लंगड़े घोड़े युद्ध में नहीं उतारे जाते ।

एक मित्र हैं
Param Bhagwat …….
उन ने मेरी एक पोस्ट पे कमेंट किया है …….
मुलाहिजा फरमाएं ……..

टिकट बांटना पार्टी अध्यक्ष का अधिकार है, पर निष्ठावान कार्यकर्ताओं को छोड पांच साल सत्ता की मलाई खाने के बाद भाजपा मे आये, दलबदलूओं को टिकट देना कहाँ तक सही है, टिकट कम से कम दो साल पहले पार्टी ज्वाइन करने वालों को ही मिलना चाहिये, चुनाव के समय शामिल होने वालों को नही

देखो भैया , बड़ी कड़वी बात बोल रिया हूँ ।
चुनावी राजनीति में और युद्ध में सिर्फ एक लक्ष्य होता है ……
विजय ……..
By Hook or Crook ……. किसी भी कीमत पे …… विजय
जीतना जरुरी है ……..

ये धर्म युद्ध किताबी बातें हैं ……. युद्ध में धर्म और आदर्श और संस्कार और शराफत …… ये सब कुछ ना चलते ।

सिर्फ एक चीज़ का महत्त्व है ……. विजय ।

टिकट देते समय सिर्फ और सिर्फ एक बात देखी जाती है ……. Winnability .
उम्मीदवार जीतेगा या नहीं ।
टिकट उसको जो जीत के आये ।
अपनी तरफ से पार्टी टिकट सिर्फ और सिर्फ उसको देती है जो उसे लगता है कि सीट निकाल लेगा ।
बाकी यहां मोदी और अमित शाह कोई दान खाता , सदाव्रत और धर्म खाता खोल के नहीं बैठे हैं ।
और मोदी तो इतना निर्मोही कि वो तो अपने बाप कू बी ना दे टिकट ………

हमको तो जीतने वाला घोड़ा चाहिए …… फिर वो काबुल का होय चाहे काठियावाड़ का ………
लंगड़े घोड़े युद्ध में नहीं उतारे जाते ।

वो गन्दा सा सरदार

बात उन दिनों की है जब पंजाब में आतंकवाद अपने चरम पर था …….हम लोग पटियाला में रहते थे उन दिनों …….शाम 6 बजे curfew जैसी स्थिति हो जाती थी …….बसें बंद हो जाती थीं ……..सिख आतंकवादी सरे आम हिन्दुओं को बसों से उतार कर गोलियों से भून दिया करते थे …….कानून व्यवस्था एवं प्रशासन नाम की चीज़ नहीं रह गयी थी …..अदालतों ने आतंकवादियों के मुक़दमे सुनने बंद कर दिए थे क्योंकि न्यायाधीशों की कोई सुरक्षा नहीं रह गयी थी ……अखबारों ने आतंकियों के निर्देश पर उन्हें आतंकवादी न लिख कर खाड़कू लिखना शुरू कर दिया था ……….स्थिति बेहद निराशाजनक थी …….सो उन दिनों की बात है ……..
मेरी नई नई शादी हुई थी …….तभी खबर आयी की ज्योति के पिता जी को कल रात उठा के ले गए ……ज्योति यानी मेरी बहनों और पत्नी की एक अत्यंत घनिष्ठ सहेली जिनसे हमारा बहुत नजदीकी पारिवारिक सम्बन्ध भी था ………बड़ी बुरी खबर थी …….अब ये घटना थी मेहता चौक की …..मेहता चौक अमृतसर जिले का एक अंदरूनी इलाका था और भिंडरावाले का गढ़ था …….वहां का नाम सुन के ही रूह कांप जाती थी उन दिनों ………..खैर ,हम दोनों पति पत्नी चल पड़े बस से ……4 -5 घंटे का सफ़र था ……पूरी बस में सब सिख थे सिर्फ हम 4 -6 लोग हिन्दू थे …वैसे उन दिनों हिन्दुओं ने भी बाल दाढ़ी बढ़ा कर पगड़ी बांधनी शुरू कर दी थी ………पूरे रास्ते सड़क के दोनों तरफ सुरक्षा बालों ने पिकेट बना रखे थे और मशीन गन ले के बैठे थे …….माहौल में दहशत और आतंक था ……..सर्दियों के दिन थे ……..वहां पहुँचते पहुँचते शाम हो गयी …..जब हम बस अड्डे पर उतरे तो हालांकि धुंधलका था फिर भी बाज़ार बंद हो चुके थे …..अड्डा सुनसान था ….बस से कोई 8 -10 सवारियां उतरीं और न जाने कहाँ गायब हो गयीं ………..कोई रिक्शा नहीं था सड़क पर ….हम दोनों पैदल ही चल पड़े ………सुनसान सड़क पर अभी कुछ ही दूर गए होंगे की एक जिप्सी हमारे बगल में आ कर रुकी और उसमें से एक कड़कती हुई आवाज़ आयी …..कौन हो तुम लोग और इस समय सड़क पर क्या कर रहे हो ……..पुलिस की जिप्सी थी और उसमें एक डिप्टी एस पी बैठा था …हमने उसे पूरी बात बताई ……..उसने हमसे कहा अन्दर बैठो और हमें घर तक छोड़ दिया ……..

एक बड़ी सी राइस मिल की चार दीवारी पे बड़ा सा गेट था …..हम उसे खटखटाने लगे …..बहुत देर तक कोई हलचल न हुई …..अन्दर जीवन का कोई चिन्ह नहीं था ……..
अब हमें काटो तो खून नहीं ……..जाएँ तो जाएँ कहाँ ??????? वो जिप्सी भी जा चुकी थी ….खैर एक बार और गेट खटखटाया ………तो हलकी सी एक आवाज़ आयी ….कौन है ???? हमारी जान में जान आयी ……..मेरी पत्नी चिल्लाई ……..ज्योति …….फिर ज्योति गेट पर आयी और उसने गेट खोला …हम अन्दर आये ……..इतनी बड़ी सुनसान सी राईस मिल में ….अकेली लड़की …….मां पहले ही चल बसी थी ..अब बाप भी गया ……..
अन्दर पहुंचे तो एक आदमी बैठा था ………सरदार …..गन्दा सा …..
ये कौन है …..मैंने धीरे से पूछा ………
ओह ये सुखदेव अंकल है …….
कौन सुखदेव …कहाँ का अंकल ….ये कहाँ से प्रकट हो गया ……आज तक तो सुना नहीं था …….
बहुत सारे प्रश्न ले कर हम अन्दर पहुंचे …………
दुआ सलाम हुई …….रात भर रहे ……
वो अजीब सा आदमी ………..एक दम शांत ……..कोई हरकत नहीं ……
उसने हमें सिर्फ इतना कहा …आप लोग चिंता न करें ……मैं हूँ न ……
अब तो हमारी चिंता और बढ़ गयी ….
सुनसान घर में अकेली जवान लड़की ………और ये गंदा सा सरदार ……..
और उन दिनों तो हम हिन्दुओं के मन में सरदारों के लिए एक स्वाभाविक सी नफरत तो थी ही …………अकेले में पूछा अरे भाई ये है कौन …सो पता चला की किसान है कोई ……..इसका धान आया करता था कभी राईस मिल पर ………तो अब यहाँ क्या कर रहा है …….पता चला की ये भी हमारी तरह खबर सुन कर आया है …..तो हमने कहा इस से कह दो अब ये जाए ….क्योंकि अब हम लोग आ गए हैं …..पर वो बोला ……आप लोगों के बस का कुछ नहीं है ….और आप लोगों का यहाँ रहना भी सुरक्षित नहीं है सो आप लोग अब जाओ ………जल्दी निकलो और टाइम से अपने घर पहुँचो……..कल की तरह लेट नहीं होना ………जिस अधिकार से और रोब से उसने ये बात कही और ज्योति चुपचाप सुनती रही तो हमारे सामने अब कोई चारा भी नहीं था और हम हारे जुआरी की तरह चुप चाप निकल लिए ……
घर आये और सारी बात बतायी …….सब लोग चिंतित थे …….पर कोई कुछ कर नहीं सकता था ………खोज खबर लेते रहे ….ज्योति के पिता जी का कुछ पता न चला …..लाश तक न मिली ………
बीच बीच में खबरें आती रहीं ……..वो सरदार अब परमानेंट वहीं रहने लगा था ……..
मेरी माँ अक्सर परेशान होतीं …….बहनें चिंता करती …….सबका यही मत था की बेचारी अकेली अनाथ लड़की ….निरीह ,बेसहारा ….और उस अनजान सरदार के चंगुल में …..बाद में ये भी पता चला की वो किसी बैंक में काम करता है …सो हम सब यही कहते ….अरे बैंक में है तो जा के अपनी नौकरी करे …वहां क्या पड़ा है ………मां कहती …लड़की वहां बिलकुल भी सुरक्षित नहीं है ………देखना एक दिन मार देगा …सब कुछ हड़प लेगा ……..इतनी बड़ी राईस मिल है ……घर है …इतनी ज़मीन है ……..क्या उम्र है उसकी ………शादी ही क्यों नहीं कर लेता उससे ……..
अरे नहीं मम्मी अधेड़ है …होगा कोई 45 एक साल का …जवान लड़का है उसका ……..
अरे जवान लड़का है तो उसी से शादी करा दे ज्योति की …………
ऐसी तमाम चर्चाएँ चला करती थीं हमारे घर में ……और सब लोग पानी पी पी कर …..”उस गंदे से सरदार “को गरियाते थे ……….

खैर समय बीतता गया ……..हम लोग भी अपने अपने कामों में व्यस्त हो गए ………ज्योति को हमने उसके भाग्य के भरोसे छोड़ दिया ……….बीच बीच में उसकी खबर आ जाया करती थी …………..2 -1 साल बाद खबर मिली की वो ठीक है …….वो गन्दा सा सरदार अब भी वहीं रहता है ……..फिर यह भी पता चला की ज्योति ने वो राईस मिल जो बंद हो गयी थी फिर शुरू कर दी है …..अब वो उसे चलाती है और वो सरदार उसकी मदद करता है ………..फिर एक दिन ये खबर आयी की वो चलती चलाती मिल और वो सारी ज़मीन जायदाद उस सरदार ने बेच दी ………..ज्योति का कहीं कोई पता नहीं था ……..हम लोग मन मसोस कर रह गए ………मेरा भी ट्रान्सफर पटियाला से दिल्ली हो गया फिर कुछ महीनों बाद हम दिल्ली से अपने गाँव आ गए और सब कुछ पीछे छूट गया ………

10 एक साल बाद एक बार हम दोनों जालंधर गए थे और तभी मेरी पत्नी मोनिका को उसकी कोई पुरानी सहेली मिल गयी …..हमने बस यूँ ही पूछ लिया ………ज्योति का कुछ पता चला ???? तो वो बोली हाँ …अमृतसर में रहती है ….बहुत खुश है ….बहुत सुखी है ….एक बेटी है ……….सरकारी नौकरी करती है ………address ?????? एड्रेस का तो पता नहीं …पर हाँ इतना पता है की अमृतसर में रहती है ……अब इतने बड़े शहर में बिना पते के उसे खोजना संभव न था और न इतना टाइम था हमारे पास सो हम लोग वापस गाँव चले गए ……..हम तो उसे न ढूंढ पाए पर उसने हमें ढूंढ लिया कुछ साल बाद …….हुआ यूँ की मेरी बहन जो की एक नामी खिलाड़ी है सो किसी खिलाड़ी से उसने उसका पता ढूंढ कर फोन किया ………मेरी बहनें उस से मिलने गयीं ……फिर हम लोग भी गए ………..मिले जुले……. हाल चाल लिया …..उसके पति से मिले जो की एक बेहद खुशमिजाज़ .जिंदादिल आदमी है …बेहद स्मार्ट ……..सजीला जवान 6 फुटा ………उनकी बेटी बेहद ख़ूबसूरत …एकदम अपने बाप पे थी ……सो एकांत में हमने उससे सारा किस्सा पूछा और ये की ये श्रीमान जी कौन हैं ?????? कहाँ से मिले ………
वो सरदार कहाँ है …….
सुखदेव अंकल ???????? अरे वो ठीक हैं …………अभी कल ही तो आये थे …आजकल अपने गाँव रहते हैं ……नौकरी से retire हो गए हैं ……..और हम लोग सारी रात गप्पें मारते रहे …सुख दुःख होता रहा …और उस रात जो कहानी निकल के आयी वो कुछ इस तरह है ………

वो गन्दा सा सरदार……… कोई रिश्ता नहीं था उसका इस परिवार से …..मेहता चोक में एक बैंक में पोस्टेड था जहाँ ज्योति के पिता जी का bank ac था ….सो हलकी फुलकी जान पहचान थी ….कभी कभी चाय पीने आ जाता था …और गप्पें मारने ……..फिर उसका वहां से ट्रान्सफर हो गया ….और जब ज्योति के पिता जी का अपहरण हो गया तो वो हाल चाल लेने आया ………लड़की अकेली थी …कोई रिश्तेदार न था …सो उसने छुट्टी ले ली …और फिर वहीं रहने लगा ……..मिल के जो भी लेन देन थे उसने पूरे किये ……..लोगों से पैसा वसूला ….लोगों की देनदारियां निपटाईं ………सारा हिसाब किताब लड़की को समझाया ………बंद पड़ी मिल चालू कराई ……सारा धंधा लड़की को समझाया …….उन दिनों आतंकवाद से पीड़ित लोगों को सरकारी नौकरी दी जाती थी …..पर उसके लिए एड़ियाँ रगडनी पड़ती थीं ……सो तीन साल तक उसके लिए भाग दौड़ की….और अंत में ज्योति को सरकारी नौकरी स्कूल टीचर की दिलाई …….एक अच्छा सा लड़का ……बेहद शरीफ ….अच्छे परिवार का ……ढूंढ कर लड़की के हाथ पीले किये ……..इस बीच कई बार आतंकियों की धमकी आयी पर वो टस से मस न हुआ …..फिर सबकी सलाह से वो मिल और सारी जायदाद वहां से बेच कर अमृतसर में एक अच्छा सा मकान खरीद कर दिया ….बाकी के पैसे कायदे से लड़की को सुपुर्द कर दिए ……..
उन दिनों को याद कर के ज्योति रोती रही और वो सारे किस्से सुनाती रही ……..
हम भी नाम आँखों से सुनते रहे ………..

अब सुखदेव अंकल बैंक से retire हो गए हैं …दो बेटे हैं उनके ….दोनों विदेश में रहते हैं ……….और वो अकेले फरीदकोट में अपने गाँव में रहते हैं ……..अक्सर ज्योति से मिलने अमृतसर आते रहते हैं ……ज्योति उनसे कहती है की आप यहीं मेरे पास ही रह जाइए ….तो वो कहते है की नहीं बेटा …..बाप को बेटी के घर में नहीं रहना चाहिए ………..
वो गन्दा सा सरदार

भारत रत्न मरहूम उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ की मुफलिसी का सच ।

भारत रत्न मरहूम उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ की मुफलिसी का सच ।

आज से कुछ साल पहले जब कि उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ साहेब जीवित थे , और न सिर्फ जीवित थे बल्कि पूरी तरह fit थे , सक्रिय थे , एक दिन ये खबर आयी कि उस्ताद जी बेहद मुफलिसी में जी रहे हैं । रोटी के लाले पड़े हुए हैं । देश चिंता में डूब गया । कई जगह से इमदाद आने की खबरें आई । भारत सरकार भी सक्रिय हुई । भारत रत्न मुफलिसी में जी रहा ? आनन् फानन में संसद में उनके शहनाई वादन का कार्यक्रम रखा गया । बाकायदे 5 लाख का मेहनताना दिया गया ।
ये सब देख सुन मेरा माथा ठनका ।
मेरे कू बात समझ में न आयी ।
बिस्मिल्लाह खान जैसा super star मुफलिसी में जी रहा ? बात गले उतरती न थी ।
मैं उन दिनों जालंधर की हरिवल्लभ महासभा से जुड़ा हुआ था । ये महासभा हर साल शास्त्रीय संगीत की एक बहुत बड़ी conference बोले तो संगीत सम्मलेन कराती है जो लगभग 140 साल पुराना है ।
पलुस्कर भीमसेन जोशी रविशंकर लगायित कोई ऐसा गवैया न हुआ जो यहाँ न आया हो …….
मैं पहुंचा कपूर साब के पास जो महासभा के secretary हैं ।
मैंने पूछा गुरु क्या मामिला है ? की खाँ साहेब काहें मुफलिसी को प्राप्त हो गए जबकि यहां तो अदना सा नया लौंडा भी जो कि अभी classical संगीत में उभर रहा है वो भी एक performance के 30 हज़ार माँगता है और खाँ साब जैसे सीनियर तो 5 लाख के नीचे बात तक ना करते ……. आज जो सीनियर कलाकार है वो प्रति concert 5 लाख लेते हैं और एक महीने में 10 से 15 दिन बुक रहते हैं ……. तो इनको क्या पिराब्लम हो गिया ?
कपूर साब हल्का सा मुस्किया दिए ।
बोले , लो किस्सा सुनो ।
आज से कोई 10 साल पहले हमने एक बार खाँ साब को बुला लिया हरिबल्लभ में ।
एक लाख में तय था । सुबह पंजाब मेल से आना था । एक गाडी भेज दी स्टेशन पे ।
वहाँ से ड्राइवर का फून आया । sir एक गाडी से काम न चलेगा । पूरी bus भेजो ।
अबे कित्ते आदमी हैं ? हम ये मान के चल रहे थे कि साजिंदे मिला के 4 – 5 आदमी होंगे ।
ड्राइवर बोला अजी बीसियों हैं सब केना मेना चूंची बच्चा मिला के …….
अपना माथा ठनका । होटल में दो कमरे बुक थे । तीन और खुलवाये । एक एक कमरे में 5 – 5 जा घुसे । उस्ताद ने शहनाई जो बजायी , लोग अश अश कर उठे । भाव विभोर …… उस्ताद की उँगलियों में जादू था । तीन दिन जमे तहे उस्ताद सम्मलेन में पूरी फ़ौज के साथ । गाजे बाजे के साथ बिदा हुए ।
होटल का बिल आया तो माथा ठनका । तीन दिन का बिल यही कोई सवा लाख रु ……. क्या कहा ?
सवा लाख ? अबे दिमाग खराब है ?
अजी 25 आदमी थे । मुर्गे के अलावा कुछ नहीं खाते थे । जाते जाते 35 मुर्गे तो रास्ते के लिए pack करा के ले गए । उस दिन महासभा ने कान पकडे । फिर कभी नहीं बुलाया ।
मैंने पूछा 25 आदमी थे कौन जो उनके साथ पधारे थे । अजी उस्ताद जी के अपने एक दर्जन और उन एक दर्जन के आगे एक एक दर्जन ………
पर गुरु आज जितने ये star performers हैं इन सबने अपने अपने बच्चे जीते जी stage पे set कर दिए ……. उस्ताद जी के लौंडों का क्या हाल है ?
अजी सब एक से बढ़ के एक निकम्मे । किसी को शहनाई पे हाथ तक रखना नहीं आता ।
दारू और भांग गांजे से फ़ुरसत होंय तो शहनाई पे हाथ धरे ।
शास्त्रीय संगीत है भैया । 20 – 20 साल तक लोग 10 – 15 घंटे रोज़ाना रियाज़ करते हैं तो कुछ लायक होते हैं । उसमें भी stardom बुढौती में मिलता है । पंडित जसराज को 55 साल हो गए stage पे परफॉर्म करते ।
और इस तरह उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ साहेब अपने दर्जन भर से ज़्यादा आवारा लौंडों और उनके आगे 10 दर्जन नाती पोतों का पेट भरने में अपनी सारी कमाई खर्च करते एक दिन उसी मुफलिसी में अल्लाह को प्यारे हो गए ।
उनके सबसे बड़े बेटे को मैंने सबसे पहली बार देखा 2014 में जब की भाजपा ने उनको बनारस में मोदी जी के पर्चा दाखिले में प्रस्तावक बनने के लिए आमंत्रित किया जिसे उन्होंने एक बार स्वीकार कर फिर मुस्लिम समाज के दबाव में ठुकरा दिया ।

फिर पिछले साल खबर आयी कि मरहूम उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ साहेब भारत रत्न की डुमरांव स्थित पुस्तैनी हवेली और जमीन पे कुछ बिहारी गुंडों बाहुबलियों ने कब्जा कर लिया ।
मचा जो बमचक ।
जांच हुई तो पता चला कि उस्ताद के सबसे बड़े बेटे ने खुद ही चोरी छिपे पूरे परिवार को अँधेरे में रख वो जमीन बेच खायी थी ।

फिर पिछले दिनों खबर आयी कि उस्ताद जी की चांदी जड़ी 4 शहनाइयां उनके पैतृक निवास से चोरी हो गयी । बनारस में फिर मचा बमचक ।
तब मेरे मुह से यूँ ही निकला …… अबे कौन चुराएगा ।
खुद बेच खायी होंगी सालों ने ।
आज खबर आयी कि STF ने बनारस में मरहूम उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ साहब भारत रत्न के पोते जनाब नज़र ए आलम साहब सुपुत्र जनाब काज़िम खाँ साहिब को दो jewellers के साथ गिरफ्तार कर चारो शहनाइयां बरामद कर लीं ।

काश उस्ताद जी ने किसी साक्षी महाराज type संघी की सलाह मान ली होती और 14 की जगह सिर्फ एक या दो पैदा किये होते तो ये नौबत न आती ।

The tale of a dog ……… Daisy की कहानी भाग 2

The tale of a dog ……… Daisy की कहानी भाग 2

नए घर में वो बात न थी ।
सबसे पहले तो माँ न थी । हालांकि माँ तो पहले ही छिन गयी थी , जब से युग आया था ।पर फिर भी इतना संतोष तो रहता था कि वो आसपास ही हैं । उनकी गंध तो मिलती रहती थी । आवाज़ भी सुनाई देती थी ।
अब बेशक उनके कमरे में जाने की इजाज़त न थी ……. फिर भी वो ऊपर आती थीं ……. रोज़ाना …… खाना खिलाने …… दुलारने पुचकारने ।
पर नए घर में आयी तो माँ पीछे छूट गयी ।
पर नए घर में भी उसने जल्दी ही adjust कर लिया । यहां भी , उसे अंदर घर में आने की इजाज़त न थी । खाना समय पे मिल जाता था । पर न कोई बात करने वाला था , न कोई दुलारने पुचकारने वाला ……. न कोई बाहर घुमाने फिराने वाला ……… नयी मालिकिन बहुत व्यस्त रहती थी । यूँ भी उसे और बहुत से काम थे , कुत्तों को पुचकारने के अलावा …….. सो उसी घर में मेरी पहली मुलाक़ात हुई Daisy से । बड़ी गुमसुम सी लगी । उदास सी । हम पहली बार मिले । हेल्लो हाय हुई ।
मैंने उसे सहलाया पुचकारा ……. उसने कोई ख़ास response न दिया ।
फिर मेरी पत्नी आयीं । मोनिका ।
Daisy जल्दी ही उनके साथ घुल मिल गयी ।
यूँ तो daisy को घर में घुसने की मनाही थी पर जैसे ही मोनिका घर आतीं , वो उसे घर में घुसा लेती । अपने साथ बैठा लेती । खूब दुलारती पुचकारती । सोफे पे भी अपने बगल में बैठा लेतीं । इस तरह मोनिका के साथ daisy की घनिष्ठता बढ़ने लगी । पर Daisy की ये मौज तभी तक रहती जब तक मोनिका रहतीं । उनके जाते ही तुरंत बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता ।
साल में तीन चार बार ऐसा होता कि हमारी बहिन जी पहाड़ों पे चली जातीं ……. कभी घूमने टहलने तो कभी विपश्यना करने ……..उस दौरान Daisy बिलकुल अकेली हो जाती । उन दिनों विभिन्न लोगों की duty लगायी जाती कि वो पीछे से आकर एक ताला बंद gate के उस पार Daisy के लिए कुछ बिस्किट या bread फेंक देते ……. वहाँ एक नलके के नीचे एक बाल्टी में बूँद बूँद कर टपकता पानी ……. और उस तनहाई में जेल काटती Daisy ।
सच कहूँ तो वो दो तीन साल Daisy के जीवन के सबसे बुरे दिन बीते । अकेले ……. तन्हां …….
हालांकि इस बीच पन्ना दीदी अक्सर मिलने आती रहती थीं ……. और उन्हें देख के हर बार Daisy ऐसे मिलती …….. छाती पे चढ़ जाती ….. रोती …… उन्हें चूमती चाटती …….. पर ये सुख कभी कभार ही नसीब होता ……. महीने दो महीने में कभी एकाध बार …… सच बताऊँ तो उन दिनों मुझसे Daisy का ये कष्ट देखा न जाता था । मेरा मन करता कि मैं इसे इस अकेलेपन से , इस उपेक्षा से , इस कष्ट से हमेशा के लिए दूर कर दूं …….
खैर किसी तरह समय बीतता गया ।
3 -4 साल इसी तरह निकल गए ।

फिर एक बार ……… गर्मियों की बात है । जून का महीना था । हम दोनों पति पत्नी का प्रोग्राम बना , मनाली जा के वहाँ AVIMAS मने Atal Bihari Institute of Mountaineering and Allied Sports में जा के Basic Mountaineering Course करने का । एक महीने का course था । seats बुक करा ली गईं । जाने की तैयारी हो गयी । ऐन मौके पे न जाने क्या हुआ कि मेरा प्रोग्राम रद्द हो गया और मेरी जगह मेरी बेटी नंदिनी का जाना तय हुआ ।
मने अब माँ बेटी जाएंगी ……. basic mountaineering करने ।
शाम के चार बज रहे थे । 5 बजे की बस थी ।
तभी नंदिनी ने कहा ……. मौसी आप भी चलिए न ?
और मौसी झट से तैयार ।
पर फिर ख़याल आया …….. Daisy ?
वो कहाँ रहेगी ? उसकी देखभाल …… उसको कौन रोटी डालेगा पीछे से ?
मैंने मौसी से पूछा …….. you wanna go ? If you have to go …… Go …….
Daisy मेरे भरोसे ।
इत्तेफ़ाक़ से मैं उन दिनों अपने दोनों बेटों के साथ पटियाला में रहता था ……. अखाड़े में ।
मैंने इन तीनों मने माँ बेटी और मौसी को तो बस में चढ़ा दिया मनाली के लिए और Daisy को गाडी में लाद के पटियाला ले आया ……… अखाड़े में ……..
और यहां से Daisy के जीवन का एक नया अध्याय शुरू हुआ ।

The tale of a dog ……. part 1

The tale of a dog

उसका नाम daisy था ।
जन्म उसका होशियारपुर पंजाब के एक मशहूर ब्रीडर के kennel में हुआ था ।
जालंधर के एक निःसंतान खानदानी रईस उसे खरीद लाये । साथ में उसका एक जोड़ीदार Sparky भी था । ये आज से कोई 13 साल पहले की बात है ।
ऐसा सुना है कि आज से 13 साल पहले यानी कि 2003 में ये dobberman जोड़ा शायद 60 या 70 हज़ार में खरीदा गया था ।
बाजार में दो किस्म के कुत्ते बिकते हैं । एक होते हैं pet क्लास ……. pet class मने सामान्य घर में पालने के लिए किसी भी नस्ल का pure bred …….. ऐसे pups नस्ल की डिमांड के अनुसार 2000 से ले के 8-10,000 तक के मिल जाते हैं ।
दूसरा प्रकार होता है Show क्लास ……. अर्थात वो pups जो बहुत मशहूर award winning dogs की pedegree केE होते हैं ……. वो जिनके parents ने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय Dog Shows में award जीते हैं । ऐसे माँ बाप का जब कोई litter आता है तो ये ज़रूरी नहीं कि उसमें हर पिल्ला Show class ही निकले । कुछ एकदम सामान्य भी निकल सकते हैं । और कुछ बेहद शानदार show class निकलते हैं ।
ऐसे Show Class pups को पहचानना भी कोई आसान काम नहीं । उसके लिए भी experts होते हैं । बड़े अनुभवी लोग …….. तो ऐसे ही एक breeder हैं होशियारपुर में ……. उनसे कहा गया कि एक शानदार जोड़ा हमारे लिए book करो । booking amount जमा हुआ । उसके करीब 3 माह बाद सूचना आयी …….. आपके pups तैयार हैं ……. ले जाइए ।
और इस तरह Daisy और Sparky होशियारपुर से जालंधर आ गए ……. राजन भाई और पन्ना दीदी के घर । पन्ना दीदी निःसंतान थीं । उनकी गोद में मानो दो बच्चे आ गए । और इस तरह Daisy और Sparky उनके घर में उनकी गोद में पलने लगे ।
राजन भाई ने पहले दिन से ही तय कर लिया था कि daisy को मातृत्व सुख नहीं देना है । इसलिए बहुत छुटपन में ही उसकी surgery करा दी गयी ।
धीरे धीरे दोनों पन्ना दीदी की गोद में बढे पले । पन्ना दीदी उन्हें अपने हाथ से गर्मा गर्म रोटियां बना के खिलाया करती दूध से । दिन रात का साथ । उन दोनों से उनका सम्बन्ध वही माँ बच्चों वाला ।
पन्ना दी तो यूँ भी ममता और वात्सल्य की मूरत हैं ।
दोनों pups जवान हुए , तो इतने खूबसूरत , कि देखने वाले देखते रह जाते । पंजाब में यूँ भी लोग शौक़ीन हैं । अच्छी महंगी pedegree वाले dogs पालने के शौक़ीन । लोग Daisy और Sparky को देखते तो देखते रह जाते ।

पर ईश्वर को कुछ और ही मंज़ूर था । शायद इन दोनों pups का ही पुण्य प्रताप था , या फिर इन दोनों के प्रति उमड़ा पन्ना दी का वात्सल्य उनकी ममता …….. एकदम अपने बच्चों की सी देखभाल लाड़ दुलार प्यार ……… और 48 – 50 साल की उम्र में उनके भीतर न जाने ऐसे कौन से hormonal changes आये कि उन्होंने इस उम्र में जबकि अधिकाँश महिलाओं को menopause हो जाता है , उन्होंने conceive कर लिया । 48 साल की आयु में उनकी कोख में संतान आयी ।
उनकी pregnancy बड़े कष्ट में बीती ……. एक एक दिन पहाड़ सा ……. ईश्वर भी न जाने कौन सी परीक्षा ले रहा था । कई बार तो ऐसा लगा कि miscarriage हो जाएगा ।
पर अंततः युग का जन्म हुआ । 50 साल की उम्र में बेटा हुआ ……. घर में दीवाली मनी ……. घर में चिराग रौशन हुआ …….. इधर Daisy और Sparky ……. दोनों लगभग 2 साल के हो चले थे …….. युग के आने से वो दोनों परेशान ……. ये कौन आ गया हमारी माँ की गोद में ……. अब ये दोनों लगे jealous फील करने ……. युग को देखें तो गुर्रायें …….. पहले जहां दिन रात पन्ना दी की गोद में घुसे रहते थे , वहाँ अब उनके कमरे में भी घुसने की मनाही ।
अब दोनों को नीचे से ऊपर पहुंचा दिया गया था ……… नवजात शिशु को infection का डर जो था ……… दोनों ऊपर से अपनी माँ को टुकुर टुकुर ताकते रहते ……. भौंकते गुर्राते । जिसमे Sparky कुछ ज़्यादा ही परेशान हो गया था । उसने बात दिल से लगा ली थी । एक दिन वो न जाने कैसे ऊपर से छुड़ा के नीचे आ गया …… बेहद violent हो गया …… ज़बरदस्ती कमरे में घुसने की कोशिश करने लगा …….. सब लोग घबरा गए ……. बच्चे की सुरक्षा को ले के चिंतित …….. ऊपर से dobberman नस्ल ……… ये सब कभी कभी अत्यधिक violent होने के लिए कुख्यात हैं ……. परिवार ने तय किया कि कुछ दिन के लिए दोनों को हटा दिया जाए । बच्चे की सुरक्षा से कोई रिस्क नहीं ।
Daisy और Sparky के लिए नए घर खोजे जाने लगे ।
Sparky तो गया दूर मोगा ……..
Daisy को मेरी साली साहिबा ले आईं । उनका राजन भाई और पन्ना दी के घर आना जाना था …… बड़े पारिवारिक घनिष्ठ संबंध थे ।
वहाँ मैंने daisy को पहली बार देखा ।
पूछा , इसे कहाँ से ले आयी ?
क्या करोगी इसका ?
जानती हो कुत्ता पालना कितना दुरूह दुष्कर कार्य है ? कितनी care करनी पड़ती है । कितना खर्चीला होता है ।
बहिन जी ने कंधे उचका दिए ।
Daisy को नया घर मिल गया था ।
पर इस नए घर में वो पुरानी बात न थी ।
नया घर अकेला सा था । सुनसान ……. यहां कोई जोड़ीदार भी न था । न कोई खेलने के लिए साथी न कोई बोलने बतियाने के लिए । और न कोई दुलारने पुचकारने वाला ……..

क्रमशः …….. Continued……..
लंबी कहानी है ……. सत्य कथा …… कई भागों में ख़त्म होगी
पढ़ते रहिये

मोलायम के पास क्या बचेगा ?

Godfather……. Mario Puzo की अनुपम कृति
Francis Ford Coppola की काल जयी रचना ……. विश्व फिल्म इतिहास की महानतम रचना ।

अमेरिका की 5 माफिया families की कहानी है जिसके केंद्र में है Don Corleone की family …….. जिसका Don है Vito Corleone …….. Don का रोल किया था Marlon Brando ने …….. और इस रोल ने उन्हें अमर कर दिया ।
कहानी कुछ यूँ है कि Don एक drug तस्कर Solozzo के साथ काम करने का प्रस्ताव ठुकरा देता । Solozzo को लगता है कि Don पुराने ख्यालों का है जबकि उसका बड़ा बेटा Sonny शायद काम करने का इच्छुक है । इसलिए यदि Don को रास्ते से हटा दिया जाए तो बात बन सकती है ।
Solozzo डॉन पे जानलेवा हमला करा देता है । घायल Don अस्पताल में भर्ती है । इधर Solozzo दुबारा हमला करने की फ़िराक में है ।
उधर Don का गिरोह Solozzo से बदला लेने की तैयारी कर रहा है ।
तय होता है कि Solozzo को सुलह के बहाने बुला के ठोक दिया जाए ।
जो सुलह की बात करने जाएगा वही ठोकेगा ……..
सवाल है कि आखिर सुलह की बात कहाँ होगी ? वो स्थान गुप्त है ……..
हमारी ओर से बात करने कौन जाएगा ?
Solozzo को स्थानीय Police Captain संरक्षण दे रहा है । उसके सामने ह्त्या कैसे होगी ?
कौन करेगा ?
गिरोह इन सवालों से जूझ रहा है ……..
तय होता है कि Don का सबसे छोटा बेटा Michael Corleone जो की इस माफिया गिरी के धंदे में नहीं है और एक War Hero है , वो जाएगा सुलह की बात करने और वही करेगा ह्त्या …….
अब प्रश्न है कि सुलह की बात कहाँ होगी और वहाँ तक हथियार मने Gun कैसे पहुंचेगी ।
Sonny अपने मुखबिरों से पता लगा लेता है कि सुलह की बात एक Italian Restaurant में होगी ।
हथियार पहुंचाने की ड्यूटी Clemenza की है …….
तय ये हुआ कि Michael जब बात करने जाएगा तो Police कप्तान उसकी तालाशी ज़रूर लेगा ।
Michael बिना हथियार के होगा इसलिए दोनों निश्चिन्त हो जायेंगे ।
Michael बियर पिएगा । थोड़ी देर बाद wash room जाएगा । वहाँ flush के पीछे एक पिस्तौल tape से चिपका दिया गया है । Michael wash रूम से वापस आते ही फायर झोंक देगा ……..
Sonny माइकल को समझा रहा है । डरना मत ……. घबराना मत …….
फिर Clemenza से कहता है ……. और पिस्तौल ……. पिस्तौल पहुंचाने की जिम्मेवारी तुम्हारी ……..मैं ये नहीं चाहता कि मेरा भाई वहाँ मूतने के बाद हाथ में अपना *** लिए वापस आये ………

Sonny: Hey, listen, I want somebody good – and I mean very good – to plant that gun. I don’t want my brother coming out of that toilet with just his dick in his hands, alright?

नमाजवादी कुनबे की इस लड़ाई में मुझे ऐसा लगता है कि कुछ दिन बाद जब मोलायम यादव बाहर निकलेंगे तो उनके हाथ में सिर्फ उनका ढीला ढाला *** होगा …….. पार्टी और भोटर तो अखिलेश ले उड़ेंगे ………

He’ll come out with just his limp Dick in his hand ……..

खड़े होना बहुत ज़रूरी है । खड़ा नहीं होगा तो मर जायेगा ।

जो लोग गाँव में रहे हैं या ग्रामीण पृष्ठभूमि से है उन्होंने ये दृश्य देखा होगा ।
शेष अपनी कल्पना से देख लें ।
गाँव में कोई पशु जब बीमारी या वृद्धावस्था से एकदम अशक्त हो जाता है तो बैठ जाता है ।
बार बार उठने की कोशिश करता है पर उठ नहीं पाता ।
खड़े होना बहुत ज़रूरी है । खड़ा नहीं होगा तो मर जायेगा ।
ऐसे में किसान दो चार आदमी जुटाता है और सहारा दे के पशु को खडा कर देते हैं ।
दो आदमी आगे से दो पीछे से और एक पूंछ पकड़ के उठाता है ।
अब आप सोचेंगे पूंछ पकड़ के कैसे उठा सकते है ?
पूंछ जहां पीठ से जुडी होती है , गुदा स्थान ज़े ठीक ऊपर …….. वो बहुत मज़बूत जोड़ होता है ।
जब तक वहाँ से जोर नहीं लगाएगा ……. पशु हो या मनुष्य …… खडा नहीं हो सकता ।
*** तक का जोर लगाना ……. ये कहावत यूँ ही नहीं बनी है ।
*** भीच के जोर न लगाओ तो कोई भी भारी काम हो नहीं सकता ……..
कोई जानवर उठने की कोशिश कर रहा है और आप अकेले हैं , उसकी मदद करना चाहते हैं …….
पूंछ पकड़ के थोड़ा सा सहारा दीजिये , खडा हो जाएगा ।

बचपन का एक किस्सा याद है मुझे ।
एक भैंस थी जिसे सहारा दे के उठाना पड़ता था । भैया आते जाते 2 – 4 लोगों को बुलाते । साथ में हम बच्चे लगते । भैंस खड़ी हो जाती । दो तीन हफ्ते ये सिलसिला चला । फिर वो मर गयी ।
अब उसे एक बैलगाड़ी में लाद के गाँव से दूर सीवान में पहुंचाना था …….. अंतिम यात्रा ।
उसके शव के पास गाड़ी लगाई । भैया आदमी जुटाने लगे । 10 एक आदमी हो गए । पर भैया बोले की 10 – 12 आदमी और जुटाओ । इतने से काम नहीं चलेगा ।
पर रोजाना तो हम 4 – 6 लोग ही मिल के इसे उठा लिया करते थे ?
आज 25 आदमी क्यों लगेंगे ?
क्योंकि तब ये जीवित थी । कितनी भी अशक्त थी पर जीवित थी ।
सच ये है कि तब भी वो अपनी ताकत से अपने प्रयास से अपनी इच्छाशक्ति से खड़ी होती थी ।
हम तो उसे सिर्फ हल्का सा सहारा दिया करते थे ।
पर आज ये मर चुकी है । She’s dead .
और मरा हुआ जीव बहुत भारी हो जाता है । बहुत बहुत भारी । तब उसे उठाना आसान नहीं होता ।
पूरा गाँव जुटाना पड़ता है ।

वो तो सिर्फ भैंस थी ।
हिन्दुओं ……. तुम तो हाथी हो । तुम मर गए तो पूरा गाँव मिल के भी न उठा पायेगा ।
crane मंगानी पड़ेगी ।

बंगाल से आज एक शुभ समाचार मिला । एक शुभ संकेत ।
TMC के हिन्दू कार्यकर्ताओं में एक undercurrent है । आक्रोश है ।
TMC के हिन्दू भोटर और कार्यकर्ता बेचैन हैं ।
उन्हें ममता बनर्जी का मुस्लिम तुष्टिकरण रास नहीं आ रहा ।

लोहा गर्म हो रहा है । इसे लाल करो ।
लाल लोहा ही shape बदलता है ।

Men’s empowerment

ऐ Md Shami ……..
अपनी बीबी से कहो कि परदे में रहे ।
ऐ Md Shami तुम ये जान लो कि
तुम्हारी बीबी तुम्हारी खेती है ( 2:223)
तुमरी बीबी तुमरी slave है ( 4:24 )
तुम ऐसी 3 ठो और लिया सकते हो ( 4:3)
तुम अपनी बीबी से superior हो और वो तुमसे inferior ( 2:228 )
तुम मर्द हो और मर्द की तुलना में औरत का हिस्सा आधा होता है ( 4:11 )
तुमरी बीबी की गवाही तुमसे आधी है ( 2:282 )
तुम जब चाहो उस से पिंड छुडा सकते हो ( 4:129 )
तुमरी बात न माने तो हलकी पिटाई कर सकते हो ( 4:34 )
ऐसी औरतें तो तुम जितनी मर्जी चाहो sex slave बना के रख लो (33:50 )

इसलिए ऐ Md Shami अपने अधिकारों को जानो और अपनी बीबी से कहो कि कायदे से रहे …….

शौक़-ए-दीदार अगर है तो नज़र पैदा कर

बहुत साल पहले की बात है ।
मैं और धर्म पत्नी …… हम लोग लखनऊ के चारबाग स्टेशन से बाहर निकल रहे थे ।
जैसा कि अक्सर होता है । स्टेशन से बाहर आते यात्रियों को Auto rikshaw और Taxi वाले टोक के पूछ लेते हैं …… Auto Rikshaw Sir ?
एक दो को तो मैंने बर्दाश्त किया । फिर जब तीसरा आया तो उसे मैंने बड़ी बेरहमी से झिड़क दिया ।
हम थोड़ा आगे बढे । तो इन्होने पूछा ……. इतनी जल्दी नाराज क्यों हो जाते हो ?
Disturb करते हैं साले ……..
रात के 11 बजे ये आदमी यहाँ रेलवे स्टेशन पे सवारी जोह रहा है ।
कायदन इसे इस समय अपने बीबी बच्चों के पास होना चाहिए ।
फिर भी , उनका पेट पालने के लिए , उन्हें एक बेहतर जीवन देने के लिए ……. ये आदमी रात 11 बजे सड़क पे है । कितनी हाड़ तोड़ मेहनत कर रहा है । कम से कम भीख तो नहीं मांग रहा । चोरी चकारी तो नहीं कर रहा । crime तो नहीं कर रहा । इज्ज़त से रोज़ी कमा रहा है ।
आपको तो appreciate करना चाहिए उसे ।
यकीन मानिए ……. बात मेरे दिल को छू गयी । और इस एक घटना ने मेरे जीवन का पूरा नज़रिया ही बदल दिया । और वो दिन और आज का दिन ……. मैं हर मेहनतकश आदमी का मुस्कुरा के स्वागत करता हूँ । अब जब स्टेशन पे रिक्शा वाले टोकते हैं तो मुस्कुरा के उन्हें जवाब देता हूँ …….. हाथ खाली हों तो हाथ भी मिलाता हूँ ।
इसी तरह जब कभी रिक्शा लेना हो तो पहले तो एक झड़प रिक्शे वाले से होना लाज़मी है । 40 नहीं 30 लगते है । और फिर जब गंतव्य तक पहुँचने लगते हैं तो खुद को guilt होने लगता है । और जब रिक्शे वाला सामान उतारता है …… और जब उसके माथे पे चमकती बूँदें देखता हूँ पसीने की ……. तो 30 की जगह 50 ही देता हूँ । ये नियम है …… मेरी जिंदगी का ……. धर्म पत्नी हमेशा पूछती है …… जब 50 ही देने थे …… तो पहले बहस क्यों की ?
नहीं जायज़ तो 30 ही बनते थे ………
फिर 50 क्यों दिए ……. वो तो उसके पसीने ……. उसके श्रम उसके जीवट का सम्मान किया …….
तो ये सम्मान पहले ही कर लेते ……. bargain क्यों किया ।
वो इसलिए …… कि वो मन से 30 लेने के लिए तैयार था …….. पर जब मैंने उसे 50 दिए …… तो जो हलकी सी मुस्कान …… मोनालिज़ा सी ……. वो जो उसके चेहरे पे आती है …… वो बड़ा सुख देती है ।

इसी तरह जब कभी मैं किसी ढाबे या रेस्त्रां में खाना खाता हूँ ……. तो एक point ऐसा आता है …… हमेशा ……. जो मुझे उद्विग्न कर देता है । Rush Hours में जब बहुत से ग्राहक़ हों तो service बड़ा श्रमसाध्य कार्य है । ऊपर से 3 – 4 घंटे लगातार दौड़ते भागते किसी को भोजन परोसना ……. ऐसे में मुझे हमेशा ये guilt हो जाता है ……. कि इस बेचारे ने …… ये जो हमें खाना परोस रहा है ……. इसने खाना खाया ? कब से खडा है ? कितनी भाग दौड़ है ????? एक भूखा आदमी आपको 36 तरह के पकवान खिला रहा है ……. उस समय उसकी खुद की क्या मनोदशा होती होगी ……. ये सवाल मुझे बेहद परेशान कर देते हैं …….. इसलिए मैंने अपने जीवन का ये नियम बना रखा है ……. always leave a very very generous Tip on the Table …….. कई बार तो मैं अपने साथ वाले मित्रों को टोक देता हूँ …… 10 – 20 नहीं ……. Tip कम से कम 50 या 100 ……. कर के देखिये ……. भोजन में जो आनंद आयेगा ……..

ये इतनी लम्बी पोस्ट आज इसलिए लिख मारी कि Youtube पे भ्रमण करते music सुनते आज Brass Band वालों की एक विडियो दिख गयी …… जब देखा सुना ……. महसूस किया ……. तो आज जीवन में 51 बरस बाद समझ आया कि यार ये Band वाले भी इंसान होते हैं …… और इंसान नहीं ….. कलाकार होते हैं भाई …… वरना आज तक तो इन्हें हिकारत से ही देखते आये …… अजीबो गरीब से कपडे पहने ……. बेढंगे से instruments बजाते …… एलियन सी शक्ल वाले लोग ……. पर आज जब उन्हें सुना Youtube पे …… तो अहसास हुआ ……. इंसान है भाई ये भी …… जीते जागते हाड़ मांस के पुतले ……. Sax और trumpets पे धुनें बजाते …….
दुनिया हमें वैसी ही दीखती है जैसी हमारी अंतर्दृष्टि होती है ।
ये दुनिया बेहद खूबसूरत है ……. अंतर्दृष्टि पैदा कीजिये ।

कौन सी जा है जहाँ जल्वा-ए-माशूक़ नहीं
शौक़-ए-दीदार अगर है तो नज़र पैदा कर

माँ के बलात्कारियों को अब्बू कहने वाले

यूँ तो मैं ये किस्सा कई बार सुना चुका हूँ पर आज फिर मौक़ा है ।
एक बार और सुन लीजिये ।
तो हुआ ये कि बहुत पहले यानि कि कोई हज़ार एक साल पहले की बात है ।
किसी गाँव पे डाकुओं ने धावा बोल दिया । मर्दों को मार दिया ।
औरतों लड़कियों को उठा ले गए ।
महीनों सालों बलात्कार करते रहे । कुछ औरतों को इस बलात्कार से गर्भ ठहर गया ।
उस गर्भ से एक लड़का पैदा हुआ ।
बिन बाप का वो लड़का किसी तरह गाँव में पलने बढ़ने लगा ।
एक दिन , जब वो कुछ सयाना हुआ तो उसने अपनी माँ से पूछा ……. माँ मेरे पिता जी कौन हैं ? वो कहाँ हैं ?
माँ ने कहा ……. बेटा …… बड़ी दर्द भरी कहानी है । सुन पायेगा तू ?
हाँ माँ सुना ……
बेटा …….. तेरे पिता जी इस गाँव के जमींदार थे ।
फिर डाकुओं ने उन्हें मार दिया और मुझे अपने अड्डे पे उठा ले गए ……. कई साल वो डाकुओं का गिरोह मुझसे बलात्कार करता रहा । उसी बलात्कार से तेरा जन्म हुआ ?

माँ ……. वो डाकू कौन थे ? कहाँ है उनका अड्डा ?
बेटा ……. उनका अड्डा उस रेगिस्तान के उस पार है ……..
और फिर वो लड़का निकल पडा अपनी माँ के बलात्कारियों की खोज में …….
महीने दो महीने बाद लौटा तो दाढ़ी बढ़ी हुई थी …… मूछें सफा चट्ट ……. कुर्ता लंबा और पजामा टखनों से ऊपर चढ़ा जाता था ……. अब उसने अपने बाप के कातिलों और माँ के बलात्कारियों को अब्बू कहना शुरू कर दिया था ……. वो अपनी माँ के बलात्कारियों पे मुसलसल ईमान ले आया था …….

माँ के बलात्कारियों को अब्बू कहने वाले चाहते हैं कि मुंबई में उनके अब्बू की मज़ार हो …… पिता जी की मूर्ती न लगे । माँ के बलात्कारियों के नाम पे अपनी औलादों के नाम रखना उनका धार्मिक अधिकार है ।