty बदल दी गयी थी ।
और वो राम स्वरुप भी याद है चंडीगढ़ में जो पूरे 2 साल बड़े मजे से हमारा सेवादार रहा ।
काबुल में सब घोड़े नहीं होते और किसो को जबरदस्ती न घोड़ा बनाया जा सकता है न गधा ।
फिर भी , फ़ौज में घरेलू सेवादार बनाने का सिस्टम तत्काल प्रभाव से बंद होना चाहिए ।

सेना और राजनीति

वादा 1 : 10 का था… 1 : 40 का नहीं…

जब हेमराज का सिर काट कर ले गए थे तो मोदी ने कहा था, एक के बदले दस सिर लेकर आओ.

जब लोकसभा चुनाव में प्रचार होने लगा तो मोदी ने कहा था कि घर में घुस कर मारूंगा और एक के बदले 10 सिर लेकर आऊंगा.

पिछले दिनों पाकिस्तानी सेना और घुसपैठिये शहीद मंदीप सिंह का सिर काट कर ले गए. तब राजनाथ सिंह ने कहा था कि इसका बदला लिया जाएगा.

यूँ युद्ध विराम उल्लंघन तो होते ही रहते हैं सीमा पर. छोटे हथियारों और बंदूकों से फायरिंग चलती ही रहती है.
पर मंदीप के कटे सिर का बदला लेने के लिए भारतीय सेना ने पहली बार Artillery Guns मने तोपों से हमला किया.

बताया जा रहा है कि 13 साल बाद भारतीय तोपें गरजी हैं. Artillery fire का मतलब होता है अर्जुन जैसे टैंकों और बोफोर्स जैसी तोपों से फायर….

इस फायरिंग में पकिस्तान की 4 चौकियां ध्वस्त कर दी गयी और 40 से ज़्यादा पाकिस्तानी सैनिकों के मारे जाने की खबर है. इसके अलावा घायलों की तो गिनती ही नहीं.

ये एक अकेले मंदीप के सिर का बदला है, जो मोदी ने लिया.

आर्मी चढ़ के मार रही है, घुस के मार रही है.

यही समस्या है.

विपक्ष को यही प्रॉब्लम है. उसको लगता है कि अब तो भाजपा के पक्ष में भारतीय सेना भी चुनाव प्रचार के लिए कूद पड़ी है.

जी हां…. फ़ौज अगर पाकिस्तान को मारती है, तो छाती मोदी की चौड़ी होती है.

ऊपर से शिवराज सिंह चौहान और मध्यप्रदेश पुलिस ने राहुल गांधी के कोढ़ में खाज कर दी.

मोदी पाकिस्तानियों को मार रहे, इधर मामा शिवराज ने सिमी का नंबर लगा दिया.

सिमी वालों की गुंडागर्दी से भोपाल जेल की पुलिस आज़िज़ आ चुकी थी.

सिमी आतंकियों ने जब जेल में गार्ड रमाशंकर की हत्या कर दी तभी मामा शिवराज ने कह दिया…. बस…. बहुत हुआ…. अब और नहीं.

ये 8 ज़्यादा गुंडागर्दी करते थे… चुन चुन के मारा… अब चिल्लाते रहो और कराते रहो जांच.

संदेश साफ़ स्पष्ट है.

ऐसे ही मारेंगे.

सीमा पार भी मारेंगे… घर में घुस के मारेंगे…

ज़रूरत पड़ी तो टैंक और तोप से मारेंगे, जेल से निकाल के मारेंगे, पहाड़ी पर चढ़ा कर मारेंगे, घेर के मारेंगे, ऐसे मारेंगे जैसे गाँव में पागल कुत्ता मारा जाता है.

समस्या ये है कि जनता तक ये संदेश साफ़ स्पष्ट पहुँच भी रहा है.

मोदी को वोट लेना आता है. सेक्यूलर(?) विपक्ष को यही खटक रहा है. मोदी तो सेना और एसटीएफ और एटीएस से भी चुनाव प्रचार कराये ले रहे हैं.

ये ओआरओपी का बवेला इसी लिए खड़ा किया जा रहा है. साज़िश ये है कि किसी तरह पूर्व सैनिकों को सरकार के खिलाफ खड़ा किया जा सके.