जल्लाद किसी को सुधार नहीं सकता. सिर्फ मार सकता है ……

बच्चों के साथ काम करते हुए बहुत अनुभव होते हैं.

बेचारे बच्चे के साथ बड़ी problem होती है. हर कोई उसे समझाना चाहता है ……. उसे कोई समझना नहीं चाहता …

स्कूल में अक्सर बच्चों को पकड़ के principal के ऑफिस में लाया जाता है. ऐसा आमतौर पे तब होता है जब मामला बेहद serious हो. तब जब बात class teacher के level से ऊपर चली जाती है. ऐसी दशा में जब बच्चे को प्रिंसिपल के सामने पेश किया जाता है तो उसकी वही मनोदशा होती है जो कसाई के सामने बकरे की होती है ……. दूसरी बात मैंने आम तौर पे स्कूलों में ये देखी है कि प्रिंसिपल अपनी इमेज स्कूल में जल्लाद जैसी बना के रखते हैं. आजकल के private स्कूलों में तो ये माहौल है कि वहाँ बच्चा तो छोड़िये teachers की भी टांगें कांपती हैं प्रिंसिपल के सामने जाने में.

मेरी सबसे अच्छी सबसे होनहार student मेरी पत्नी ही रही हैं. मैंने उनसे discuss किया ……. एक प्रिंसिपल की इमेज स्कूल में जल्लाद वाली क्यों होनी चाहिए? लीडर को जल्लाद होना चाहिए क्या ? स्कूल में मुख्य काम होता है learning …… उद्योग में मुख्य कार्य होता है सृजन. सबसे अच्छी learning या सृजन प्यार और सौहार्द्रपूर्ण वातावरण में होगा या terror के माहौल में ? इसलिए मैडम जी ने पहले दिन से ही स्कूल में अपनी छवि एक माँ की बनायी. बच्चों के लिए भी और स्टाफ के लिए भी.

जब टीचर बच्चे को पकड़ के प्रिंसिपल के सामने पेश करती है तो उस से पहले क्लास में वो माहौल कायदे से खराब कर चुकी होती है. और इस आशा में कि प्रिंसिपल अब इस बिगड़े आतंकी को सुधार देगी …..वो उसे सुप्रीम कोर्ट में पेश करती है …… उस दृश्य की कल्पना कीजिये कि एक डरा सहमा बच्चा लाया जा रहा है ….. गिरफ्तार कर के ….. जल्लाद के सामने ….. ज़्यादातर ऐसे cases में बच्चा रोता हुआ पहुंचता है प्रिंसिपल ऑफिस में ……

पर ये क्या …. वहाँ तो जाते ही सीन ही बदल गया ….. अरे क्या हुआ भाई …..क्या हुआ? मेरा बच्चा रो क्यों रहा है …… अरे इधर आओ …… और उसे बुला लिया …… गोद में बैठा लिया ….. दुलार पुचकार के शांत किया …… मुकदमा हारते देख टीचर दलील पेश करती है ……अजी बहुत बड़ा डाकू है ये ……जज साहब चुप करा देते हैं ….. आंसू पोंछे …..मुंह धुलवाया ….. candy दी ….. शांत किया ……. प्यार किया ….. 4- 6 चुम्मियां लीं , वापस भेज दिया. इस से क्या हुआ कि बच्चे में और प्रिंसिपल में परस्पर विश्वास का और प्रेम का माहौल बना. फिर शाम को या अगले दिन …..

प्रिंसिपल पहुंची क्लास में …. पूरा मामला देखा समझा और आज जबकि बच्चा शांत और सहज है उसे प्यार से handle किया. समस्या आम तौर पे बहुआयामी होती है …… हल भी बहुआयामी ही होते हैं …….

सूखे खेत में बीज नहीं फूटते. पहले खेत में अनुकूल माहौल तैयार करना पड़ता है …. अंकुरण के लिए नमी चाहिए.

problem solving के लिए पहले अनुकूल माहौल तैयार कीजिये. रेत को कितना ही पेर लो …… तेल नहीं निकलता …… charged atmosphere में कभी शान्ति की बात नहीं हो सकती.

problem solving से पहले अनुकूल माहौल बनाइये …….

जल्लाद किसी को सुधार नहीं सकता. सिर्फ मार सकता है ……

छोटे short cuts अक्सर कहीं नहीं पहुँचते ।

हम हिंदुस्तानी बाप लोग का एक फेवरिट डायलाक होता है ……..
बेटा , बाप के पैसे पे ऐश मत करो ।
अभी मौक़ा है …….. पढ़ लिख लो ।
वरना भीख मांगोगे । साले तुमको तो कोई भीख भी न देगा ।
हिन्दुस्तान का हर होनहार लौंडा अपने खडूस बाप के ये डायलॉग सुन सुन के ही जवान होता है ।

पर रोहित वेमुला की किस्मत में बाप न था ।
शायद इसीलिए रोहित वेमुला पलायन वादी हो गया ।
उसने जीवन भर short cuts खोजे ।
आसान रास्ते ।
काश उसको भी कोई समझाने वाला मिला होता कि बेटा …….. ज़िन्दगी में there is nothing like a free lunch ……
.मुफ़्त में कुछ नहीं मिलता बेटा । ये ज़िन्दगी है , कोई आम आदमी पार्टी की सरकार नहीं , जो हर चीज़ मुफ़्त में दे देगी ।
रोहित ने हमेशा short cut लिया । सिर्फ short cut ही नहीं लिया , बल्कि छोटे से भी छोटा short cut लिया । वो ज़िन्दगी भर short cuts ही खोजता रहा ।
था OBC पर उसने short Cut लिया । दलित बन गया । मर्द होता तो जनरल बनता ।
हिन्दू था , पर यहां भी उसने short cut लिया । ईसाई बन गया ।
पिछड़े हिन्दू से दलित ईसाई बन गया ।
नेता गिरी भी की तो दलितों की । हमारे यहां तो दलित पिछड़ों की तो नेतागीरी भी आसान है । सवर्णों की नेतागीरी करने में तो भैया दांत से पसीना आ जाता है ।

पढ़ लिख के कुछ बन जाता , कुछ हासिल कर लेता , कहीं किसी मोटे तगड़े भारी भरकम package वाली नौकरी करता , मोटे पैसे कमाता , और फिर ज़िन्दगी भर ऐश करता । पर उसने यहां भी short cut लिया । fellowship के पैसे से ही ऐश करने लगा । फ़ेलोशिप indiscipline और गुंडागिरी के कारण बंद हो गयी तो कर्ज़ा ले के जीने लगा …….. once again छोटा short cut ……..

जब hostel से निष्कासन हुआ , और जब university के इस फैसले के खिलाफ अनशन पे बैठे , तो कुछ दिन एकांत लाभ मिला । एकांत लाभ यूँ मिला कि अनशन जैसे बोरिंग काम से तमाशबीन बहुत जल्दी ऊब जाते हैं । अकसर देखा जाता है कि अनशनकारी अकेले पड़े रहते हैं । कोई मूतने भी नहीं आता । सो उस एकांत वास में इन ने जब introspection किया तो पाया कि ज़िन्दगी में तमाम short cuts मार के भी उनकी ज़िन्दगी की गाडी कही पहुँच नहीं रही ।
Phd अटक गयी । और अब तक जो पढ़ाई की उस से कुछ मिलेगा नहीं ।
Hostel था , fellowship थी तो ज़्यादा नहीं तो साल दो साल का जुगाड़ तो था ?
अब इस नेता गिरी में तो वो भी गया ।
Short cut मार के भी ज़िन्दगी कहीं पहुँचती नहीं दिखी तो उन ने इसका हल जानते हैं क्या खोजा ?
एक और Short Cut ।
एक और छोटा Short Cut ………

जनाब पंखे से लटक गए ।
आज एक पोस्ट पे मेरे एक मित्र comment box में पिले पड़े थे और उसके OBC से दलित बन जाने को justify कर रहे थे । तर्क संगत और न्याय संगत बता रहे थे ।
ये पोस्ट बस उन्ही के उस कुतर्क को समर्पित है ।

ज़िन्दगी में छोटे short cut अक्सर बहुत लंबे हो जाते हैं ।
इसलिए जो सच है और जो सही है , उसी मार्ग पर चलो ।
क्योंकि छोटे short cuts अक्सर कहीं नहीं पहुँचते ।

पिछले साल की पोस्ट …….

बच्चों को संघर्ष करने दो

 

बचपन में एक गुरूजी थे ….वो एक कहानी सुनाते थे ……यूँ कि एक biology  क्लास में गुरूजी बच्चों को दिखा रहे थे कि कैसे एक तितली अंडे को  फोड़ के बाहर निकलती है ……सब बच्चे बड़े गौर से देख रहे थे ……कई सारे अंडे थे …….तितलियाँ  अण्डों  को तोड़ कर बाहर आने के लिए संघर्ष कर रही थीं ……… पंख फडफडा रही थी ….हाथ  पैर चला रही थी ………बहुत देर तक ये जद्दो जहद चलती रही ….तभी एक बच्चे को ये देख कर दया आ गयी ……उसने एक अंडे को तोड़ दिया …और वो तितली आज़ाद हो गयी और बाहर आ गयी …………..पर बाकी सब तितलियाँ इतनी खुशनसीब न थीं ………क्योंकि बाकी बच्चे सब इतने  दयालु  न थे ….सो उन बेचारियों  का संघर्ष चलता रहा  , चलता रहा ………..खैर  समय  होने  पर वो सब भी एक एक कर के अपने अण्डों को तोड़ कर बाहर निकल  आयीं ………..पूरी क्लास रूम में तितलियाँ ही तितलियाँ थीं ….रंग बिरंगी खूबसूरत तितलियाँ ……….सब तितलियाँ धीरे धीरे उड़ने लगी और फिर उड़ते हुए बाहर पार्क में चली गयीं ……..पर एक तितली थी जो कोशिश करने पर भी उड़ नहीं पा रही थी ………वो वहीं टेबल पर ही बैठी थी ………कुछ देर उसने कोशिश की  पर नहीं उड़ पाई …और फिर थोड़ी देर बाद मर गयी ………टीचर भी हैरान था और बच्चे भी समझ नहीं पा  रहे थे कि ऐसा क्यों हुआ …….फिर उस लड़के ने बताया कि ये वही तितली थी जिसका अंडा उस लड़के ने फोड़ दिया था ………..तब टीचर ने उन्हें बताया कि तुमने उस पर दया कर के अपनी नादानी से उसकी  जान ले ली …………उस अंडे के भीतर जब वो संघर्ष कर रही थी …हाथ पैर मार रही थी …..पंख फडफडा रही थी …..उसी संघर्ष से उसके हाथों पैरों और पंखों  में इतनी ताकत आती कि वो जीवन भर उनसे उडती रहती ………..तुमने वो मौक़ा उससे छीन लिया ……..नतीजा तुम्हारे सामने है ………….

 

मेरा शहर जालंधर बड़ा ही खूबसूरत शहर है …….साफ़ सुथरा सा …….खूब खुली चौड़ी चौड़ी सडकें हैं ……….पिछले एक साल में 5  नए fly  over  बन गए हैं ….इस से अब traffic  की भीड़ भाड़ भी कम हो गयी है ……….हर कालोनी में बड़े बड़े पार्क हैं जिनमे खूबसूरत फूल पौधे और मखमली घास लगी है ………नगर निगम हर पार्क की देख रेख करता है …..हर पार्क में बुजुर्गों  के टहलने  के लिए बाकायदा cemented  ट्रैक बना हुआ है ……………… बच्चों के लिए झूले लगे हुए हैं …………..पर उनके खेलने के लिए कोई व्यवस्था नहीं है …………..मौज मस्ती के लिए तो है ……पर खेलने के लिए नहीं ………….यानी कि अगर वो फुटबाल , volleyball या ऐसी कोई गेम खेलना चाहें तो इतने बड़े पार्क में कोई जगह नहीं ……….पर बच्चे तो आखिर बच्चे ठहरे …..वो कहाँ बाज आते हैं ……पर पार्क में खेलना मना  है …..क्यों भैया …..इस से घास और फूल पौधे खराब होते हैं …….अब हमारे घर के पास एक पार्क है …..वहां कालोनी की welfare  association  के प्रधान  एक retired  colonel  साहब हैं  …वो पार्क के रख रखाव पे बहुत ज्यादा ध्यान देते हैं …..क्या मजाल कि कोई बच्चा कोई फुटबाल ले आये ………..अब समस्या ये की वो भी खडूस और मैं भी खडूस …..मैं उनसे भिड़ गया …………..मैंने उन्हें समझाने की कोशिश की………के जनाब  ये बच्चे हैं ,  इस उम्र में इनके लिए ये बहुत ज़रूरी है की ये खूब भागें दौडें ………….medical  science  भी कहती है कि एक स्वस्थ बच्चे को कम से कम दो घंटे ऐसी physical  activity  करनी चाहिए कि उसकी heart  beat 120  per minute से ऊपर रहे ….इससे उसका  heart  , lungs , muscles  और पूरी body , strong और fit  होगी ………अब आज के शहरी जीवन में बेचारे बच्चे वैसे ही पढाई के बोझ के मारे …….उनके पास पहले ही टाइम नहीं ……..न खेल उनकी और उनके parents  की प्राथमिकता ……..और अब अगर वो थोडा बहुत खेलना भी चाहें तो आप नहीं खेलने देंगे ………उन्होंने तर्क दिया कि खेलना है तो stadium  जाएँ ……..अजी जनाब 6  किलो मीटर दूर है stadium  ………फिर इतना टाइम कहाँ है बच्चे के पास ……….दूसरे पूरे शहर के लिए सिर्फ एक stadium  ……..सोच के देखिये …शहर का हर बच्चा stadium  जा सकता है क्या ??????? 30  – 40  बच्चों के लिए एक फुटबाल ground  जितनी जगह चाहिए ……..शहर में 50  stadium  भी कम पड़ जायेंगे ………..हर कालोनी में इतना बड़ा पार्क है ….हज़ारों पार्क हैं जालंधर में …………. साले बुड्ढे ………कब्र में तेरे पाँव लटके हैं ……पर तुझे अपने टहलने के लिए हर पार्क में एक ट्रैक चाहिए ………..पर हर पार्क में तू एक बास्केटबाल कोर्ट नहीं बनवा सकता ………तुझे इन फूल पौधों की तो चिंता है ….कहीं ये पौधा खराब न हो जाए ……….पर ये जो फूल से बच्चे ….जो बेचारे सारा दिन बस्ते के बोझ तले दबे ……..जंक फ़ूड खा के मोटाते बच्चे ……..सारा दिन विडियो गेम खेल रहे हैं ………..इनकी भी थोड़ी चिंता कर ले यार …………

मुझे तरस आता है इन ,  तथा कथित पढ़े लिखे समझदार ……बुद्धिजीवियों पर ……………….देश के बच्चों के प्रति इनके रवैये पर ……..मैं काफी समय से इनके बीच काम कर रहा हूँ ……..हमारे देश में शहरी बच्चों की फिटनेस बहुत खराब है ………बच्चे मोटे हो रहे हैं या under weight  हैं ……उनकी eating habits बहुत खराब हैं ….पर parents बेखबर हैं ……..या लापरवाह हैं …..या यूँ कह लीजिये लाचार हैं ………….पश्चिमी देशों में स्कूल में physical  activity  पे बहुत ज्यादा ध्यान दिया जाता है ………….यहाँ जालंधर में एक नया स्कूल खुला …..उसका प्रिंसिपल एक अँगरेज़ था ……उसने स्कूल uniform    बदल के track suit और sports shoes कर दी ………और सुबह एक घंटा की vigourous  physical  activity cumpulsory कर दी ……..हमारे बेहद समझदार परेंट्स को ये बात समझ न आयी और मैनेजमेंट ने उस प्रिंसिपल को भगा दिया …………..अब सारे बच्चे टाई लगा के स्कूल आते हैं  और सारा दिन खूब मन लगा के पढ़ते हैं …………

हमारी कालोनी के उस कर्नल साहब को ये बात अब तक समझ नहीं आयी है ………वो सुबह hat लगा के और हाथ में छोटा सा डंडा ले के उस पार्क में morning  walk करता है …..कालोनी के बच्चे अपने PC पे विडियो गेम खेल कर सेहत बना रहे हैं ………………पर मैंने भी कर्नल  से पक्की दोस्ती  कर ली है और मैं उसे रोज़ समझाता हूँ कि हर कालोनी में एक पार्क होना  चाहिए ……जिसमे एक भी फूल पौधा नहीं होना चाहिए …..पर ढेर सारे बच्चे होने चाहिए ………ground  होने चाहिए ………जहां बच्चे खूब दौड़े भागें ……खेले कूदें ……….धूल मिट्टी में , पसीने से लथपथ ……होने दो अगर गंदे होते हैं कपडे ……….फूटने दो घुटने ……..बहने  दो पसीना , और थोडा बहुत खून ………….और सुबह सडकें खाली होती हैं …..तुम साले बुढवे ………वहाँ जा के टहला करो , अगर बहुर शौक है टहलने का ….और कम्पनी बाग़ में खूब फूल पत्ती है …वहाँ जा के सूंघ गुलाब का फूल ….इन  तितलियों को संघर्ष करने दो …..हाथ पाँव से मज़बूत होने दो ……….क्योंकि कल सारी दुनिया फतह करनी है इन्हें …..कालोनी के उस पार्क में यही फूल खिलते अच्छे लगेंगे ………….

Problem Solving का Sandwich Method

Problem Solving का Sandwich Method

उन दिनों हम लखनऊ में रहा करते थे । सबसे छोटा बेटा दानू वहाँ एक स्कूल में 1st में पढता था । स्कूल एक मुस्लिम उद्योगपति की बेटी चलाती थी जिसका जन्म दुबई में हुआ था और वो स्वयं वहाँ दुबई की British Embassy School की student रही थी । एक बेहतरीन school की स्टूडेंट होने के नाते वो अपने स्कूल को भी उसी pattern पे और बहुत ही मेहनत से , बड़े प्यार से चलाती थी । दिन रात मेहनत करती थी । दानू को स्कूल में कोई समस्या थी । उसके समाधान के लिए हम दोनों पति पत्नी स्कूल गए । मामला कुछ ऐसा था कि क्लास teacher को झाड़ पड़नी तय थी और हम दोनों उसे इस situation में डालना नहीं चाहते थे । बड़ा पेचीदा मामला था ।

तो साहब हम दोनों पहुंचे ऑफिस …..

जी कहिये ……

हमने उन्हें कहा की सबसे पहले तो हम आपको ये मुबारकबाद देने आये हैं कि आप एक बेहतरीन स्कूल चलाती हैं ।
बस इतना सुनना था कि मैडम तो फट पड़ीं और उन्होंने तो साहब अपना दिल खोल के धर दिया । और अपने बचपन के वो तमाम अनुभव , British स्कूल के …… सुनाने लगी …..और कैसे कि वो एक बेहतरीन स्कूल का सपना जी रही हैं ……. मैडम आधा घंटा भाव विभोर हो अपना सपना जीती रही ….फिर उन्हें अचानक ख़याल आया ….. अच्छा आप बताइए , आप कैसे आये ?

madam हम दरअसल ये चाहते है की आपका ये बेहतरीन स्कूल और बेहतरीन बने । आपका स्टाफ ….. कितनी मेहनत करते हैं बेचारे । दिन रात लगे रहते हैं ….. और हमारे दानू की मैडम …… कितनी अच्छी लड़की है बेचारी …… बस ये एक छोटी सी समस्या थी ……

मैडम जी ने तुरंत एक्शन लिया …..क्लास टीचर आई और वो समस्या जो कल तक सास बहू के सीरियल की कहानी से भी ज़्यादा पेचीदी थी और जिसपे कल तक तृतीय विश्व युद्ध अवश्यम्भावी लग रहा था चुटकियों में हल हो गयी ।

Problem solving और Criticism की इस कला को Sandwich method कहा जाता है । किसी की आलोचना करने से पहले उसकी सच्ची तारीफ करो । एकदम genuine ….. फिर जब माहौल पूरी तरह positive हो जाए ….. एकदम फुल्टू सौहार्दपूर्ण ….. तो ये कहते हुए कि आपको और अच्छा बनाने के लिए ये फलां फलां काम , ये समस्या ये कमी दुरुस्त करनी चाहिए जिस से कि आप एकदम World Champion हो जाओगे …… Bread के दो pieces के बीच खीरा प्याज टमाटर लगाओ ……

किसी की आलोचना करने के पहले और बाद में उसकी तारीफ करो ……क्योंकि आपका उद्देश्य समस्या को हल करना है …… बढ़ाना नहीं ……..

रेगिस्तान का cactus बनो । Cactus कभी नहीं मरते ……..

अभी एक मित्र की पोस्ट पढ़ी fb पे ।
वो बता रहे थे कि पिछले दो महीने में वो कितनी बार bank और ATM की लाइन में कै कै घंटे और कै मिनट खड़े रहे ।
मुझे ध्यान आया , मैं और मेरा पूरा परिवार मने धर्म पत्नी और 3 बच्चों समेत एक भी आदमी इन 60 दिन में किसी बैंक या atm की लाइन में नहीं लगा । बस एक बार दिग्विजय लगा था 15 मिनट के लिए सो यहां पूर्वांचल में 15 मिनट की लाइन को लाइन नहीं माना जाता क्योंकि हमारे यहां सैदपुर में तो शांतिकाल अर्थात नोटबंदी से पूर्व भी ATM की लाइन में डेढ़ दो घंटा खड़े रहना आम बात थी ।
सो सवाल है कि मेरा कुनबा इस भयंकर cash crunch में भी line में खड़े रहने से कैसे बच गया ।
और फिर यही नहीं , मेरा परिवार तो आज तक किसी भी लाइन में कभी नहीं लगा । चाहे जैसी लाइन हो …… रेल बस की होय या कोई अन्य हो , रिजर्वेशन की हो …… मेरे लौंडे या मैं कभी लाइन में ना लगे ……. जानते हैं क्यों ?
मैंने अपने बच्चों को कभी formal शिक्षा मने स्कूली किताबी ज्ञान नहीं दिया ……. बड़का तो फिर भी कुछ दिन स्कूल गया , दोनों छोटे तो कभी स्कूल गए ही नहीं ……. इन सबको मैंने home education दी ……. बिना किसी syllabus curriculam के व्यवहारिक शिक्षा …….. और स्किल के नाम पे सिर्फ एक skill सिखायी ……. survival skill ……. मने इस जंगल में ज़िंदा कैसे रहना है ……… How to survive in this jungle among wolves …….. हमारे इस मुल्क में एक बड़ी जबरदस्त तकनीक है जिसे जुगाड़ तकनीक कहा जाता है । यदि आप इस तकनीक में महारथ हासिल कर लें तो आप छोटी से छोटी और बड़ी से बड़ी समस्या का हल चुटकियों में कर सकते हैं । और इस तकनीक को साधने के लिए आपको ज़्यादा से ज़्यादा समय अपने मम्मी पापा के पल्लू और गोद से दूर , घर की comforts से दूर , बिना प्लानिंग के , बिना रिजर्वेशन के , general और cattle class में travel करते बितानी पड़ती है , bare minimum मने न्यूनतम में गुजारा करना …….. जुगाड़ से लंबे समय तक जीना खाना …… मने सिर्फ एक jeans टी शर्ट में 15 दिन गुज़ार देना , ज़रूरत पड़ने पे एक mug पानी में नहा लेना , प्लेटफॉर्म पे अखबार या गमछा और वो भी न हो तो यूँ ही सिर के नीचे जूता रख के सो लेना और बिना पइसा के भर पेट खा लेना …….. जब ये स्किल आपके अंदर आ जाए ……. तो मान लीजिए कि अब आपको जंगल में छोड़ा जा सकता है ……. आप मरेंगे नहीं ………

मैंने अपने बच्चों को हमेशा सिखाया है ……. जलकुम्भी मत बनो ……. रेगिस्तान का cactus बनो ।
Cactus कभी नहीं मरते ……..
रेगिस्तान में उगे cactus में जो फूल खिलते हैं वो सालों नहीं मुरझाते ।

जलकुम्भी महीने दो महीने में सूख जाती है ।

करीना कपूर ने अपने बेटे का नाम तैमूर क्यों रखा ?

पिछले दिनों पौष मास की 8वीं तिथि से 15वीं तिथि तक मैं पंजाब में था ।
ये वो सप्ताह है जब कि सिखों और हिंदुओं के दशम गुरु महाराज श्री गुरु गोविन्द सिंह जी का पूरा परिवार , चार बेटे कौम और धर्म के लिए शहीद हो गए ।
उनके बेटों की उम्र 17 बरस , 14 बरस , 8 बरस और 6 बरस की थी ।
दोनों बड़े बेटे युद्ध में मुग़ल सेना से लड़ते तलवार चलाते हुए शहीद हुए ।
छोटे बेटों को दीवार में जिंदा चिनवा दिया गया और जब फिर भी न मरे तो उन्हें जिबह किया गया …… मने गले रेत दिये गए । ठीक वैसे ही जैसे आजकल ISIS रेत रहा है सीरिया इराक़ में ……..
एक हफ्ते में पूरा परिवार क़ुर्बान ?
ऐसी मिसाल इतिहास में कहाँ मिलती है ?

मेरी पत्नी आजकल सुल्तानपुर लोधी के एक स्कूल की प्रिंसिपल हैं ।
पंजाब में सिखों की जो तीन पवित्र नगरियाँ हैं उनमें से एक है सुल्तानपुर लोधी । बाकी दो हैं श्री अमृतसर साहब और श्री आनंदपुर साहिब ।
सुल्तानपुर लोधी वो जगह है जहां गुरु नानक देव जी 14 बरस रहे थे ।
सुल्तानपुर लोधी सिख बाहुल्य क्षेत्र है ।
मेरी पत्नी के स्कूल में 90% बच्चे सिख हैं ।
पिछले दिनों 20 से 30 दिसंबर के बीच प्रिंसिपल साहिबा ने एक अभियान चला के स्कूल के बच्चों को गौरवशाली सिख इतिहास से अवगत कराया । स्कूल में ” चार साहिबजादे ” फिल्म दिखाई गयी । पूरे 10 दिन तक कार्यक्रम चले । बच्चों में project बनाये । google और youtube खंगाला गया । बच्चों को homework दिया गया कि अपने दादा दादी नाना नानी मम्मी पापा से चार साहिबज़ादों की शहादत की कहानी सुनो और फिर उसे अपने शब्दों में लिखो ।
जो परिणाम आये वो स्तब्ध कारी थे । बच्चों ने स्कूल आ के बताया कि अधिकाँश बुज़ुर्गों और माँ बाप को स्वयं नहीं पता कुछ भी ……. यहां तक की चारों साहिबज़ादों के नाम तक याद नहीं ।
मेरी पत्नी बताने लगी ……. इतने बड़े स्कूल में एक भी बच्चे का नाम अजीत सिंह , जुझार सिंह , जोरावर सिंह या फ़तेह सिंह नहीं । पूरे स्कूल में सिर्फ एक बच्चे का नाम जुझार सिंह है ।
इस जूझार सिंह नामक बच्चे के parents NRI हैं और इटली में रहते हैं । जूझार कि बहन का नाम Olivia है ……… पूरे स्कूल में एक भी बच्चे का नाम गोबिंद सिंह या हरि किशन सिंह नहीं है । जबकि ये वो लोग हैं जिन्होंने अपनी गर्दनें वार दीं कौम और धर्म की रक्षा में ।

ये हाल है सुल्तानपुर लोधी के एक स्कूल का जहां 14 बड़े गुरुद्वारे हैं और ये सिखों का एक अत्यंत महत्वपूर्ण तीर्थ स्थल है । शेष पंजाब का अंदाज़ा आप स्वयं लगा लीजिये ।
आखिर ऐसा क्यों है ? क्या ये हमारे education system का failure नहीं है ?
क्यों हमने अपना इतिहास भुला दिया ?
किसी ज़माने में पंजाब में ये परंपरा थी कि इस एक हफ्ते में लोग भूमि शयन करते थे ( क्योंकि माता गूजरी के साथ दोनों छोटे साहिबज़ादों को सरहिंद के किले में ठंडी बुर्ज में कैद कर रखा गया था और आपने ये तीनों ठंडी रातें ठिठुरते हुए बितायी थीं ) उनके शोक या सम्मान में पंजाब के लोग ये एक हफ्ता जमीन पे सोते थे ……. पर अब पंजाबियों ने इसे भी भुला दिया है ।इस एक हफ्ते में कोई शादी ब्याह का उत्सव celebration नहीं होते थे …… पर उस दिन जब कि दोनों छोटे साहिबज़ादों का शहीदी दिवस था , जालंधर की एक party में सिखों को सर पे शराब के गिलास रख के नाचते देखा ।
अगले दिन मेरी पत्नी आग बबूला थी और उन्होंने स्कूल में 10th क्लास के बच्चों को lecture दे के अपनी भड़ास निकाली ।
आजकल winter vacations हैं और बहुत ज़्यादा कोहरा धुंद है पर उन्होंने तय किया है कि वो बहुत जल्दी अपने स्कूल के बच्चों का एक educational tour ले के जाएंगी , आनंदपुर साहिब से ले के उस किले तक जहां चारों साहिबज़ादे शहीद हुए ।
सवाल है कि सैफ अली और करीना कपूर ने अपने बेटे का नाम तैमूर क्यों रखा ?
क्योंकि उनको कभी तैमूर का इतिहास पढ़ाया ही नहीं गया ।
अगर हमारी कौम ने गुरु गोबिंद सिंह और तैमूर का इतिहास पढ़ा होता और इन्हें ज़रा भी इतिहास बोध होता तो आज शायद आधे पंजाब का नाम अजीत सिंह फ़तेह सिंह जूझार और जोरावर सिंह होता ……. गोबिंद सिंह और हरि किशन सिंह होता …….. और करीना के बेटे का नाम तैमूर न होता ।

जो कौमें अपना इतिहास अपनी कुर्बानियाँ भूल जाती हैं वो खुद इतिहास बन जाती हैं ।

देश में सिखों के चुटकुले बड़े चाव से सुने सुनाये जाते हैं ।
हंसी मज़ाक और मखौल के पात्र रहे हैं सिख इस देश में ।
कहा जाता है कि सिखों का दिमाग दोपहर 12 बजे खराब हो जाता है ।

मिति 8 पौष ……. चमकौर साहिब …… वर्तमान पंजाब का फतेहगढ़ साहिब जिला ……..
दो दिन पहले यानी 6 पौष , सिखी के संस्थापक दशम् गुरु श्री गुरु गोबिंद सिंह जी महाराज ने आनंद पुर साहब का किला खाली कर दिया ।
उनके साथ उनका पूरा परिवार मने 4 बेटे , माता गूजरी ……… और लगभग 40 सिख योद्धा थे ।
आनंदपुर साहिब से कुछ मील की दूरी पे किन्ही कारणों से परिवार उनसे बिछुड़ गया ।
दोनों बड़े बेटे 17 वर्षीय अजीत सिंह जी और 14 वर्षीय जूझार सिंह जी उनके साथ रह गए और दोनों छोटे साहिबजादे 8 वर्षीय जोरावर सिंह और 6 वर्षीय फ़तेह सिंह जी माता गूजरी के साथ रह गए ।
जिस स्थान पे परिवार अलग हुआ आज वहाँ गुरुद्वारा परिवार विछोड़ा साहिब स्थापित हैं ……..

वो रात गुरु साहब ने रोपड़ के पास कोटला निहंग खां के पास गुजारी ।
माता गूजरी दोनों छोटे साहिबजादों के साथ कुम्भे मश्की की झुग्गी में रहीं ।

अगले दिन यानि 7 पौष ……. गुरु साहिब जी चमकौर साहिब पहुंचे …….
माता गूजरी और दोनों छोटे बच्चों को गंगू अपने साथ अपने गाँव ले गया ।

अगले दिन सुबह ……. यानि पूस माह की 8 तारीख को चमकौर साहब का ऐतीहासिक युद्ध शुरू हुआ । गुरु साहब के साथ दोनों साहिबजादे और लगभग 40 सिख योद्धा थे । उधर मुग़लों की विशाल सेना ।
दोनों साहिबजादे और सिख योद्धा वीरगति को प्राप्त हुए ।
शेष बचे सिखों ने गुरु जी को सुरक्षित निकल जाने को कहा …….. बताया जाता है कि जब युद्ध भूमि से निकलने लगे तो एक सिख योद्धा का पैर बड़े साहिबजादे अजित सिंह जी के मृत शरीर से टकराया । सिख ने अपनी कमर में बंधा वस्त्र खोल के उनका मुख ढक दिया ।
गुरु साहब ने जब ये देखा तो बोले …….. वापस उठा लो ये कपड़ा ……..
कफ़न या तो सभी सिखों को ओढाओ नहीं तो इसे भी खुला ही छोड़ दो …….
आखिर बाकी 40 जो शहीद हुए वो भी तो मेरे पुत्र ही हैं ……..

17 साल और 14 साल ……… क्षत्रिय के लिए कहा जाता है कि उसकी आयु ईश्वर के यहाँ से 18 वर्ष ही लिख़ के आती है । युद्ध भूमि में क्षत्रिय 18 बरस से ऊपर जिए तो ऐसे जीवन को धिक्कार ………

गुरु गोबिंद सिंह जी जब 9 साल के थे तो उनके पिता श्री गुरु तेग बहादुर सिंह जी शहीद हो गए ।
सिर्फ 41 वर्ष की आयु में स्वयं गुरु जी शहीद हुए ।
4 बेटे न्योछावर कर दिए देश कौम और धर्म के लिए ………

सही कहते हैं …….. ऐसी कुर्बानियां तो कोई दीवाना पागल ही दे सकता है …….
वो जिसका दिमाग 12 बजे सटक जाता हो ……..
गुरु साहब ने अगर जीवन में आसान रास्ता चुना होता तो कम से कम सिखों को ये चुटकुले तो न सुनने पड़ते ?

मुंबई में छत्रपति शिवा जी महाराज की मूर्ति स्थापित होने जा रही है ।
कुछ लोगों को ये tax payers के पैसे की wastage लगती है ।
भारत ने अपना इतिहास भुला दिया ।
ये जो सप्ताह अभी चल रहा है …… यानि 20 दिसम्बर से ले के 27 दिसम्बर तक …….. इन्ही 7 दिनों में गुरु गोबिंद सिंह जी का पूरा परिवार शहीद हो गया था ।
इधर हिन्दुस्तान Christmas के जश्न में डूबा एक दूसरे को बधाइयां दे रहा है ।
एक ज़माना था जब यहाँ पंजाब में इस हफ्ते …….. सब लोग ज़मीन पे सोते थे …….. क्योंकि माता गूजरी ने वो रात , दोनों छोटे साहिबजादों के साथ , नवाब वजीर खां की गिरफ्त में , सरहिन्द के किले में , ठंडी बुर्ज में गुजारी थी …….. ये सप्ताह सिख इतिहास में शोक का सप्ताह होता है …….. पर आज देखता हूँ कि पंजाब समेत पूरा हिन्दुस्तान जश्न में डूबा है ……..
गुरु गोबिंद सिंह जी की कुर्बानियों को इस अहसान फरामोश मुल्क ने सिर्फ 300 साल में भुला दिया …….. जो कौमें अपना इतिहास अपनी कुर्बानियाँ भूल जाती हैं वो खुद इतिहास बन जाती है ।

सिर्फ 3200 करोड़ में बन रही है मूर्ति शिवा जी की ???????
गुरु गोबिंद सिंह जी और उनके चारों साहिबजादों की भी मूर्तियाँ बननी चाहिए यहाँ आनंदपुर साहिब और फतेहगढ़ साहिब में ……..

Lest we forget ……..

कुछ ज़ख्म कभी भरने नहीं चाहिए ।

आज से कुछ साल पहले मेरी पैर में fracture हो गया ।
पंजे में ।
पहले तो मैंने उसे मामूली मोच समझ ignore किया । खिलाड़ियों को ऐसी मोच आना आम बात है । जब एक डेढ़ महीने तक भी दर्द न गया तो XRay कराया । Dr ने बताया जनाब कायदे से टूटी हुई है हड्डी …… प्लास्टर लगा डेढ़ महीने …… मने 3 महीने मैं लंगडा के चला । मित्रों ने लंगडा लंगडा कह के बुलाना शुरू कर दिया । फिर वो लंगडा तैमुर लंगडा हो गया ।
धीरे धीरे मेरा नाम ही रख दिया गया तैमूर लंगडा ।
ये वो दिन थे जब हम computer illiterate हुआ करते थे ।
मुझे आज भी वो दिन याद है जब हमने जालंधर में काम करना शुरू किया तो एक सहयोगी ने कहा अपना email देना …… हम दोनों मियाँ बीवी भेड़िया बाँय …… तय हुआ कि अब तो email account बनवाना पडेगा । मुझे आज भी याद है , model town के उस cyber cafe में एक लौंडे ने 30 रु लिए थे email Id बनाने के । और फिर जब मेरी छोटी बहन ने मुझे लिखने के लिए प्रेरित करना शुरू किया तो उसी ने मेरा blog account और Fb account बनाया । ये वो दिन थे जब मैं ब्लॉग लिख तो लेता था पर उसे copy paste करना नहीं आता था fb पे । वो भी बड़ा मशहूर चुटकुला ही बन गया जब मैंने अपने एक कम्पूटर ज्ञाता मित्र से कहा कि भाई मैं महीना दो महीना तेरे पास लगा ले रिया हूँ ….. तू मेरे कू ये copy paste करना तो सिखा ही दे । तो उसी दौर में मेरे उसी मित्र ने मेरा एक Gmail ac बनाया …….. taimur.lang27@gmail.com
ये कम्बखत आज भी मेरा google ac है ।
ये तो जब ये करीना कपूर के बच्चे के नाम पे चिहाड़ मची तो मुझे मामले की गंभीरता का अहसास हुआ । मुद्दे की बात ये कि इस से पहले आज तक न मुझे खुद कभी अहसास हुआ और न मैंने कभी खुद सोचा कि मेरे नाम के साथ …… चाहे मज़ाक में ही सही ……. इतने भयानक कातिल का नाम क्यों जुड़ा है ?
सच बताऊँ ?
हालांकि मैं खुद को पढ़ा लिखा जागरूक जाग्रत व्यक्ति मानता हूँ पर सच ये है कि मुझे तैमूर लंग और ऐसे ही हज़ारों कातिलों के बारे में कोई जानकारी है ही नहीं …….
दोष किसका है ?
हमारे education system ने secularism के चक्कर में इन इस्लामिक कातिलों की करतूत कभी हमारे सामने आने ही नहीं दी गयी । history को dilute कर दिया गया । अकबर महान हो गए । औरग्ज़ेब सूफी संत ……. गजनी गोरी महान योद्धा …… और बाकी सब सेक्युलर इतिहासकारों की बाजीगरी जादूगरी में गायब कर दिए गए ।

Dr राजीव भाई ( लन्दन ) ने सवाल उठाया …….. हॉलीवुड में Holocaust पे और 2nd WW पे इतनी फिल्में क्यों बनती हैं ……. इसलिए बनती हैं कि आत्मा को झकझोरते रहे । Jews Hitler को कभी मरने नहीं देंगे । कुछ ज़ख्म ऐसे होने चाहिए कि कभी न भरें …….. हिन्दुओं ने वो तमाम क़त्लेआम वो तमाम अत्याचार भुला दिए जो उनपे हुए 1400 साल तक …….. हिन्दू भूल गए …….
भूल गए तैमूर , चंगेज़ खां , गजनी , गोरी और बाबर हुमायूं अकबर औरंगजेब को ……. भूल गए चित्तौड़ के जौहर को …….

कुछ ज़ख्म कभी भरने नहीं चाहिए ।

teacher प्रिंसिपल जल्लाद जैसा नहीं होना चाहिए

बात 1970 की है । यानी आज से कोई 46 साल पहले की ।
आप बीती है ।
जो खुद पे बीती हो , first hand experiences ……. जीवन के अनुभव ही सब कुछ सिखाते हैं ।
मेरी उम्र 5 साल की थी ।
सिकंदराबाद के फौजी इलाके त्रिमलगिरी की फौजी बैरक में उन दिनों KV चलता था ।
KV बोले तो केंद्रीय विद्यालय ।
उसमे 1st क्लास में मेरा एडमिशन हुआ । मेरी क्लास टीचर एक तेलुगू महिला थी । उसके दांत बाहर को निकले हुए थे । शायद उस जमाने में अभी Orthodontistry अभी नहीं आई थी वरना वो भी अपने दांत ठीक करा लेती ।
तो वो मेरे जीवन का पहला अनुभव था स्कूल जाने का ।
कुछ दिनों बाद की बात है …… तब जब कि हम स्कूल के उस माहौल में हिलमिल गए थे ……. क्लास ख़त्म हुई थी …… क्लास टीचर को बच्चों ने घेर रखा था । और कुछ parents भी थे शायद …… कुछ बच्चों की मम्मियाँ थीं ……… और मैं अपनी मैडम से कुछ कहना चाहता था । पर वो इतने लोगों से घिरी हुई थी कि मेरी बात सुन नहीं रही थी ।
तो मैंने ठीक वही काम किया जो मैं अपनी माँ के साथ करता था , ऐसी परिस्थिति में , जब वो मेरी बात नहीं सुनती थीं । मैंने उनकी ठुड्डी ( chin )पकड़ के अपनी तरफ खीच ली ……. पहले मेरी बात सुनो ……. मेरा ऐसा करना था कि उस class teacher ने मुझे बहुत बुरी तरह झिड़क दिया ।
Hey ……. don’t touch me ……. don’t you ever touch me ……..
उस दिन मझे जिंदगी का एक बहुत बड़ा सबक मिला …….. दुनिया में सिर्फ एक औरत है जो तुम्हारी माँ है ……. उसके अलावा और कोई नहीं जिस से तुम्हें माँ का स्नेह और वात्सल्य मिलेगा ……..
मैं दरअसल अपनी class teacher को माँ समझने की भूल कर बैठा था ।
उसके बाद फिर कभी मुझे अपनी किसी टीचर के प्रति माँ जैसी feeling नहीं आई ।
फिर कालान्तर में नियति स्वयं मुझे और मेरी पत्नी को शिक्षण कार्य में घसीट लायी ।
हमारा स्कूल कोई traditional स्कूल न था । हम दोनों education के लिए formally trained भी न थे । और कोई बताने सिखाने वाला भी न था । जो कुछ भी सीखा समझा खुद ही ठोकरें खा खा के trial n error method से सीखा । सीखने में बहुत समय भी लगा ।
शुरुआत पूर्वी उत्तरप्रदेश के एक गाँव से की थी जहां पेड़ के नीचे बैठा के पढ़ाया करते थे । फिर नियति जैसे दिल्ली से माहपुर ले गयी थी वैसे ही माहपुर से जालंधर ले आई ।
यहाँ का set up माहपुर से कुछ अलग था ।
यहाँ मेरी पत्नी ने एक स्कूल में principal के रूप में काम करना शुरू किया ।
मुझे ये कहते हुए गर्व होता है कि मेरी पत्नी मेरी सबसे होनहार student रही । उसने मुझसे सबसे ज़्यादा सीखा है । शायद समय भी उसी को सबसे ज़्यादा मिला …… तो हमें लगा कि इन स्कूलों में आखिर प्रिंसिपल की इमेज जल्लाद वाली क्यों होती है । बच्चों के लिए भी और स्टाफ के लिए भी ……. प्रिंसिपल मने जल्लाद …….
सो स्कूल में मैडम जी की कार्य शैली पहले दिन से ही एक माँ वाली रही । नया नया स्कूल था । बच्चे सब छोटे थे । सो मैडम जी उन बच्चों को गोद में उठाये दिन भर घूमती ……. सारा दिन चुम्मियां लेती ……. एक दिन एक बच्चे के माँ बाप आ गए जी स्कूल ….. शिकायत ले के …… हमको लगता है कि बच्चे के साथ स्कूल में कोई abuse हो रहा है …… कल बच्चे के गाल लाल थे ……. मैडम जी ने बताया कि बात सही है जी …… वाकई abuse हो रहा है और खुद मैडम ही abuse कर रही हैं …….. ऐसे …… और उन्होंने फिर उसे उठा के 5 -7 चुम्मियां ले डाली …….. पूरे गाल पे लिपस्टिक लग गयी ……
parents हथप्रभ …….
बच्चे जब भी मैडम को देखते भाग के लिपट जाते । फिर कुछ साल बाद एक बच्चे ने घर जा के शिकायत की …… ppl मैडम हूण प्यार नी करदी ……. उसकी माँ एक दिन office में आई …… बोली , मैडम टाइम निकाल के कभी कभी एक आधी चुम्मी ले लिया करो …… कहता है मैडम हूण प्यार नी करदी । मैडम ने हंस के जवाब दिया ……. अब 4th में हो गया है । आजकल गोदी में nursery LKG वाले चढ़े रहते हैं ।
वो तमाम बच्चे 10th के बाद जब दुसरे स्कूल में गए तो उन्होंने अपने parents को बताया कि इस स्कूल में वो माहौल नहीं जो उसमे था । यहाँ के टीचर्स अजनबियों सा व्यवहार करते हैं । मानो Aliens हों । कोई भावना जैसे है ही नहीं । बेजान पत्थरों से ………

teacher student में एक bond होना चाहिए जो उन्हें भावनात्मक स्तर पे जोड़े ……. यदि वो bond develop नहीं हुआ तो education होगी ही नहीं । शिक्षा का प्रवाह teacher से student तक होगा ही नहीं ……..
खासकर primary और secondary शिक्षा में तो ये bond होना बहुत ही ज़रूरी है ।
ये वो पहली condition है जो बच्चे के सम्पूर्ण व्यक्तित्व के विकास के लिए नीव का काम करती है ।

काश करीना कपूर ने ये इतिहास पढ़ा होता तो बेटे का नाम अजीत , जूझार , जोरावर या फ़तेह रखती .

इतिहास में बहुत कम मिसालें मिलेंगी ……. जब किसी बाप ने कौम के लिए ……. राष्ट्र के लिए …….. एक हफ्ते में अपने 4 – 4 बेटे क़ुर्बान कर दिए हों ।
आज पूस का वो आठवां दिन था जब दशम् गुरु श्री गुरु गोविन्द सिंह जी महाराज के दो साहबजादे चमकौर साहब के युद्ध में शहीद हो गए । बड़े साहबजादे श्री अजीत सिंह जी की आयु मात्र 17 वर्ष थी । और छोटे साहबजादे श्री जूझार सिंह जी की आयु मात्र 14 वर्ष थी ।


सिखों के आदेश (गुरुमत्ता) की पालना में गुरु साहब ने गढ़ी खाली कर दी और सुरक्षित निकल गए ।

पिछली रात माता गूजरी दोनों छोटे साहिबजादों के साथ गंगू के घर पे थीं ।
उधर चमकौर साहिब में युद्ध चल रहा था और इधर गनी खां और मनी खां ने माता गूजरी समेत दोनों छोटे साहिबजादों को गिरफ्तार कर लिया ।

अगले दिन यानि पूस की 9 को उन्हें सरहिंद के किले में ठन्डे बुर्ज में रखा गया ।

10 पूस को तीनों को नवाब वजीर खां की कचहरी में पेश किया गया ।
शर्त रखी …….इस्लाम कबूल कर लो ……वरना …….
वरना क्या ?????
मौत की सज़ा मिलेगी ……

पूस का 13वां दिन ……. नवाब वजीर खां ने फिर पूछा ……. बोलो इस्लाम कबूल करते हो ?
छोटे साहिबजादे फ़तेह सिंह जी आयु 6 वर्ष ने पूछा ……. अगर मुसलमाँ हो गए तो फिर कभी नहीं मरेंगे न ?
वजीर खां अवाक रह गया ……. उसके मुह से जवाब न फूटा …….
तो साहिबजादे ने जवाब दिया कि जब मुसलमाँ हो के भी मरना ही है तो अपने धर्म में ही अपने धर्म की खातिर क्यों न मरें ……..

दोनों साहिबजादों को ज़िंदा दीवार में चिनवाने का आदेश हुआ ।
दीवार चीनी जाने लगी । जब दीवार 6 वर्षीय फ़तेह सिंह की गर्दन तक आ गयी तो 8 वर्षीय जोरावर सिंह रोने लगा ……..
फ़तेह ने पूछा , जोरावर रोता क्यों है ?
जोरावर बोला , रो इसलिए रहा हूँ कि आया मैं पहले था पर कौम के लिए शहीद तू पहले हो रहा है ……
उसी रात माता गूजरी ने भी ठन्डे बुर्ज में प्राण त्याग दिए ।

गुरु साहब का पूरा परिवार ……. 6 पूस से 13 पूस …… इस एक सप्ताह में ……. कौम के लिए …… धर्म के लिए …… राष्ट्र के लिए शहीद हो गया ।

जब गुरु साहब को इसकी सूचना मिली तो उनके मुह से बस इतना निकला …….

इन पुत्रन के कारने , वार दिए सुत चार ।
चार मुए तो क्या हुआ , जब जीवें कई हज़ार ।

मित्रो …… आज यानी 22 December पूस की 8 -9 है …….
दोनों बड़े साहिबजादों , अजीत सिंह और जुझार सिंह जी का शहीदी दिवस ……..

कितनी जल्दी भुला दिया हमने इस शहादत को ?
सुनी आपने कहीं कोई चर्चा ? किसी TV चैनल पे या किसी अखबार में …….
4 बेटे और माँ की  शहादत ……. एक सप्ताह में …….

पृथ्वीराज कपूर की नवासी ने अगर ये इतिहास पढ़ा होता तो शायद अपने बेटे का नाम तैमूर न रखती ।

अजीत , जूझार , जोरावर या फ़तेह सिंह रखती