फ़ौज में नया नया भर्ती हुए एक फौजी की कहानी ।

फ़ौज में नया नया भर्ती हुए एक फौजी की कहानी ।
मेरे बेटे के साथ के जिला गाज़ीपुर के कुछ लड़के , जो इसके साथ ही पहलवानी करते थे , जब धीरे धीरे जवान हुए तो उन्हें रोज़ी रोज़गार की चिंता सताने लगी ।
खिलाड़ियों के लिए बड़े सीमित विकल्प होते हैं । खिलाड़ी आमतौर पे लिख लोढ़ा पढ़ पत्थर होते हैं । उनके बस का नहीं कि कोई entrance exam पास कर नौकरी पा लें ।
ऐसे में ले दे के एक sports quota का ही आसरा होता है ।
सो हुआ यूँ कि आज से कोई 5 साल पहले गोंडा में senior national championship हुई तो वहाँ army और Navy के coaches 18 – 19 साल के लड़कों को खोज खोज के भर्ती का offer दे रहे थे ।
नन्हे के साथ का एक लड़का जो बड़ा बेहाल परेशान था , उसने army की एक regimental टीम में भर्ती होना स्वीकार कर लिया ।
हमने उसे बहुत समझाया …….. रहन दो पहलवान ……. तुमरे बस की ना है फ़ौज की नौकरी ……..
साले छुट्टा सांड की तरह खेत खलिहान सीवान में घूमने चरने की तुमको आदत है । फ़ौज की नौकरी तुमको जेल सी लगेगी । अभी कुछ दिन में रेलवे की तमाम vacancy निकलेगी गोरखपुर , मुग़ल सराय , बनारस और DLW में , रेलवे की नौकरी आसान है , तुमसे निभ जायेगी ।
पहलवान परेशान था । decision ले नहीं पाया । थाली में सजा के नौकरी मिल रही है । इसे छोड़ दूं और कहीं वो भी न मिले ? इस से भी जाऊं और वो मिले न ।
अंततः उसने Army ज्वाइन कर ली । इधर उसका फ़ौज में हुआ उधर हमारे पहलवान ने रेलवे join कर ली ।
पूर्वांचल में आजकल unemployed लड़कों की कोई पूछ नहीं matrimony बाज़ार में । हर बाप , चाहे उसकी बिटिया कितनी भी निकम्मी क्यों न हो , उसे दामाद सरकारी नौकर ही चाहिये ।
सरकारी नौकरों में भी , फौजी आखिरी पायदान पे हैं । ससुर जी चाहते हैं कि दामाद या तो राज्य सरकार या केंद्र सरकर में सिविल नौकरी में हो । अगर belt वाली job है तो फिर पुलिस में हो ……. थक हार के जब कोई न मिले तो फौजी ही सही …….
उधर बेरोजगार लौण्डों का भी यही हाल है । अगर एक लड़के के हाथ में आप दो appointment letter रख दें , एक फ़ौज का और दूसरा निगम के सफाई कर्मी का , तो 100 में 90 लौंडे सफाईकर्मी लग जाएंगे , फ़ौज में सिपाही न बनें ।
फिर भी मरा हुआ हाथी भी लाख का …….. सो पूर्वांचल के matrimony बाजार में फौजी भाई का भी ठीक ठाक भाव लग जाता है , मने लाख दो लाख रु नगद और कम से कम एक Bike तो मिल ही जाती है । हमारे पहलवान फौजी भाई को भी मिल गयी । दुलहनिया घर आ गयी ।
अब शुरू हुई असली समस्या । कल तक जिस नौकरी के लिए तरसता था अब वही नौकरी काटने को दौड़ती थी ।
बेरोजगार आदमी को साल भर पगार मिल जाए तो वो बेरोजगारी का सारा दर्द , सारे कष्ट भूल जाता है । हमारे फौजी भाई के साथ भी वही हुआ । घर बैठी नयी नवेली दुल्हन को छोड़ कौन जाना चाहता है बॉडर पे ? अब उसे भी फ़ौज की नौकरी में सौ खामियां दिखने लगी हैं । छुट्टी आता है तो वापस जाना नहीं चाहता । खाना अच्छा नहीं है । अफसरों की गुलामी करनी पड़ती है …….. इसके अलावा और 100 कारण है जिनके कारण वो फ़ौज की नौकरी नहीं करना चाहता ।
25,000 रु तो कैसे भी कमाया जा सकता है ।
फ़ौज की नौकरी नहीं करनी ।

आज जो अचानक बाढ़ आ गयी है सोशल मीडिया पे , फ़ौज और अर्ध सैनिक बलों के जवानों की …….. कोई कह रहा की खाना अच्छा नहीं और कोई छुट्टी का रोना रो रहा , किसी को फ़ौज की सेवादारी बहुत बुरी लग रही …….. ये सब वही लोग हैं जिनसे belt की नौकरी हो नहीं रही , वो जो बेरोजगारी का दर्द और दंश भूल गए हैं ……..

कड़वा सत्य ये है कि आज सेना में कोई नहीं रहना चाहता । सबको मुफ्त की पगार चाहिए , सुविधा सब चाहिए , पर काम न करना पड़े ………

फ़ौज के लिए ये अच्छे लक्षण नहीं ।

मुझे अपने बचपन का वो किस्सा याद आता है जब 1971 की लड़ाई अभी बस ख़त्म ही हुई थी ।
पिता जी की regiment कश्मीर के छम्ब ज्योड़ियां sector में posted थी । जम्मू से आगे अखनूर जिले में छम्ब और ज्योड़ियां नामक दो गाँव हैं जो पकिस्तान सीमा से लगते हैं । बताया जाता है कि 1971 में इस छम्ब sector में भीषण युद्ध हुआ था ।
जिस समय युद्ध चल रहा था , हम लोग मने परिवार पठानकोट में था और पिता युद्धभूमि में ।
मेरी उम्र 6 साल थी …….. 6 साल का बालक युद्ध की विभीषिका का अंदाज़ा नहीं लगा सकता ।
उसे नहीं मालूम कि उसका पिता किस दशा में है । जीवित लौटेगा या नहीं ।
पर माँ ने वो दिन कैसे बिताये होंगे , पता नहीं ।
पर मुझे वो दिन आज भी याद है जब पिता जी गए थे । उन्होंने माँ से कहा था , फ़िक्र मत करना , अगर मुझे कुछ हो गया तो ये राष्ट्र तुम्हारा ध्यान रखेगा ।
तब की सेना में और आज की सेना में तो जमीन आसमान का फर्क है । वेतन भत्ते सुविधाएं और ex gratia पेमेंट ……. हर चीज़ में सुधार है । 1971 में ऐसा नहीं था । तब सेना के शहीदों को लाखों करोड़ों रु और ये petrol pump और Gas agency नहीं मिलती थी …….. 62 की indo China war में तो सैनिकों के पास जूते तक न थे । फिर भी , मुझे याद है , पिता जी पूरे उत्साह के साथ , हँसते खेलते गए थे ।
कुछ दिन बाद , जब कि युद्ध विराम हो गया और सेनाएं barracks में लौट आईं , और जब कि सैनिक अपने परिवारों से मिलने को मचल रहे थे , सबको छुट्टी देना संभव न था , सो पिता जी के CO कर्नल अर्जुन देव खन्ना ने अपने फौजियों से कहा , अपने परिवारों को यहीं बुला लो ।
और रेजीमेंट से कुछ दूर , एक खुले मैदान में , टेंट गाड़ दिए गए ।
उन दिनों ये रेल लाइन सिर्फ पठानकोट तक ही थी । सो पठानकोट रेलवे स्टेशन पे Jawan Bus लगा दी गयी । हर रेल से उतरने वाली families को ले के गाड़ियां छंब जाती ।
मुझे वो यात्रा आज भी याद है ………. जब उस 3 Ton गाडी में बैठ के हम छम्ब पहुंचे । लगभग सारा दिन ही लग गया ।
माँ ने ढेर सारी पूड़ियाँ और पतीला भर सब्जी बना रखी थी । रेल से उतरने वाले परिवारों के लिए ।
मुझे आज भी याद है वो picnic जब हम सबने पेड़ के नीचे बैठ के पूड़ियाँ खायी थी । उस 3Ton के driver और डंडा Man ने भी …….. जी हां फौजी गाडी के ड्राइवर के साथ जो खलासी helper होता था उसे उन दिनों डंडा Man कहा जाता था …….. वो एक डंडा लिए रहता था और driver को दिशा निर्देश देता था ।
Regiment में सुबह दोपहर शाम को लंगर से खाना नाश्ता ले के गाडी आती थी , सभी परिवारों के लिए । दूध के लिए Milk Maid के condensed milk के डब्बे और milk powder के कनस्तर । अमूल मक्खन के डिब्बे …….. राशन की कोई कमी नहीं थी ।
समस्या ये आयी कि बहुत से परिवार जो दक्षिण से आये थे उनके पास कोई गर्म कपड़ा न था जबकि छम्ब में भीषण सर्दी पड़ रही थी । ऐसे में मोटे मोटे काले खुरदुरे फौजी कंबल ……..
इफरात राशन होने के बावजूद भोजन का स्वाद अच्छा नहीं था ।
मूल समस्या थी अच्छे cooks का आभाव ।
मुझे याद है कि माँ लंगर से आयी दाल सब्जी को फिर से छौंक लगाती थी ।
फौजी रोटी की सबसे बड़ी खासियत कि उसे झाड़ झाड़ के खाना पड़ता था ।
क्योंकि बेलते समय रोटी को सीधे सीधे आटे पे रख के ही बेलते हैं जिस से उसमे अत्यधिक सूखा आटा जिसे परथन लग जाता था ।
पर फिर भी मुझे याद है कि वो खाना स्वाद रंग रूप में 19 हो सकता था पर पौष्टिक पूरा था , quality और quantity में कमी न थी ।
मुझे बचपन का वो दृश्य भी याद है कि हर फौजी पलटन में एक सूअर बाड़ा होता था जिसमे सूअर पाले जाते थे और उन सूअरों की खुराक पल्टन के लंगर और mess की जूठन ही होती थी जो इतनी ज़्यादा होती थी कि 30 – 40 सूअर पल जाते थे ।
कहने का मतलब ये कि फ़ौज को राशन की कमी कभी नहीं रही ।
एक बात और …….. आज के फौजी और तब के फौजी में अंतर था ।
मेरे पिता जी 1964 में सेना में गए ।
ये वो समय था जब कि 62 का युद्ध बस हुआ ही था और उसमें china ने भारयीय सेना को बुरी मार मारी थी । सेना के पास साजोसामान की भयंकर कमी थी । जूते और Rifles तक न थीं । सेना बाबा आदम के जमाने की 303 Rifles से लड़ रही थी । ऐसे बुरे हालात में जबकि चीन ने भारत के 27000 वर्ग Km भूभाग पे कब्जा कर लिया था , सेना का मनोबल पूरी तरह टूटा हुआ था और नेहरू मरने वाले थे , पिता जी सेना में गए । अभी ट्रेनिंग अधूरी ही थी कि 65 का युद्ध छिड़ गया । उसके बाद 71 …….. तब का फौजी जान हथेली पे ले के सेना में जाता था ……..
अब तो मौज ही मौज है । 71 से ले के 90 तक तो पूरा समय शान्ति रही ।
इसके बाद इक्का दुक्का छोटे मोटे ops हुए ।
60 के दशक में लौंडा फ़ौज में भर्ती हो जाए तो घर परिवार में मातम छा जाता था ।
आज बाप लोग 5 लाख रु ले के जुगाड़ खोजते फिरते हैं कि लौंडा किसी तरह भर्ती हो जाए ।
पूरब में अब फौजी लौंडों को दहेज़ में car मिल रही है ।
आजकल फौजी barrack के आगे 4 -6 swift और Dezire खड़ी दिख जाती हैं ।
25000 वेतन भी हो गया है ।
न फ़ौज अब पहले वाली रही न फौजी ।
पहले सिपाही निपट अनपढ़ अंगूठाटेक होते थे । अब BA , MA आम बात है ।
अब का सिपाही देश के लिए जान देने नहीं नौकरी करने गया है ।
अब वो अपने को अफसर से कमतर नहीं समझता ।
जबकि पैदल सेना का ये चरित्र है कि हर हाल में अफसर के हुक्म का पालन …….. yes Sir …….. अपना दिमाग बिलकुल नहीं लगाना …….. साहब ने कहा कि मौत के मुह में कूद जा तो कूद गया ……. न कुछ सोचा न समझा …….. न दिमाग लगाया …….. खुद को झोंक दिया ……..
युद्ध भूमि में दिमाग लगाने वाले लोग ही भगोड़े होते हैं ।

ये जो सेना और अर्द्धसैनिक बालों के जवानों के वीडियो धड़ाधड़ आ रहे हैं उस से लगता है कि योद्धाओं ने दिमाग लगाना शुरू कर दिया है । अफसरों को Villain बना के पेश किया जा रहा है ।
जबकि सेना में मान्यता है कि फ़ौज में सूबेदार मेजर साहब और Commanding Officer पिता सामान होते हैं जो अपने बच्चों से ज़्यादा ख़याल रखते हैं अपने जवानों का …….. Col. अर्जुन देव खन्ना ने सारे नियम कानून ताक पे रख के families को ही युद्ध भूमि में बुला लिया था ………. ये अपने योद्धाओं के welfare की पराकाष्ठा थी ।

पर आज जैसे अफसर बनाम NCO का माहौल बनाया जा रहा है , ये फ़ौज के लिए ये अच्छे लक्षण नहीं ।

UP को अब सिर्फ मोदी से आस

पिछले 3 दिन देश के सर्वाधिक बैकवर्ड इलाके में बीते ।
जिला गाज़ीपुर – उत्तर प्रदेश में ।
चुनावी माहौल में भी गाँव में सिर्फ 6 से 8 घंटे बिजली ।
वो आठ घंटे भी दो किश्तों में ।
उसमे भी हर एकाध घंटे बाद 10 -5 मिनट के लिए कट जाती थी ।
सड़कें बेहाल ।
मेरे साथ विपिन भाई थे । विपिन भाई भीलवाड़ा राजस्थान से हैं । हमारे जिले के state highway की दशा देख के बोले , इतनी बदतर सड़कें ? बिजली की ये दशा ? फिर भी आपका CM अपने को विकास पुरुष कहता है ?
मैंने राजस्थान की सड़कें देखी हैं । NH या state highway तो छोड़ दीजिए , गाँव की सड़कें भी शानदार हैं ।
विपिन भाई ने एक मज़ेदार टिप्पणी की । बोले अजीत भाई आप लोग तो हमसे भी 50 साल पीछे हैं ।
एकदम टूटी हुई सड़क पे जिसपे सड़क तो है ही नहीं , सिर्फ गड्ढे हैं , car बमुश्किल 20 की स्पीड से चल रही थी , लोगों ने तकरीबन हर 100 या 200 मी पे speed breaker बना रखे थे ।
विपिन भाई बोले , पिछड़ापन एक मानसिक अवस्था है । इसका economy या infrastructure से कोई सम्बन्ध नहीं ।
मेरे गाँव में किसी भी कंपनी के किसी भी नेटवर्क पे कोई भी नेट , 4g छोडो 2G तक नहीं चल रहा था । Jio तो खैर सिरे से गायब है । अभी यहाँ आना बाकी है ।
3 दिन बाद जब मुग़ल सराय पहुंचे तो net नसीब हुआ ।

पर कुछ positive चिन्ह भी दिखे । लगभग हर सड़क के किनारे ताज़ी ताज़ी बिछी हुई OFC बोले तो Optical Fibre cable दिखी । साथ बैठे एक मित्र ने ढांढस बधाया । सिर्फ एक साल और ……. फिर आपको हाई स्पीड net मिलेगा (thanks to Ravi Shankar )

रेलवे में जबरदस्त काम हो रहा है । हमारे जिले में दो रेलवे रुट हैं ।
एक औंडिहार गाज़ीपुर बलिया और दूसरा औंडिहार मऊ गोरखपुर ।
दोनों रूट के प्रत्येक स्टेशन पे development का काम चल रहा है । जखिनिया स्टेशन देख के तो तबियत खुश हो गयी । तमाम आधुनिक सुविधाएं और शानदार निर्माण कार्य ।
औंडिहार सारनाथ लाइन का दोहरीकरण हो चुका है । वाराणसी बलिया का विद्युतीकरण अंतिम चरण में है । खंबे लग चुके हैं , सिर्फ तार लगाना बाकी है । (thanks to Manoj Sinha )
हमारे गाँव में 50 बरस बाद नया transformer लगा है ।
पहली बार हम लोगों का पंखा भी तेज चला …… उस बेचारे को भी 140 – 150 volt की आदत पड़ गयी थी । ( thanks Piyush Goyal )
विकास कार्य जो भी है वो केंद्र सरकार के कारण ।
अकललेस जादो तो बस लखनऊ मेट्रो और लखनऊ आगरा expressway बना के मस्त हैं ।
उनका विकास सिर्फ लखनऊ सैफई तक सीमित है ।

UP को अब सिर्फ मोदी से आस है ।
सिर्फ मोदी ही प्रदेश का विकास कर सकते हैं ।

न अपना जन्म दिन मनाऊंगा न मनाने दूंगा ।

न खाऊंगा न खाने दूंगा ।
न अपना जन्म दिन मनाऊंगा न मनाने दूंगा ।
न अपने जन्म दिन पे रंडी नचाऊंगा और न भोसड़ी वाले नकटेढ़वा तोतले को नचाने दूंगा ।
अपने जन्म दिन पे दो हज़ार के नोट की माला pink माला न खुद पहनूंगा न भैंसवती को पहनने दूंगा ।
अपने तो लाखों लोगों की रैली करूंगा पर इन भोसडीवालों को सिर्फ PC बोले तो press conference से काम चलाने पे मजबूर कर दूंगा ।

नोट बंदी का असर साफ़ दिख रहा है ।
चुनाव में सिर्फ एक महीना बचा है ।
पिछले 30 दिन में UP में कितनी rally हुई हैं ?
सपा की आखिरी rally कब हुई थी ?
बसपा की ?
Congress की बहराइच रैली को कितने दिन हुए ।
आज BMW का हैप्पी बड्डे है । कल्पना कीजिये कि नोटबंदी न हुई होती तो आज मायावती ने कितनी बड़ी रैली की होती UP में और कितना नगद चन्दा , कैसी कैसी माला पहनी होती और कैसे कैसे हीरे जड़े मुकुट पहने होते …….. आज भैंस वती कह रही थी कि मैं अपना जन्म दिन सादगी से मना रही हूँ । अबे यूँ कह न कि मोदिया साला भिखारी बना दिया । चड्ढी छोड़ सब ले गया ।
इतना बड़ा चुनाव ……. UP का …… मिनी General election ……..
और ऐसा सन्नाटा ?

ये नोटबंदी का असर नहीं तो क्या है ?

ये हाल के वर्षों में जब से ये धनबल बाहुबल की राजनीति शुरू हुई है , ये सबसे सस्ता चुनाव होने जा रहा है ।

भारत बदल रहा है ।

काबुल में सब घोड़े ही नहीं होंते । कुछ गधे भी होते हैं ।

कहावत है कि काबुल में सब घोड़े ही नहीं होंते ।
कुछ गधे भी होते हैं ।
फ़ौज में भी सब विक्रम बतरा नहीं होते । कुछ मनीष भटनागर भी होते हैं ।
बहरहाल फौजियों ने social media में अपने grievances के वीडियो बना के डालने शुरू कर दिए हैं । देश द्रोही मीडिया इन ख़बरों को चटखारे ले ले के दिखा रहा है ।
उधर सुनते हैं कि एक फौजी ने तो बाकायदा धरना भूख हड़ताल शुरू कर दी है ।
किसी फ़ौज के लिए इस से ज़्यादा भयावह स्थिति और नहीं हो सकती । फ़ौज में हुक्म उदूली की सज़ा dismissal होती है । इसके अलावा किसी किस्म की हड़ताल , धरना प्रदर्शन या भूख हड़ताल इत्यादि अक्षम्य अपराध माने जाते हैं । इस लगभग विद्रोह या Mutiny मान लीजिए ।

मीडिया को ऐसे issues की गैर जिम्मेदाराना reporting से बचना चाहिए ।
एक फौजी ने फ़ौज में अफसरों द्वारा अर्दली बनाने को ले के आपत्ति की है ।
इस अर्दली को ले के एक किस्सा आपको सुनाता हूँ ।

हमारे एक मित्र जो फ़ौज से रिटायर हो के आये थे उन्होंने ये किस्सा सुनाया । हुआ ये कि जब वो फ़ौज में थे तो एक बार अपने Major साहब के पास उनके बंगले पे कुछ फौजी जवान आये हुए थे और gate पे खड़े अपने साहब से बातें कर रहे थे ।
बगल वाला बँगला Air Force के एक Squadron Leader का था और वो घर शिफ्ट कर रहे थे । Air Force का truck आ के खड़ा हुआ और Sq. Leader साहब स्वयं truck से सामान उतारने लगे और उनकी पत्नी इस काम में उनका हाथ बंटाने लगी । इसी बीच कोई भारी सामान था उसे उतारना था । Sq Leader साहब ने अपने truck के driver से गुजारिश की कि थोड़ा हाथ लगा दे । वो एक दक्षिण भारतीय Air Man था । साफ़ नट गया । Sorry Sir , मेरी यूनिफार्म गन्दी हो जायेगी ।
हार के दोनों पति पत्नी स्वयं कोशिश करने लगे ।
Major साब से ये देखा न गया । उन्होंने अपने जवानों को ललकारा ……. क्या जवान ? अब यही होगा । चारों जवान लपक के truck पे चढ़ गए और 10 मिनट में पूरा truck खाली कर सामान घर के भीतर पहुंचा दिया ।
फिर मेरे मित्र जब रिटायर हो के आ गए और उनका बेटा जो मेरे स्कूल का student था , वो NDA मने National Defence Academy में भर्ती हो गया तो उन्होंने अपने बेटे को समझाया , भूल के भी Airforce या Navy में मत चले जाना । अफसर बनने का मजा सिर्फ Army में ।
Airforce और Navy में Air Man और Sailor अफसरों की सेवा में हाजिरी नहीं लगाते ।
Army का जवान साहब की सेवा में सर्वदा तत्पर रहता है । सिर्फ Army अपने अफसर को सेवादार या Orderly बोले तो अर्दली देती है ।
क्यों भला ?
इसका मर्म एक बार मुझे फ़ौज के एक कर्नल साहब ने ही समझाया ।
Navy और Airforce बड़ी साफ़ सुथरी forces होती हैं । उन्हें जमीन पे नहीं लड़ना । फ़ौज जमीन पे लड़ती है । धूल मिट्टी , कीचड़ , पानी , दलदल , बर्फ , जंगल पहाड़ रेगिस्तान , सांप बिछ्छू सबसे लड़ना है । जमीन खोद के trench में भी रहना। है और jungle में tent गाड़ के भी रहना है ……. मीलों पैदल मार्च करना है और hand to Hand combat भी करना है दुश्मन से ……. कभी barack में तो कभी totally Inhospitable terrain में भी रहना है ।
कभी घी में चुपड़ी खानी है तो कभी ज़िंदा रहने के लिए घास पात और सांप केकड़े भी खाने हैं ……. पहाड़ से खुरच के काई भी खानी पड़ती है कभी …….. वहाँ युद्ध के मैदान में कोई ढाबा restaurant नहीं खुला है । front पे जैसी भी कच्ची पक्की मिले पेट भर खाओ …… न पेट भर मिले तो आधा पेट खाओ ……… पर मुह से उफ्फ नहीं निकलनी चाहिए ।
फौजी बताते हैं कि फ़ौज में कभी बहुत अच्छा खाना मिलेगा तो कभी बहुत खराब ।
फौजी अफसरों के बारे में एक बात और ।
कारगिल युद्ध के शहीदों की सूचि उठा के देख लीजिए ।
सारे मने 90% शहीद जवान लड़के थे । 20 – 22 – 25 के ।
फ़ौज में जब भी कोई operation होता है ……. कहीं धावा बोलना है …… कहीं घुस के attack करना है …….. तो फ़ौज की टुकड़ी में एक JCO , कोई एकाध हवलदार होगा , 4 -6 सिपाही नायक लांस नायक होंगे ……. पर उनका नेतृत्व करेगा एक जवान लड़का ……. वो जो बस अभी IMA बोले तो Indian Military Academy से निकल के आया ही है …… कोई Lieutenant या कप्तान …….. वो सबसे आगे चलता है । वही सबसे आगे रहता है । वही सबसे पहले दुश्मन की मांद में घुसता है । तो नेतृत्व करता है । सबसे आगे उसी का सीना रहता है ।
अक्सर पहली गोली भी वही खाता है ।
और जनाब , सामने से 12 बोर के छर्रे नहीं LMG का burst आता है …….… आपके ऊपर कोई LMG का burst झोंक दे न , या LMG की गोली आपके बगल से निकल भर जाए न , तो सुना है कि अच्छे अच्छे जांबाज़ लोगों की पैंट गीली औ पीली हो जाए …….. ऐसे में वो 22- 24 साल का लौंडा जान हथेली पे ले के सबसे आगे चलता है । सबको हौसला देता चलता है ……..
ऐसे मुश्किल हालात में जीती है फ़ौज और इन्ही हालात से निपटने के लिए ही फौजी अफसरों को अर्दली मने सहायक देने की परंपरा शुरू हुई ।
महाभारत में भी ऐसा वर्णन है कि जब सूर्यास्त के बाद सेनाएं शिविर में लौट आतीं तो उनकी सेवा सुश्रुषा में कुछ लोग लपट जाते ।
शायद वही लोग सेवादार या अर्दली हुए । सेना एक ऐसा institution है जिसका सतत विकास हुआ और military Science भी इसी प्रकार Science के रूप में धीरे धीरे evolve हुई जिसमें कि हज़ारों हज़ारों सालों का अनुभव छुपा है । इसे यूँ हलके में खारिज नहीं किया जा सकता ।
अक्सर हम सेना को शांतिकाल में देख के उनका आकलन करने लगते हैं ।
पर इतना याद रखना चाहिए कि शांतिकाल में भी हर सेना battle ready होती है ।
सेना में अर्दलियों के दुरुपयोग और उनसे घरेलू काम कराये जाने कक शिकायतें अक्सर मिलती रहती हैं पर मेरा ये निजी अनुभव है कि हर किसी को अर्दली बना के नहीं भेजा जाता ।
1000 – 1200 लोगों की पल्टन में होते हैं 10 – 20 ऐसे जो इन्ही कामों के लायक होते हैं । कुछ लांगरी , कुछ धोबी नाई , कोई sweeper और कुछ सेवादार ।
फ़ौज में कभी भी किसी जांबाज़ किस्म के सिपाही को अर्दली ( घरेलू ) की ड्यूटी नहीं दी जाती ।
किसी को भी सेवादार भेजने से पहले बाकायदा पूछा जाता है ।
मुझे वो किस्सा भी याद है जब अम्बाला छावनी में वो फौजी पिता जी के सामने पेश हुआ और उसने कहा कि साहब मैं घरेलू सेवादार नहीं बनना चाहता और तत्काल उसकी duty बदल दी गयी थी ।
और वो राम स्वरुप भी याद है चंडीगढ़ में जो पूरे 2 साल बड़े मजे से हमारा सेवादार रहा ।
काबुल में सब घोड़े नहीं होते और किसो को जबरदस्ती न घोड़ा बनाया जा सकता है न गधा ।
फिर भी , फ़ौज में घरेलू सेवादार बनाने का सिस्टम तत्काल प्रभाव से बंद होना चाहिए ।

तेज बहादुर की समस्या आखिर है क्या ?

आजकल खबरंडियां सैनिक बलों के welfare को ले के भोत जायदे चिंतित हो गयी हैं ।
भोत रंडी रोना मचा हुआ है ।
सब लोग फौजी भाइयों की दशा दुर्दशा को ले के भोत चिंतित लग रिये हैं ।
ये सारा रंडी रोना देख के मेरे को बहुत पुराना ये किस्सा याद आ गया ।
हुआ ये के 1984 में जब कि मैं पहलवानी करता था , मेरा room mate और मेरा पार्टनर सोनीपत जिले का एक जाट भाई था । दिल्ली के नज़दीक ही उसका गाँव था । अक्सर उसके गाँव जाना होता था । उसका एक चचेरा भाई था । भोत हैरान परेशान प्राणी था । उसके दुःख से पूरा गांव दुखी था ।
मैंने पूछा क्या problem है ?
बताया गया कि भाई पहले फ़ौज में था ।
जिस दिन भर्ती हुआ उसी दिन से दुःखी है । फ़ौज की हर एक चीज़ से दिक्कत थी उसे । उठने बैठने खाने पीने सोने ,कपडे लत्ते दवा दारू ……. हर चीज़ से परेशानी थी । सच कहें तो उसका जी कभी फ़ौज में लगा ही नहीं । खैर ……. ट्रेनिंग सेंटर से जब पहली बार घर आया छुट्टी पे , तो उसका यूँ स्वागत हुआ मानो कोई जंग जीत के लौटा हो । पूरा घर सर आँखों पे बिठाये रखता ……. जहां जाता पूरा गांव इज़्ज़त से बुलाता …… आजा फौजी भाई …… लोग सम्मान से बुलाते बैठाते । घर में माँ दाल में एक्सट्रा घी गेर के रोटी खिलाती । फौजी भाई को लगा असली ज़िन्दगी तो ये है ।
फिर जब वापस ड्यूटी पे जाने की बेला आयी तो उसकी जान हलक में आ गयी ।
ड्यूटी पे जा के राजी न था । घर वालों ने समझा बुझा के धक्का दे के भेजा । कुछ दिन में भाग आया । रेजिमेंट से 4 सिपाही आये , पकड़ के गाडी में ऐसे लादा जैसे मुन्सिपाल्टी की dog van लादती है । वहाँ पट्ठे को 28 दिन का पिट्ठू और quarter guard ……. एक अफसर घर आया माँ बाप को समझाने कि अपने लौंडे को समझाओ कि अब वो फ़ौज में है …… इस तरह से भगोड़ा होना उचित नहीं । इस बार तो CO साहब ने बच्चा समझ के छोड़ दिया है पर आगे मुश्किल होगी ।
पर फौजी भाई कहाँ सुधरने वाला था । हमारे यहां गाँव गिरांव में एकाध गोरु चउआ ऐसा होता है जो हमेशा छुड़ाने और खूंटा उपारने की फिराक में रहता है । ऐसे ही गोरु को नाथ दिया जाता है ।
बहरहाल फौजी भाई का मन फ़ौज में नहीं लगना था न लगा । कुछ दिन बाद जब सादी बियाह हो गया तो करेला नीम चढ़ गया । नयी नवेली बीवी को छोड़ कौन जाना चाहता है ड्यूटी पे ?
फौजी रेजिमेंट में जाता तो हमेशा भागने की फिराक में रहता । घर आता तो इधर बीबी समझाती उधर माँ बाप , चचा ताऊ ……
लोग पूछते अबे दिक्कत क्या है तेरे को …… दाल में छौंक नहीं , रोटी झाड़ के खानी पड़ती है …….
उसको indian Army से सबसे बड़ी प्रॉब्लम ये थी कि फौजी जूता बहुत भारी होता है और साले गर्मियों में भी गर्म जुराब पहनाते हैं ।
अंततः इस कथा का अंत यूँ हुआ की फौजी भाई जैसे तैसे कैसे भी डिस्चार्ज ले के घर आ गया ।
कुछ दिन तो भोत अच्छा लगा ।
फौजी फ़ौज से जब छुट्टी आता है तो कुछ दिन बहुत सेवा होती है पर जल्दी ही चाव उतर जाता है ।
उनका भी उतर गया । जो गाँव घर माँ बाप और बीबी कल तक बहुत अच्छे लगते थे वो अब काटने को दौड़ते थे । जो माँ कल तक घी गेर के दाल खिलाती थी अब सूखी रोटी गंठे और सीत (प्याज और लस्सी ) के साथ थमा देती थी । बेरोजगारी बुरी बला है । कुछ दिन में फौजी भाई एक एक पैसे को मोहताज हो गया । अब इस नाक से मक्खी जाती थी और दूसरी से आती थी ।
दो तीन साल फौजी भाई की बहुत दुर्दशा हुई ।
1988 के आसपास घर वालों ने उसे 5 लाख रु दे के हरियाणा पुलिस में भर्ती कराया ।
फौजी भाई आज भी HP में है । है तो वहाँ भी असंतुष्ट ही पर मजबूरी में किसी तरह दिन काट रहा है । वो तमाम दिक्कतें जो उसे फ़ौज से थीं हरियाणा पुलिस से भी हैं पर एक बार चूँकि दूध से जल चुका है इसलिए फूंक फूंक के पी रहा है ।
फ़ौज की हर पलटन में ऐसे दो चार होते हैं और इनसे कैसे निपटना है फ़ौज खूब जानती है ।
BSF तेज बहादुर के court martial 2010 में ही करने जा रही थी पर उसके बीबी बच्चों पे तरस खा के सिर्फ 89 days की Rigourous Punishment दे के छोड़ दिया था और उसके परिवार बीबी बच्चों पे तरस खा उनके भविष्य की चिंता करते हुए उसे तब तक बर्दाश्त किया जब तक की उसकी नौकरी pension पाने लायक न हो गयी । फ़ौज की और अपने सीनियर अफसरों की भलमनसत का क्या सिला दिया है तेज बहादुर और उसकी बीबी ने ।
आज के बाद शायद फ़ौज इतनी tolerant न रहे , और जिन लड़कों को फ़ौज में शुरूआती तालमेल बैठाने में दिक्कत आती है उन्हें पहली ही गलती पे निकाल बाहर करे ।
तेज बहादुर ने बेशक एक महत्वपूर्ण विषय की ओर ध्यान दिलाया है पर एक बहुत गंभीर अनुशासन हीनता की शुरुआत भी कर दी है ।

BSF जवान के भूखे मरने वाले वीडियो का सच क्या है ?

सोशल मीडिया पे इन दिनों BSF के एक जवान का वीडियो viral हुआ जाता है ।
बेचारा जवान भूखा मर रिया है ।
वो बेचारा सारा दिन बर्फ में खड़ा duty देता है और पीछे से उसका घी Commandant साहब खा जाते हैं ।
मैंने कल वो वीडियो देखा तो मेरा तो खून खौल उठा ।
देस की तो आज़ादी खतरे में है भाई ।
गाली महोत्सव तो बनता है । पर इसके लिए गाली पर्रीकर को नहीं राजनाथ सिंह को दो ।
BSF एवं अन्य para military forces MHA बोले तो ministry of Home affairs के अंतर्गत आते हैं ।

अब मेरी चूँकि भारत सरकार में एकदम ऊपर तक बात है सो मैंने तुरंत फून लगाया ……. बात कराओ साले से …….. क्यूँ बे मलेच्छ …… BSF का राशन खा गया बे साले चोर ? भुक्खड़ ?

By god की कसम ……. खाजनाथ वहीं धोती में मूत दिए ……. बोले गुस्सा थूक दीजिये मालिक …….. राशन supply फ़ौज में होती है मालिक । वहाँ ये सब चोरी चकारी चलती है ।
बाकी para military forces में हम लोग Ration Money देते हैं हुज़ूर …….. वो ration money सिपाही की पगार के साथ उसको दे दी जाती है ।
अब उस पैसे को वो कैसे खर्च करते हैं ये उनकी regiment या battalion जाने ।
उनका commandant जाने ।
हमने तुरंत commandant को फून लगाया …….. क्यों बे साले चोरकट ……. चिन्दी चोर …… साले तनख्वाह में पेट नहीं भरता बे ? साले जवानों का राशन खा जाता है ?
अब जब उसको पता चला कि सोसल मीडिया मने फेसबुक के इतने बड्डे मठाधीस का फून आया है …… माँ कसम थर थर कांपने लगा commandant …….. बोला सर गलती हो गयी जी ……. पर मेरी बात तो सुन ल्यो हुजूर ………
Sir जी , system नयूं है जी कि BSF या किसी भी para military force में Ration की supply नहीं होती । मैं यानि कि commandant महीने में एक बार पूरी battalion की एक open meeting लेता हूँ जिसे दरबार कहा जाता है । उस दरबार में एक mess committee बनायी जाती है ।
इसमें एक Inspector , एक sub inspector , एक HC बोले तो head कांस्टेबल और 6 सिपाही रहते हैं । हर महीने नयी कमेटी बनती है । कमेटी का चयन मैं नहीं बल्कि battalion के जवान खुद मनोनीत करते हैं ।
फिर वो कमेटी जिसमे इंस्पेक्टर से ले के कांस्टेबल तक सब होते है बाज़ार से खुद जा के local purchase करते हैं Ration की ……. आटा , चावल, दालें ,तेल ,मसाला , दूध , घी , मक्खन, bread ,अंडे ,पनीर , Meat सब कुछ local market से खरीदा जाता है । LPG भी ……. batallion में cook होते हैं । ज़रूरत पड़ने पे local helper भी वेतन पे रख लिया जाता है ।
क्या खाना है कैसे खाना है देसी घी में दाल छौंकनी है या काजू बादाम खाने हैं इसका निर्णय सब वही कमेटी लेती है …….. सबकी मने खाने वालों की सलाह या demand के अनुसार ।
Commandant बीच बीच में देखता ताकता रहता है । कोशिश यही रहती है कि हर जवान का mess bill कम से कम इतना ज़रूर आये जितनी उसकी ration money है । मने बेशक उसकी जेब से 100 -200 लग जाए पर वो ration money में से पैसा बचाने न लगे ……..

आज सुबह मैंने कुछ मित्रों जानकारों से फोन पे बात की । ऐसे लोगों से जो BSF , CRPF या CISF में हैं । एक मित्र ने बताया कि उनकी battalion जम्मू के पास posted है ।
हमारा सारा राशन अखनूर रोड स्थित wallmart से आता है ।
सारा सामान A ग्रेड उच्च quality …….. खुद हमारे अपने cook बनाते हैं । हम लोग खुद हिसाब किताब रखते हैं । मेरी regiment में mess कमेटी हर महीने बदलती है ।
Commandant साहब खुद हमसे पूछते हैं कि किसको रखना चाहते हो कमेटी में ………
एक HC हमारा फेवरिट है । हमने जब उसी को continue करने की बात कही तो साहब नहीं माने क्योंकि हर महीने आदमी बदलने का rule है । अगले महीने जब फिर दरबार सजा तो जवानों ने फिर उसी HC की मांग की ……. साहब ने पूछा , आखिर इसकी इतनी demand क्यों है। जवानों ने बताया कि इसके management में सबसे बढ़िया खाना बनता है । हर के साहब ने उसे फिर मनोनीत कर दिया ।

अब जब ऐसी व्यवस्था है तो फिर ये जवान सोशल मीडिया में ऐसी बात क्यों कह रहा है ये जांच का विषय है ।
मैंने ये पोस्ट जो लिखी है वो विभिन्न forces के अलग अलग लोगों से बात करके लिखी है ।
यदि इसके तथ्य गलत हैं तो लोग स्वयं बताएँगे ।

सत्य सामने आना ही चाहिए ।

साइकिल गयी कबाड़े में हाथी चढ़ गया भाड़े में अब कोई नहीं अखाड़े में …….. सिर्फ मोदी ………

बॉलीवुड की हिंदी फिल्म का हीरो सर्वगुण संपन्न होता है ।
भलामानस , अव्वल दर्जे का चरित्रवान …… मने फिल्म की हेरोइन और vamp उस से चिपटी रहती हैं , उसे खींच खींच के अपने बेडरूम में ले जाती है पर वो पट्ठा लंगोट का इतना पक्का …… हनुमान जी का ऐसा भगत कि vamp और हेरोइन दोनों को अपनी बहन मानता है ।
हीरो के दो चार यार दोस्त चेले चमाट होते हैं जो हमेशा उसके इर्द गिर्द मंडराते उसकी चम्पी किया करते हैं ।
हीरो एक नंबर का चूतिया , जब लाश से टकराता है तो सीने में घुसे चाकू को पकड़ लेता है ……. और ठीक उसी मौके पे या तो पुलिस आ जाती है या फिर कोई और …… फिर ये पुक्का फार के रोता है कि नहीईईईईईई …….. मैंने खून नहीं किया ……..
फिर जब ये जेल चला जाता है तो उसका वो वफादार दोस्त बार बार एक ही फ़िल्मी डायलॉग बोलता है ……… मेरा दिल कहता है , मेरा दोस्त खूनी नहीं हो सकता ……. कह दो कि ये झूठ है …….

मोदी haters को अब भी भरोसा नहीं कि नामाजवादी कुनबे में वाकई जंग छिड़ी है ।
वो कहते हैं ……. नहीं ऐसा नहीं हो सकता …… मेरा दिल कहता है की ऐसा नहीं हो सकता ……. कह दो कि ये झूठ है । नामाजवादी कुनबे में झगड़ा नहीं हो सकता ।
17 जनवरी को चुनाव की अधिसूचना जारी हो जायेगी ।
बाप बेटे चचा भतीजा भाई भाई कुत्ते की तरह लड़ रहे हैं ……. एक दुसरे को नोच खसोट रहे ।
मोदी haters को फिर भी लगता है कि कोई बुरा सपना है ……. भ्रम है ……. सुबह जागेंगे तो सब ठीक होगा …….. उधर चुनाव आयोग कंफूज है ।
रामगोपाल 6 पेटी कागच जिनकी संख्या कुल डेढ़ लाख है धर आये चुनाव आयोग में ।
अमर सिंघवा बोल दिया सब फ़र्ज़ी है करो जांच ……..
चुनाव आयोग बोलता है इतना सब कागच जांचने में तो 6 महिन्ना लगेगा । उधर 10 दिन बाद अधिसूचना जारी हो जायेगी ।
अपने दुआर में कुकुर झौं झौं करने वाले कुत्तों को मालिक चार डंडा मार के दुत्कार देता है । बहुत संभव है कि चुनाव आयोग दोनों बाप बेटा को GPL मार के भगा देगा और चुनाव चिन्ह साइकिल को फ्रीज़ कर देगा मन
अखिलेश कांग्रेस से चुनावी pact के मूड में हैं ।
ऐसे में तय है कि अखिलेश गुट की कम से कम 100 सीट cong को जायेगी मने 100 नामाजवादियों का टिकट कट के कांग्रेसियों को मिलेगा ।
ऐसे में वो 100 क्या चुप बैठेंगे ?
दूसरी तरफ सिपाल मुलायम गुट भी कम से कम 250 से 300 प्रत्याशी मैदान में उतारेगा । UP की हर सीट पे सपा से टिकट मांगते 4 – 6 गंभीर प्रत्याशी हैं । हर सीट पे दो चार करोड़पति टिकट मांग रहे हैं । सिपाल का अब एकमात्र लक्ष्य है ……… अखिलेश को हराना ……..
सिपाल मुलायम अगर किसी को टिकट दे देंगे तो वो 10 – 20 हज़ार भोट तो ले ही मरेगा ।

एक तर्क दिया जा रहा है कि सपा अगर बँटी तो मुसलमान enblock बसपा में shift कर जाएगा ।
काश चुनावी राजनीति में सब कुछ इतना ही सीधा सपाट होता ।
हर मुस्लिम बहुल सीट पे 2 – 3 या 4 प्रत्याशी होंगे । सब वोट काटेंगे ।
2014 के लोस चुनाव में मोदी की सुनामी आती हुई साफ़ दिख रही थी इसके बावजूद मुसलमान एकतरफा enblock voting कर उसे रोक न पाए और बह गए ।

आपको दीखे चाहे न दिखे …….. UP में मोदी की सुनामी आ रही है ……. सब कुछ बहा के ले जाएगी ……. अईकील सईकील आथी हाथी सब बह जाएगा ……..
कोई आजपा भाजपा नहीं ……. कोई कमल नहीं …….. भोट पडेगा मोदी को ……. भोट पडेगा विकास के एजेंडे पे ………. भोट पडेगा भ्रष्टाचार के समूल नाश के लिए …….. भोट पडेगा प्रदेश के सर्वांगीण विकास के लिये ……… भोट पडेगा 24 घंटे बिजली के लिए ……. भोट पडेगा शानदार सड़कों के लिए …….. भोट पडेगा गुंडे बदमाशों के खिलाफ ……… भोट पडेगा जातिवाद के खिलाफ ……. भोट पडेगा हिंदुत्व के लिए …….. भोट पडेगा कटुओं की औकात बताने के लिए ।

साइकिल गयी कबाड़े में
हाथी चढ़ गया भाड़े में
अब कोई नहीं अखाड़े में …….. सिर्फ मोदी ………

direct और indirect tax कलेक्शन के आंकड़े

वित्त मंत्रालय ने आज देश में direct और indirect tax कलेक्शन के आंकड़े सार्वजनिक कर दिए ।

1) indirect टैक्स अप्रत्यक्ष कर में Nov 2016 के मुकाबले Dec 2016 में 12.8 % की बढ़ोत्तरी हुई है।

2) April 2016 से Dec 2016 तक indirect tax में 25 % की बढ़ोत्तरी हुई है। ये बढ़ के 6.30 लाख करोड़ हो गया है ।

3) अप्रैल 2016 से Dec 2016 तक Direct टैक्स में 12.01% की बढ़ोत्तरी हुई है।

4) पिछली तीन तिमाही यानी April 2016 से Dec 2016 तक उत्पाद शुल्क यानि excise duty में 43 % की बढ़ोत्तरी हुई है । excise duty का कलेक्शन 1लाख 95 हज़ार करोड़ रु से बढ़ कर दो लाख 79 हज़ार करोड़ रु हो गया है ।

5) नोटबंदी से अधिकतर राज्यों में वैट वसूली भी बढ़ी है। हालांकि, अभी तक प्राप्त डेटा सिर्फ नवंबर तक का है, दिसंबर में हुई वैट वसूली का डेटा करीब 22 जनवरी के बाद मिलेगा।

6) April 2016 से Dec 2016 तक सर्विस टैक्स की वसूली में 23.9 % की बढ़ोत्तरी हुई है। ये 1लाख 48000 करोड़ रु से बढ़ के एक लाख 83000 करोड़ रु हो गया है ।

7) Dec 2016 में Dec 2015 के मुकाबले सर्विस टैक्स में 12.4 फीसदी की बढ़ोत्तरी हुई है।

8)Dec 2016 में Dec 2015 के मुकाबले उत्पाद शुल्क में 31.6 फीसदी की बढ़ोत्तरी हुई है। इसके सबसे अधिक मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर ने अपना योगदान दिया है। गौर तलब है कि जब नोटबंदी के कारण देश में ज़बरदस्त cash crunch था और सभी TV चैनल banks के सामने लंबी लाइन दिखा रहे थे उसी दिसंबर 2016 में factory के gate पे वसूली जाने वाली excise duty मने उत्पाद शुल्क dec 2015 की तुलना में 31% बढ़ गया ।

9) Dec 2016 में Dec 2015 के मुकाबले Custom duty की वसूली में 6.3 % की गिरावट आई है। दरअसल, नोटबंदी के दौरान सोने के आयात में भारी कमी दर्ज हुई है और सीमा शुल्क का एक बड़ा हिस्सा सोने पर लगने वाले टैक्स से ही आता है।

10) April 2016 से Dec 2016 तक custom duty में 4.1 % की बढ़ोत्तरी हुई है।

11) Dec 2015 की तुलना में Dec 2016 तक सभी अप्रत्यक्ष करों को एक साथ देखा जाए तो इसमें 14.2% की बढ़ोत्तरी हुई है। यदि सिर्फ december माह की तुलना करें तो central excise में 31.6% और service tax में 12.4% की वृद्धि हुई है । अलबत्ता custom duty में 6.3 % की गिरावट आयी है ।

12) Dec 2016 की तिमाही में कुल 2.82 लाख करोड़ रु advance Tax के रूप में जमा हुआ जो पिछले वर्ष 12015 की इसी तिमाही की तुलना में 14.4% अधिक है ।

13) Corporate advance tax में 10.6% और personal income tax advance में कुल 38.2% टैक्स की वृद्धि हुई है ।

जो भी व्यक्ति नोट बंदी को फेल बताये और economy में manufacturing सेक्टर में slowdown का रोना रोये उसके मुंह पे ये पोस्ट जूते की तरह फेंक के मारो ।

नोटबंदी तो एक शिशु का पहला कदम है …….

हमारे प्रेम भैया इधर इक्लेस जादो के भोत जबर फैन हो गए हैं ।
पहले खेजड़ीबाल के फैन हुआ करते थे ।
आजकल इक्लेस जादो के हो गए हैं ।
मोदी से भोत जायदे नाराज रहते हैं ।
गाज़ीपुर जिले में इनकी जमींदारी है । नोटबंदी के कारण ऊ सारा खेतवा परती रह गया ।
परती मने जब कोई खेत न बोया जाए और ऐसे ही छूट जाए उसे हमारे यहां परती कहते हैं ।
सो नोटबंदी के कारण इनको खाद बीज जुताई डीजल नहीं मिला इसलिए सगरी जमींदारी परती रह गयी । राजघाट वाले कोवाटर की छत पे 52 बीघा पुदीना रोप थे सो नोटबंदी के कारण बिना पानी सब झुरा गया । मोदिया देस का सतियानास पीट दिया इसलिए अब प्रेम भैया इक्लेस जादो के फैन हो गये हैं । कहते हैं ……. बाह भाई बाह ……… लड़का का विकास किया है ।
हम पूछे कि ज़रा हमको भी बताओ …… का विकास किया है ?
बोले , देखते नहीं हो , नखलऊ में मेट्रो बनवा दिया । औ नखलउ से आगरा express way ……. आगरा दिल्ली पहिलहीं बहिन जी बनवाय दी थी ……. केतना सुबिधा हो गिया …….. अब गाजीपुर का सब बेरोजगार लड़का लोग जब लेपटाँप पे बिलू फिलिम देख के अघा गिया तो सब खटाक से बनारस से बरेली पसिंजर पकड़ के नखलऊ चला जाएगा । हुआँ से मेट्रो धय के सीधे एस्प्रेस वे पे धाँय से 6 घंटा में दीली ………
अ दीली जा के का करेगा गाजीपुर का सब लड़िका लोग ……….
अरे उहाँ अज़ादपुर का झोपड़पट्टी में 300 रु का खोली भाड़ा पे ले के रहेगा ……. फैट्टरी में काम करेगा ………. मजूरी करेगा …… पेट पालेगा …… जियेगा खायेगा …….. बिकास पुरुष इक्लेस जादो परदेस का विकास किये हैं ……. मोदिया साला देस बर्बाद कर दिया …….. गरीब का सब नोट बन कर दिया औ अपने सब उद्योगपति दोस्त लोग को दे दिया …….हमरी GDP छत्ते पे चढ़ गयी थी बिना सीढ़ी के ……. मोदिया साला उप्पर से धकेल दिया ……. बेचारी GDP गीर गयी ।
इधर GDP गिरी उधर नोटबंदी फेल हो गयी ?

आपको कैसे पता कि नोटबंदी फेल हो गयी ?

सारा पैसा बैंक में वापस आ गया ।

नहीं ……. लगभग 1लाख 40,000 करोड़ नहीं आया ।
इसके अलावा दो करोड़ संदिग्ध खाते 8 Nov नए खोले गये जिनमे लगभग 4 लाख करोड़ रु जमा कराये गए । इन खातों और इन रुपयों की जांच चल रही है ।
इसके अलावा कई लाख करोड़ रुपया तो ऐसा है जो लोगों ने अपने दोस्त मित्र रिश्तेदार और कर्मचारियों के खातों में , इसके अलावा जनधन खातों में जमा करा दिया ……. दो दो ढाई ढाई लाख करके ……. ये सारा वो पैसा था जो की अब तक तहखानों तिजोरियों में दबा हुआ था ……… पर अब नोट बंदी के कारण इसे मजबूरन तहखानों तिजोरियों संदूकों से निकल के बैंक में जमा होना पड़ा ……. system में आना पड़ा ……. लाखों नहीं करोड़ों ऐसे Dormant मने सुसुप्त खाते थे जो अचानक जाग गए और उनमें रातोंरात लाखों रूपये जमा हो गए ।
समाजवादी पाल्टी के एक नेता पूर्व MLA के सुरक्षा गार्ड के खाते में अचानक 100 करोड़ रु जमा हो गए । वो बेचारे रूपये …… आजतक न जाने किस अँधेरे तहखाने तिजोरी में कैद थे ……. अब किसी बैंक खाते की शोभा बढ़ा रहे हैं । सरकार की नजर निगरानी में है ।
कुल 15 लाख करोड़ की currency चलन में है ।
इसमें से ये लगभग 6 से 8 लाख करोड़ रु संदिग्ध है ।
रूपये का कोई रंग नहीं होता । वो अपने आप में काला या सफ़ेद नहीं होता । उसका रंग तो हरा या गुलाबी pink होता है । ITR मने धारक की Income Tax return उसे काला या सफ़ेद बनाती है ।
अब तक जितना पैसा तहखानों तिजोरियों से निकल के बाहर आया वो अब सरकार की आँख के सामने है । अब सरकार एक एक खाते की जांच करेगी …….. और एक पूर्व निर्धारित संवैधानिक कानूनी प्रक्रिया के तहत उसे काला या सफ़ेद धोषित किया जाएगा जिसमे समय लगेगा ।
अगर आप ये समझते हैं कि इस देश में काला धन ही नहीं था तो आप मूर्ख हैं या जान बूझ के सोच समझ के मूर्ख बन रहे हैं । कोई भी ऐसा व्यक्ति जो ढाई लाख रु से ऊपर की अघोषित रकम दबाये बैठा था वो काला धन था । मोदी की नोटबंदी उसे सबके सामने उजाले में ले आयी है ।
रही बात भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई की ……. तो नोटबंदी उस दिशा में उठाया गया पहला छोटा सा कदम है । हम आप सब जानते हैं कि असली काला धन तो बेनामी संपत्तियों और सोने चांदी हीरे जेवरात में छुपा है , मारीशस के रास्ते निवेश में छुपा है और विदेशी tax heavens में छिपा हुआ है ।
भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे एक राष्ट्र को इस दलदल से निकालने की पहली ईमानदार कोशिश किसी सरकार ने की है ।
इन तमाम तथ्यों को नज़रअंदाज़ कर यदि आप सिर्फ 50 दिन में ही इसे फेल घोषित कर देते हैं तो इसका सीधा सा मतलब ये है कि आप pathological Modi Hatred के शिकार हैं और इस घृणा जुगुप्सा के भाव ने आपकी सोचने समझने की शक्ति को कुंद कर दिया है ……… आप मोदी से घृणा के अपने पर्सनल एजेंडा में इस कदर अंधे हो चुके हैं कि राष्ट्र हित आपकी सूचि में कहीं है ही नहीं ।

नोटबंदी तो एक शिशु का पहला कदम है ……. आप बस देखते जाइये ……. अभी तो इसे मीलों जाना है ।