Problem Solving का Sandwich Method

Problem Solving का Sandwich Method

उन दिनों हम लखनऊ में रहा करते थे । सबसे छोटा बेटा दानू वहाँ एक स्कूल में 1st में पढता था । स्कूल एक मुस्लिम उद्योगपति की बेटी चलाती थी जिसका जन्म दुबई में हुआ था और वो स्वयं वहाँ दुबई की British Embassy School की student रही थी । एक बेहतरीन school की स्टूडेंट होने के नाते वो अपने स्कूल को भी उसी pattern पे और बहुत ही मेहनत से , बड़े प्यार से चलाती थी । दिन रात मेहनत करती थी । दानू को स्कूल में कोई समस्या थी । उसके समाधान के लिए हम दोनों पति पत्नी स्कूल गए । मामला कुछ ऐसा था कि क्लास teacher को झाड़ पड़नी तय थी और हम दोनों उसे इस situation में डालना नहीं चाहते थे । बड़ा पेचीदा मामला था ।

तो साहब हम दोनों पहुंचे ऑफिस …..

जी कहिये ……

हमने उन्हें कहा की सबसे पहले तो हम आपको ये मुबारकबाद देने आये हैं कि आप एक बेहतरीन स्कूल चलाती हैं ।
बस इतना सुनना था कि मैडम तो फट पड़ीं और उन्होंने तो साहब अपना दिल खोल के धर दिया । और अपने बचपन के वो तमाम अनुभव , British स्कूल के …… सुनाने लगी …..और कैसे कि वो एक बेहतरीन स्कूल का सपना जी रही हैं ……. मैडम आधा घंटा भाव विभोर हो अपना सपना जीती रही ….फिर उन्हें अचानक ख़याल आया ….. अच्छा आप बताइए , आप कैसे आये ?

madam हम दरअसल ये चाहते है की आपका ये बेहतरीन स्कूल और बेहतरीन बने । आपका स्टाफ ….. कितनी मेहनत करते हैं बेचारे । दिन रात लगे रहते हैं ….. और हमारे दानू की मैडम …… कितनी अच्छी लड़की है बेचारी …… बस ये एक छोटी सी समस्या थी ……

मैडम जी ने तुरंत एक्शन लिया …..क्लास टीचर आई और वो समस्या जो कल तक सास बहू के सीरियल की कहानी से भी ज़्यादा पेचीदी थी और जिसपे कल तक तृतीय विश्व युद्ध अवश्यम्भावी लग रहा था चुटकियों में हल हो गयी ।

Problem solving और Criticism की इस कला को Sandwich method कहा जाता है । किसी की आलोचना करने से पहले उसकी सच्ची तारीफ करो । एकदम genuine ….. फिर जब माहौल पूरी तरह positive हो जाए ….. एकदम फुल्टू सौहार्दपूर्ण ….. तो ये कहते हुए कि आपको और अच्छा बनाने के लिए ये फलां फलां काम , ये समस्या ये कमी दुरुस्त करनी चाहिए जिस से कि आप एकदम World Champion हो जाओगे …… Bread के दो pieces के बीच खीरा प्याज टमाटर लगाओ ……

किसी की आलोचना करने के पहले और बाद में उसकी तारीफ करो ……क्योंकि आपका उद्देश्य समस्या को हल करना है …… बढ़ाना नहीं ……..

रेगिस्तान का cactus बनो । Cactus कभी नहीं मरते ……..

अभी एक मित्र की पोस्ट पढ़ी fb पे ।
वो बता रहे थे कि पिछले दो महीने में वो कितनी बार bank और ATM की लाइन में कै कै घंटे और कै मिनट खड़े रहे ।
मुझे ध्यान आया , मैं और मेरा पूरा परिवार मने धर्म पत्नी और 3 बच्चों समेत एक भी आदमी इन 60 दिन में किसी बैंक या atm की लाइन में नहीं लगा । बस एक बार दिग्विजय लगा था 15 मिनट के लिए सो यहां पूर्वांचल में 15 मिनट की लाइन को लाइन नहीं माना जाता क्योंकि हमारे यहां सैदपुर में तो शांतिकाल अर्थात नोटबंदी से पूर्व भी ATM की लाइन में डेढ़ दो घंटा खड़े रहना आम बात थी ।
सो सवाल है कि मेरा कुनबा इस भयंकर cash crunch में भी line में खड़े रहने से कैसे बच गया ।
और फिर यही नहीं , मेरा परिवार तो आज तक किसी भी लाइन में कभी नहीं लगा । चाहे जैसी लाइन हो …… रेल बस की होय या कोई अन्य हो , रिजर्वेशन की हो …… मेरे लौंडे या मैं कभी लाइन में ना लगे ……. जानते हैं क्यों ?
मैंने अपने बच्चों को कभी formal शिक्षा मने स्कूली किताबी ज्ञान नहीं दिया ……. बड़का तो फिर भी कुछ दिन स्कूल गया , दोनों छोटे तो कभी स्कूल गए ही नहीं ……. इन सबको मैंने home education दी ……. बिना किसी syllabus curriculam के व्यवहारिक शिक्षा …….. और स्किल के नाम पे सिर्फ एक skill सिखायी ……. survival skill ……. मने इस जंगल में ज़िंदा कैसे रहना है ……… How to survive in this jungle among wolves …….. हमारे इस मुल्क में एक बड़ी जबरदस्त तकनीक है जिसे जुगाड़ तकनीक कहा जाता है । यदि आप इस तकनीक में महारथ हासिल कर लें तो आप छोटी से छोटी और बड़ी से बड़ी समस्या का हल चुटकियों में कर सकते हैं । और इस तकनीक को साधने के लिए आपको ज़्यादा से ज़्यादा समय अपने मम्मी पापा के पल्लू और गोद से दूर , घर की comforts से दूर , बिना प्लानिंग के , बिना रिजर्वेशन के , general और cattle class में travel करते बितानी पड़ती है , bare minimum मने न्यूनतम में गुजारा करना …….. जुगाड़ से लंबे समय तक जीना खाना …… मने सिर्फ एक jeans टी शर्ट में 15 दिन गुज़ार देना , ज़रूरत पड़ने पे एक mug पानी में नहा लेना , प्लेटफॉर्म पे अखबार या गमछा और वो भी न हो तो यूँ ही सिर के नीचे जूता रख के सो लेना और बिना पइसा के भर पेट खा लेना …….. जब ये स्किल आपके अंदर आ जाए ……. तो मान लीजिए कि अब आपको जंगल में छोड़ा जा सकता है ……. आप मरेंगे नहीं ………

मैंने अपने बच्चों को हमेशा सिखाया है ……. जलकुम्भी मत बनो ……. रेगिस्तान का cactus बनो ।
Cactus कभी नहीं मरते ……..
रेगिस्तान में उगे cactus में जो फूल खिलते हैं वो सालों नहीं मुरझाते ।

जलकुम्भी महीने दो महीने में सूख जाती है ।

करीना कपूर ने अपने बेटे का नाम तैमूर क्यों रखा ?

पिछले दिनों पौष मास की 8वीं तिथि से 15वीं तिथि तक मैं पंजाब में था ।
ये वो सप्ताह है जब कि सिखों और हिंदुओं के दशम गुरु महाराज श्री गुरु गोविन्द सिंह जी का पूरा परिवार , चार बेटे कौम और धर्म के लिए शहीद हो गए ।
उनके बेटों की उम्र 17 बरस , 14 बरस , 8 बरस और 6 बरस की थी ।
दोनों बड़े बेटे युद्ध में मुग़ल सेना से लड़ते तलवार चलाते हुए शहीद हुए ।
छोटे बेटों को दीवार में जिंदा चिनवा दिया गया और जब फिर भी न मरे तो उन्हें जिबह किया गया …… मने गले रेत दिये गए । ठीक वैसे ही जैसे आजकल ISIS रेत रहा है सीरिया इराक़ में ……..
एक हफ्ते में पूरा परिवार क़ुर्बान ?
ऐसी मिसाल इतिहास में कहाँ मिलती है ?

मेरी पत्नी आजकल सुल्तानपुर लोधी के एक स्कूल की प्रिंसिपल हैं ।
पंजाब में सिखों की जो तीन पवित्र नगरियाँ हैं उनमें से एक है सुल्तानपुर लोधी । बाकी दो हैं श्री अमृतसर साहब और श्री आनंदपुर साहिब ।
सुल्तानपुर लोधी वो जगह है जहां गुरु नानक देव जी 14 बरस रहे थे ।
सुल्तानपुर लोधी सिख बाहुल्य क्षेत्र है ।
मेरी पत्नी के स्कूल में 90% बच्चे सिख हैं ।
पिछले दिनों 20 से 30 दिसंबर के बीच प्रिंसिपल साहिबा ने एक अभियान चला के स्कूल के बच्चों को गौरवशाली सिख इतिहास से अवगत कराया । स्कूल में ” चार साहिबजादे ” फिल्म दिखाई गयी । पूरे 10 दिन तक कार्यक्रम चले । बच्चों में project बनाये । google और youtube खंगाला गया । बच्चों को homework दिया गया कि अपने दादा दादी नाना नानी मम्मी पापा से चार साहिबज़ादों की शहादत की कहानी सुनो और फिर उसे अपने शब्दों में लिखो ।
जो परिणाम आये वो स्तब्ध कारी थे । बच्चों ने स्कूल आ के बताया कि अधिकाँश बुज़ुर्गों और माँ बाप को स्वयं नहीं पता कुछ भी ……. यहां तक की चारों साहिबज़ादों के नाम तक याद नहीं ।
मेरी पत्नी बताने लगी ……. इतने बड़े स्कूल में एक भी बच्चे का नाम अजीत सिंह , जुझार सिंह , जोरावर सिंह या फ़तेह सिंह नहीं । पूरे स्कूल में सिर्फ एक बच्चे का नाम जुझार सिंह है ।
इस जूझार सिंह नामक बच्चे के parents NRI हैं और इटली में रहते हैं । जूझार कि बहन का नाम Olivia है ……… पूरे स्कूल में एक भी बच्चे का नाम गोबिंद सिंह या हरि किशन सिंह नहीं है । जबकि ये वो लोग हैं जिन्होंने अपनी गर्दनें वार दीं कौम और धर्म की रक्षा में ।

ये हाल है सुल्तानपुर लोधी के एक स्कूल का जहां 14 बड़े गुरुद्वारे हैं और ये सिखों का एक अत्यंत महत्वपूर्ण तीर्थ स्थल है । शेष पंजाब का अंदाज़ा आप स्वयं लगा लीजिये ।
आखिर ऐसा क्यों है ? क्या ये हमारे education system का failure नहीं है ?
क्यों हमने अपना इतिहास भुला दिया ?
किसी ज़माने में पंजाब में ये परंपरा थी कि इस एक हफ्ते में लोग भूमि शयन करते थे ( क्योंकि माता गूजरी के साथ दोनों छोटे साहिबज़ादों को सरहिंद के किले में ठंडी बुर्ज में कैद कर रखा गया था और आपने ये तीनों ठंडी रातें ठिठुरते हुए बितायी थीं ) उनके शोक या सम्मान में पंजाब के लोग ये एक हफ्ता जमीन पे सोते थे ……. पर अब पंजाबियों ने इसे भी भुला दिया है ।इस एक हफ्ते में कोई शादी ब्याह का उत्सव celebration नहीं होते थे …… पर उस दिन जब कि दोनों छोटे साहिबज़ादों का शहीदी दिवस था , जालंधर की एक party में सिखों को सर पे शराब के गिलास रख के नाचते देखा ।
अगले दिन मेरी पत्नी आग बबूला थी और उन्होंने स्कूल में 10th क्लास के बच्चों को lecture दे के अपनी भड़ास निकाली ।
आजकल winter vacations हैं और बहुत ज़्यादा कोहरा धुंद है पर उन्होंने तय किया है कि वो बहुत जल्दी अपने स्कूल के बच्चों का एक educational tour ले के जाएंगी , आनंदपुर साहिब से ले के उस किले तक जहां चारों साहिबज़ादे शहीद हुए ।
सवाल है कि सैफ अली और करीना कपूर ने अपने बेटे का नाम तैमूर क्यों रखा ?
क्योंकि उनको कभी तैमूर का इतिहास पढ़ाया ही नहीं गया ।
अगर हमारी कौम ने गुरु गोबिंद सिंह और तैमूर का इतिहास पढ़ा होता और इन्हें ज़रा भी इतिहास बोध होता तो आज शायद आधे पंजाब का नाम अजीत सिंह फ़तेह सिंह जूझार और जोरावर सिंह होता ……. गोबिंद सिंह और हरि किशन सिंह होता …….. और करीना के बेटे का नाम तैमूर न होता ।

जो कौमें अपना इतिहास अपनी कुर्बानियाँ भूल जाती हैं वो खुद इतिहास बन जाती हैं ।

देश में सिखों के चुटकुले बड़े चाव से सुने सुनाये जाते हैं ।
हंसी मज़ाक और मखौल के पात्र रहे हैं सिख इस देश में ।
कहा जाता है कि सिखों का दिमाग दोपहर 12 बजे खराब हो जाता है ।

मिति 8 पौष ……. चमकौर साहिब …… वर्तमान पंजाब का फतेहगढ़ साहिब जिला ……..
दो दिन पहले यानी 6 पौष , सिखी के संस्थापक दशम् गुरु श्री गुरु गोबिंद सिंह जी महाराज ने आनंद पुर साहब का किला खाली कर दिया ।
उनके साथ उनका पूरा परिवार मने 4 बेटे , माता गूजरी ……… और लगभग 40 सिख योद्धा थे ।
आनंदपुर साहिब से कुछ मील की दूरी पे किन्ही कारणों से परिवार उनसे बिछुड़ गया ।
दोनों बड़े बेटे 17 वर्षीय अजीत सिंह जी और 14 वर्षीय जूझार सिंह जी उनके साथ रह गए और दोनों छोटे साहिबजादे 8 वर्षीय जोरावर सिंह और 6 वर्षीय फ़तेह सिंह जी माता गूजरी के साथ रह गए ।
जिस स्थान पे परिवार अलग हुआ आज वहाँ गुरुद्वारा परिवार विछोड़ा साहिब स्थापित हैं ……..

वो रात गुरु साहब ने रोपड़ के पास कोटला निहंग खां के पास गुजारी ।
माता गूजरी दोनों छोटे साहिबजादों के साथ कुम्भे मश्की की झुग्गी में रहीं ।

अगले दिन यानि 7 पौष ……. गुरु साहिब जी चमकौर साहिब पहुंचे …….
माता गूजरी और दोनों छोटे बच्चों को गंगू अपने साथ अपने गाँव ले गया ।

अगले दिन सुबह ……. यानि पूस माह की 8 तारीख को चमकौर साहब का ऐतीहासिक युद्ध शुरू हुआ । गुरु साहब के साथ दोनों साहिबजादे और लगभग 40 सिख योद्धा थे । उधर मुग़लों की विशाल सेना ।
दोनों साहिबजादे और सिख योद्धा वीरगति को प्राप्त हुए ।
शेष बचे सिखों ने गुरु जी को सुरक्षित निकल जाने को कहा …….. बताया जाता है कि जब युद्ध भूमि से निकलने लगे तो एक सिख योद्धा का पैर बड़े साहिबजादे अजित सिंह जी के मृत शरीर से टकराया । सिख ने अपनी कमर में बंधा वस्त्र खोल के उनका मुख ढक दिया ।
गुरु साहब ने जब ये देखा तो बोले …….. वापस उठा लो ये कपड़ा ……..
कफ़न या तो सभी सिखों को ओढाओ नहीं तो इसे भी खुला ही छोड़ दो …….
आखिर बाकी 40 जो शहीद हुए वो भी तो मेरे पुत्र ही हैं ……..

17 साल और 14 साल ……… क्षत्रिय के लिए कहा जाता है कि उसकी आयु ईश्वर के यहाँ से 18 वर्ष ही लिख़ के आती है । युद्ध भूमि में क्षत्रिय 18 बरस से ऊपर जिए तो ऐसे जीवन को धिक्कार ………

गुरु गोबिंद सिंह जी जब 9 साल के थे तो उनके पिता श्री गुरु तेग बहादुर सिंह जी शहीद हो गए ।
सिर्फ 41 वर्ष की आयु में स्वयं गुरु जी शहीद हुए ।
4 बेटे न्योछावर कर दिए देश कौम और धर्म के लिए ………

सही कहते हैं …….. ऐसी कुर्बानियां तो कोई दीवाना पागल ही दे सकता है …….
वो जिसका दिमाग 12 बजे सटक जाता हो ……..
गुरु साहब ने अगर जीवन में आसान रास्ता चुना होता तो कम से कम सिखों को ये चुटकुले तो न सुनने पड़ते ?

मुंबई में छत्रपति शिवा जी महाराज की मूर्ति स्थापित होने जा रही है ।
कुछ लोगों को ये tax payers के पैसे की wastage लगती है ।
भारत ने अपना इतिहास भुला दिया ।
ये जो सप्ताह अभी चल रहा है …… यानि 20 दिसम्बर से ले के 27 दिसम्बर तक …….. इन्ही 7 दिनों में गुरु गोबिंद सिंह जी का पूरा परिवार शहीद हो गया था ।
इधर हिन्दुस्तान Christmas के जश्न में डूबा एक दूसरे को बधाइयां दे रहा है ।
एक ज़माना था जब यहाँ पंजाब में इस हफ्ते …….. सब लोग ज़मीन पे सोते थे …….. क्योंकि माता गूजरी ने वो रात , दोनों छोटे साहिबजादों के साथ , नवाब वजीर खां की गिरफ्त में , सरहिन्द के किले में , ठंडी बुर्ज में गुजारी थी …….. ये सप्ताह सिख इतिहास में शोक का सप्ताह होता है …….. पर आज देखता हूँ कि पंजाब समेत पूरा हिन्दुस्तान जश्न में डूबा है ……..
गुरु गोबिंद सिंह जी की कुर्बानियों को इस अहसान फरामोश मुल्क ने सिर्फ 300 साल में भुला दिया …….. जो कौमें अपना इतिहास अपनी कुर्बानियाँ भूल जाती हैं वो खुद इतिहास बन जाती है ।

सिर्फ 3200 करोड़ में बन रही है मूर्ति शिवा जी की ???????
गुरु गोबिंद सिंह जी और उनके चारों साहिबजादों की भी मूर्तियाँ बननी चाहिए यहाँ आनंदपुर साहिब और फतेहगढ़ साहिब में ……..

Lest we forget ……..

कुछ ज़ख्म कभी भरने नहीं चाहिए ।

आज से कुछ साल पहले मेरी पैर में fracture हो गया ।
पंजे में ।
पहले तो मैंने उसे मामूली मोच समझ ignore किया । खिलाड़ियों को ऐसी मोच आना आम बात है । जब एक डेढ़ महीने तक भी दर्द न गया तो XRay कराया । Dr ने बताया जनाब कायदे से टूटी हुई है हड्डी …… प्लास्टर लगा डेढ़ महीने …… मने 3 महीने मैं लंगडा के चला । मित्रों ने लंगडा लंगडा कह के बुलाना शुरू कर दिया । फिर वो लंगडा तैमुर लंगडा हो गया ।
धीरे धीरे मेरा नाम ही रख दिया गया तैमूर लंगडा ।
ये वो दिन थे जब हम computer illiterate हुआ करते थे ।
मुझे आज भी वो दिन याद है जब हमने जालंधर में काम करना शुरू किया तो एक सहयोगी ने कहा अपना email देना …… हम दोनों मियाँ बीवी भेड़िया बाँय …… तय हुआ कि अब तो email account बनवाना पडेगा । मुझे आज भी याद है , model town के उस cyber cafe में एक लौंडे ने 30 रु लिए थे email Id बनाने के । और फिर जब मेरी छोटी बहन ने मुझे लिखने के लिए प्रेरित करना शुरू किया तो उसी ने मेरा blog account और Fb account बनाया । ये वो दिन थे जब मैं ब्लॉग लिख तो लेता था पर उसे copy paste करना नहीं आता था fb पे । वो भी बड़ा मशहूर चुटकुला ही बन गया जब मैंने अपने एक कम्पूटर ज्ञाता मित्र से कहा कि भाई मैं महीना दो महीना तेरे पास लगा ले रिया हूँ ….. तू मेरे कू ये copy paste करना तो सिखा ही दे । तो उसी दौर में मेरे उसी मित्र ने मेरा एक Gmail ac बनाया …….. taimur.lang27@gmail.com
ये कम्बखत आज भी मेरा google ac है ।
ये तो जब ये करीना कपूर के बच्चे के नाम पे चिहाड़ मची तो मुझे मामले की गंभीरता का अहसास हुआ । मुद्दे की बात ये कि इस से पहले आज तक न मुझे खुद कभी अहसास हुआ और न मैंने कभी खुद सोचा कि मेरे नाम के साथ …… चाहे मज़ाक में ही सही ……. इतने भयानक कातिल का नाम क्यों जुड़ा है ?
सच बताऊँ ?
हालांकि मैं खुद को पढ़ा लिखा जागरूक जाग्रत व्यक्ति मानता हूँ पर सच ये है कि मुझे तैमूर लंग और ऐसे ही हज़ारों कातिलों के बारे में कोई जानकारी है ही नहीं …….
दोष किसका है ?
हमारे education system ने secularism के चक्कर में इन इस्लामिक कातिलों की करतूत कभी हमारे सामने आने ही नहीं दी गयी । history को dilute कर दिया गया । अकबर महान हो गए । औरग्ज़ेब सूफी संत ……. गजनी गोरी महान योद्धा …… और बाकी सब सेक्युलर इतिहासकारों की बाजीगरी जादूगरी में गायब कर दिए गए ।

Dr राजीव भाई ( लन्दन ) ने सवाल उठाया …….. हॉलीवुड में Holocaust पे और 2nd WW पे इतनी फिल्में क्यों बनती हैं ……. इसलिए बनती हैं कि आत्मा को झकझोरते रहे । Jews Hitler को कभी मरने नहीं देंगे । कुछ ज़ख्म ऐसे होने चाहिए कि कभी न भरें …….. हिन्दुओं ने वो तमाम क़त्लेआम वो तमाम अत्याचार भुला दिए जो उनपे हुए 1400 साल तक …….. हिन्दू भूल गए …….
भूल गए तैमूर , चंगेज़ खां , गजनी , गोरी और बाबर हुमायूं अकबर औरंगजेब को ……. भूल गए चित्तौड़ के जौहर को …….

कुछ ज़ख्म कभी भरने नहीं चाहिए ।

teacher प्रिंसिपल जल्लाद जैसा नहीं होना चाहिए

बात 1970 की है । यानी आज से कोई 46 साल पहले की ।
आप बीती है ।
जो खुद पे बीती हो , first hand experiences ……. जीवन के अनुभव ही सब कुछ सिखाते हैं ।
मेरी उम्र 5 साल की थी ।
सिकंदराबाद के फौजी इलाके त्रिमलगिरी की फौजी बैरक में उन दिनों KV चलता था ।
KV बोले तो केंद्रीय विद्यालय ।
उसमे 1st क्लास में मेरा एडमिशन हुआ । मेरी क्लास टीचर एक तेलुगू महिला थी । उसके दांत बाहर को निकले हुए थे । शायद उस जमाने में अभी Orthodontistry अभी नहीं आई थी वरना वो भी अपने दांत ठीक करा लेती ।
तो वो मेरे जीवन का पहला अनुभव था स्कूल जाने का ।
कुछ दिनों बाद की बात है …… तब जब कि हम स्कूल के उस माहौल में हिलमिल गए थे ……. क्लास ख़त्म हुई थी …… क्लास टीचर को बच्चों ने घेर रखा था । और कुछ parents भी थे शायद …… कुछ बच्चों की मम्मियाँ थीं ……… और मैं अपनी मैडम से कुछ कहना चाहता था । पर वो इतने लोगों से घिरी हुई थी कि मेरी बात सुन नहीं रही थी ।
तो मैंने ठीक वही काम किया जो मैं अपनी माँ के साथ करता था , ऐसी परिस्थिति में , जब वो मेरी बात नहीं सुनती थीं । मैंने उनकी ठुड्डी ( chin )पकड़ के अपनी तरफ खीच ली ……. पहले मेरी बात सुनो ……. मेरा ऐसा करना था कि उस class teacher ने मुझे बहुत बुरी तरह झिड़क दिया ।
Hey ……. don’t touch me ……. don’t you ever touch me ……..
उस दिन मझे जिंदगी का एक बहुत बड़ा सबक मिला …….. दुनिया में सिर्फ एक औरत है जो तुम्हारी माँ है ……. उसके अलावा और कोई नहीं जिस से तुम्हें माँ का स्नेह और वात्सल्य मिलेगा ……..
मैं दरअसल अपनी class teacher को माँ समझने की भूल कर बैठा था ।
उसके बाद फिर कभी मुझे अपनी किसी टीचर के प्रति माँ जैसी feeling नहीं आई ।
फिर कालान्तर में नियति स्वयं मुझे और मेरी पत्नी को शिक्षण कार्य में घसीट लायी ।
हमारा स्कूल कोई traditional स्कूल न था । हम दोनों education के लिए formally trained भी न थे । और कोई बताने सिखाने वाला भी न था । जो कुछ भी सीखा समझा खुद ही ठोकरें खा खा के trial n error method से सीखा । सीखने में बहुत समय भी लगा ।
शुरुआत पूर्वी उत्तरप्रदेश के एक गाँव से की थी जहां पेड़ के नीचे बैठा के पढ़ाया करते थे । फिर नियति जैसे दिल्ली से माहपुर ले गयी थी वैसे ही माहपुर से जालंधर ले आई ।
यहाँ का set up माहपुर से कुछ अलग था ।
यहाँ मेरी पत्नी ने एक स्कूल में principal के रूप में काम करना शुरू किया ।
मुझे ये कहते हुए गर्व होता है कि मेरी पत्नी मेरी सबसे होनहार student रही । उसने मुझसे सबसे ज़्यादा सीखा है । शायद समय भी उसी को सबसे ज़्यादा मिला …… तो हमें लगा कि इन स्कूलों में आखिर प्रिंसिपल की इमेज जल्लाद वाली क्यों होती है । बच्चों के लिए भी और स्टाफ के लिए भी ……. प्रिंसिपल मने जल्लाद …….
सो स्कूल में मैडम जी की कार्य शैली पहले दिन से ही एक माँ वाली रही । नया नया स्कूल था । बच्चे सब छोटे थे । सो मैडम जी उन बच्चों को गोद में उठाये दिन भर घूमती ……. सारा दिन चुम्मियां लेती ……. एक दिन एक बच्चे के माँ बाप आ गए जी स्कूल ….. शिकायत ले के …… हमको लगता है कि बच्चे के साथ स्कूल में कोई abuse हो रहा है …… कल बच्चे के गाल लाल थे ……. मैडम जी ने बताया कि बात सही है जी …… वाकई abuse हो रहा है और खुद मैडम ही abuse कर रही हैं …….. ऐसे …… और उन्होंने फिर उसे उठा के 5 -7 चुम्मियां ले डाली …….. पूरे गाल पे लिपस्टिक लग गयी ……
parents हथप्रभ …….
बच्चे जब भी मैडम को देखते भाग के लिपट जाते । फिर कुछ साल बाद एक बच्चे ने घर जा के शिकायत की …… ppl मैडम हूण प्यार नी करदी ……. उसकी माँ एक दिन office में आई …… बोली , मैडम टाइम निकाल के कभी कभी एक आधी चुम्मी ले लिया करो …… कहता है मैडम हूण प्यार नी करदी । मैडम ने हंस के जवाब दिया ……. अब 4th में हो गया है । आजकल गोदी में nursery LKG वाले चढ़े रहते हैं ।
वो तमाम बच्चे 10th के बाद जब दुसरे स्कूल में गए तो उन्होंने अपने parents को बताया कि इस स्कूल में वो माहौल नहीं जो उसमे था । यहाँ के टीचर्स अजनबियों सा व्यवहार करते हैं । मानो Aliens हों । कोई भावना जैसे है ही नहीं । बेजान पत्थरों से ………

teacher student में एक bond होना चाहिए जो उन्हें भावनात्मक स्तर पे जोड़े ……. यदि वो bond develop नहीं हुआ तो education होगी ही नहीं । शिक्षा का प्रवाह teacher से student तक होगा ही नहीं ……..
खासकर primary और secondary शिक्षा में तो ये bond होना बहुत ही ज़रूरी है ।
ये वो पहली condition है जो बच्चे के सम्पूर्ण व्यक्तित्व के विकास के लिए नीव का काम करती है ।

काश करीना कपूर ने ये इतिहास पढ़ा होता तो बेटे का नाम अजीत , जूझार , जोरावर या फ़तेह रखती .

इतिहास में बहुत कम मिसालें मिलेंगी ……. जब किसी बाप ने कौम के लिए ……. राष्ट्र के लिए …….. एक हफ्ते में अपने 4 – 4 बेटे क़ुर्बान कर दिए हों ।
आज पूस का वो आठवां दिन था जब दशम् गुरु श्री गुरु गोविन्द सिंह जी महाराज के दो साहबजादे चमकौर साहब के युद्ध में शहीद हो गए । बड़े साहबजादे श्री अजीत सिंह जी की आयु मात्र 17 वर्ष थी । और छोटे साहबजादे श्री जूझार सिंह जी की आयु मात्र 14 वर्ष थी ।


सिखों के आदेश (गुरुमत्ता) की पालना में गुरु साहब ने गढ़ी खाली कर दी और सुरक्षित निकल गए ।

पिछली रात माता गूजरी दोनों छोटे साहिबजादों के साथ गंगू के घर पे थीं ।
उधर चमकौर साहिब में युद्ध चल रहा था और इधर गनी खां और मनी खां ने माता गूजरी समेत दोनों छोटे साहिबजादों को गिरफ्तार कर लिया ।

अगले दिन यानि पूस की 9 को उन्हें सरहिंद के किले में ठन्डे बुर्ज में रखा गया ।

10 पूस को तीनों को नवाब वजीर खां की कचहरी में पेश किया गया ।
शर्त रखी …….इस्लाम कबूल कर लो ……वरना …….
वरना क्या ?????
मौत की सज़ा मिलेगी ……

पूस का 13वां दिन ……. नवाब वजीर खां ने फिर पूछा ……. बोलो इस्लाम कबूल करते हो ?
छोटे साहिबजादे फ़तेह सिंह जी आयु 6 वर्ष ने पूछा ……. अगर मुसलमाँ हो गए तो फिर कभी नहीं मरेंगे न ?
वजीर खां अवाक रह गया ……. उसके मुह से जवाब न फूटा …….
तो साहिबजादे ने जवाब दिया कि जब मुसलमाँ हो के भी मरना ही है तो अपने धर्म में ही अपने धर्म की खातिर क्यों न मरें ……..

दोनों साहिबजादों को ज़िंदा दीवार में चिनवाने का आदेश हुआ ।
दीवार चीनी जाने लगी । जब दीवार 6 वर्षीय फ़तेह सिंह की गर्दन तक आ गयी तो 8 वर्षीय जोरावर सिंह रोने लगा ……..
फ़तेह ने पूछा , जोरावर रोता क्यों है ?
जोरावर बोला , रो इसलिए रहा हूँ कि आया मैं पहले था पर कौम के लिए शहीद तू पहले हो रहा है ……
उसी रात माता गूजरी ने भी ठन्डे बुर्ज में प्राण त्याग दिए ।

गुरु साहब का पूरा परिवार ……. 6 पूस से 13 पूस …… इस एक सप्ताह में ……. कौम के लिए …… धर्म के लिए …… राष्ट्र के लिए शहीद हो गया ।

जब गुरु साहब को इसकी सूचना मिली तो उनके मुह से बस इतना निकला …….

इन पुत्रन के कारने , वार दिए सुत चार ।
चार मुए तो क्या हुआ , जब जीवें कई हज़ार ।

मित्रो …… आज यानी 22 December पूस की 8 -9 है …….
दोनों बड़े साहिबजादों , अजीत सिंह और जुझार सिंह जी का शहीदी दिवस ……..

कितनी जल्दी भुला दिया हमने इस शहादत को ?
सुनी आपने कहीं कोई चर्चा ? किसी TV चैनल पे या किसी अखबार में …….
4 बेटे और माँ की  शहादत ……. एक सप्ताह में …….

पृथ्वीराज कपूर की नवासी ने अगर ये इतिहास पढ़ा होता तो शायद अपने बेटे का नाम तैमूर न रखती ।

अजीत , जूझार , जोरावर या फ़तेह सिंह रखती

मोदी गुज्जू व्यापारी है । एक पैसे के लिये जान दे देगा

किस्सा 1990 का है । तब जबकि मैं 25 साल का था और मातृभूमि राष्ट्र भक्ति देशप्रेम जैसे चूतिया चक्करों में पड़ के , SAI की 3 महीने पुरानी Central govt job को लतिया के , पंजाब के जालंधर शहर की जन्मी पली नव विवाहिता पत्नी को लिए ऊपी के जिला गाजीपुर चला आया । धर्म पत्नी ने दिल्ली में पूछा , हे पतिदेव , प्राण नाथ ……. कहाँ चले ? मैंने कहा प्रिये , दिल मेरा लगता नहीं इस बेदिल बेजान शहर में …. चल गाँव चलें । पेड़ के नीचे बैठा के बच्चे पढ़ाएंगे । और ये भी आज्ञाकारी पत्नी की तरह पीछे पीछे चल पड़ी । April May june की भीषण गर्मी ……. पुत्तर परदेस में बिजली तब भी 6 घंटे ही आती थी …….. हमने 25 जून 1990 को अपने घर के आँगन में एक पेड़ के नीचे ……. ठीक वहीं जहां आज उदयन चलता है ……. गाँव गिरांव के बच्चों को पढ़ाना शुरू कर दिया । कुछ दिन में लगभग 200 से ज़्यादा बच्चे आने लगे ……. परिवार भी पालना था …… फीस रखी 20 रु ……. स्वयं KV में पढ़े थे सो हूबहू KV ही चला दिया । NCERT का syllabus और books ……. 20 रु में …….
साल बीता । बच्चे बढ़ के 300 हो गए । कुछ local teachers भी रख लिए । उनको वेतन भी देना था । सो फीस 10 रु बढानी पड़ी । 30 रु …….
फिर गाँव वालों ने गणित लगाया …… 300 ×30 = 9000

अरे ई अजीत सिंघवा हमहन से 9000 रु कमाए लागल ……. लूट है जी लूट …… बहुत बड़ा षड्यंत्र है जी ……. देखते ही देखते आधे बच्चे गायब हो गए । धीरे धीरे ये स्थिति आ गयी कि 200 बच्चों में से 150 बच्चे 8 km दूर सैदपुर से आते थे और अगल बगल के गाँव से सिर्फ 20 बच्चे । उसमे भी हमारे गाँव माहपुर जिसकी आबादी 1200 थी उसमे से सिर्फ 3 बच्चे । यहाँ तक कि मेरे अपने परिवार (extended family) का एक भी बच्चा नहीं पढता था ।
3 साल तक यूँ ही चलता रहा । अंत में सैदपुर के parents ने दबाव डालना शुरू किया कि आप लोग यहाँ क्या कर रहे हैं । 200 बच्चे इतनी दूर से कष्ट सह के यहाँ आते हैं ……आप लोग वहीं चलिए ….. सैदपुर । और इस तरह Mahpur Public School माहपुर छोड़ सैदपुर चला गया ।
MPS का पहला छात्र 5 वर्षीय आशुतोष था जो आज Army में Major है । कुल 8 साल यानी 1st से 8th तक पढ़ा हमसे । उसके अलावा सैकड़ों हज़ारों बच्चे आज बेहद सफल हैं । कुछ FB पे भी हैं मेरी लिस्ट में ……. जिन बच्चों को उनके माँ बाप ने साल भर बाद 30 रु बचाने के लिए हटा लिया उनपे कोई टिप्पणी उचित नहीं ……..

आज देख रहा हूँ …… फिर वही कहानी दोहराई जा रही है …..

मोदी जी देश को cashless बनाने का सपना देख रहे हैं तो कुछ लोग कम्पनियों का कमीशन जोड़ रहे है । अरे भाई मोदी गुज्जू है …… एक पैसे के लिए जान दे देगा …… गुज्जू है …… उसका गणित और उसकी व्यापारिक बुद्धि हमसे आपसे बहुत तेज़ है । वो debit card और mobile banking कम्पनियों को चूस लेगा …… आप निश्चिन्त रहिये ।
कौन क्या कमा लेगा इसे छोडिये । cashless होने में देश को क्या फायदा है ये सोचिये ।

 

GDP बड़ी कुत्ती चीज़ है ।

बड़ी चर्चा है कि नोटबंदी की वजह से ये GDP गिर जायेगी ।
अपने सरदार मौन मोहन सिंह जी उस दिन संसद में उवाच रहे थे कि दरअसल ये नोटबंदी मोदी सरकार की एक सुनियोजित लूट है जिसमे देस की GDP 2% तक गिर जायेगी । वैसे सरदार जी ये बताने से चूक गए कि उनकी सरकार ने अटल जी से विरासत में मिली 8% से ऊपर की GDP को किस सुनियोजित लूट के तहत 4 % तक ले आये ।
बहरहाल ……. नोट बंदी से GDP गिरने की संभावना तो पैदा हो ही गयी है ।
तो मैंने एक वामपंथी मित्र से सवाल किया कि मेरे दोनों लौंडे इस महीने अगर नोटबंदी के कारण 1800 की jeans और 3500 रु का Nike Reebock का जूता न खरीदें तो मेरे 5300 रु बच गए …… मैं सीधे सीधे 5300 रु से अमीर हो गया तो मुल्क कैसे गरीब हो गया ……. मेरे कू ये समझाओ ……
मेरे उन झामपंथी मित्र ने कुछ यूँ समझाया कि हे दद्दे ……. ये GDP दरअसल बड़ी कुत्ती चीज़ है ……. इसको कुछ इस तरह से समझो कि मान लो ये पेड़ जिसके नीचे तुम बैठे हो …… ये देखो कितनी शीतल छाया है इसकी …… कितना सुख देता है …… पेड़ से ही जल है – जीवन है ।
पर ये पेड़ GDP के किसी काम का नहीं । ये हराभरा लहलहाता पेड़ जो दिन रात बढ़ रहा है , फल फूल रहा है देश की GDP में कोई वृद्धि नहीं कर रहा ।
GDP तो भैया तब बढ़ेगी जब इसे काट दोगे । ये कटेगा तो सबसे पहले इस से लकडहारा जो कुल्हाड़ी चलाएगा वो कमाएगा । फिर इसकी छंटाई होगी । पतली लकडियाँ जलावन में चली जायेंगी और मोटी आरा मशीन पे …… इस से आरा मशीन वाला कमाएगा , लकड़ी की टाल वाला कमाएगा ……. कोई trolly वाला कमाएगा …… 4 मजदूर जो लादे उतारेंगे वो कमाएंगे ……. फिर आरे पे चीर के लकड़ी किसी बढई के पास जायेगी तो वो उसका furniture बना के कमाएगा …… फर्नीचर बनेगा तो उसमे फेविकोल कील sunmica लगेगा ……. वार्निश paint होगा ……. फिर उस furniture को कोई दुकानदार बेच के कमाएगा ……. सब लोग मालामाल हो जायेंगे ……. इस तरह देश की GDP बढती है ……. देश की GDP बढाने के लिए इस पेड़ को कुर्बानी तो देनी ही होगी …….

देश तभी बढेगा जब तुमरे लौंडे Lewis की jeans के नीचे reebok का 8500 का जूता पहनेंगे …….. अगर तुम साले देश द्रोही …….. शर्म नहीं आती ……. लौंडो को रोजाना मने करते हो कि jeans और जूते पे फालतू खर्चा न किया करें ।
यदि आप सच्चे देश भक्त हैं तो अपनी बीबी को रेस्ट दीजिये और खाना महंगे Restaurant से मंगा के खाइये ।

GDP बड़ी कुत्ती चीज़ है ।

शिखर तक का सफर तो अभी बाकी है

पिछले दिनों दिल्ली में एक मित्र से मिलने गया ।
कुछ परेशानी में थे । उनके पिता ने अपना घर बेच दिया था और पूरे परिवार को नए घर में शिफ्ट होना था । पर नया घर चूँकि तैयार न था इसलिए दो या तीन महीने किराए के एक मकान में गुज़ारा करना था । मित्र की पत्नी बीमार रहती थीं सो एक घर से दुसरे और फिर तीसरे में shift करने की जिम्मेवारी बेटी पे आन पड़ी थी जो एक प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी में जी जान से जुटी हुई थी ……. बेहद confused ……. डरी सहमी सी …… क्या होगा ? कैसे होगा ? कैसे करूंगी ?

मैंने हौसला बढाया …….. अरे …… ये भी कोई समस्या है ? तुम्हारे जैसी बहादुर बच्ची तो ऐसी छोटी मोटी समस्या चुटकियों में हल कर सकती है …….
पर बिटिया को बात समझ न आई । उसे लगा अंकल झूठी तसल्ली दे रहे हैं ….. किताबी ज्ञान …… लड़की नैराश्य से उबरने को तैयार न थी ।
मैंने फोन निकाला । उसे एक लड़की की तस्वीर दिखाई ।
ये सुमेधा है ……. सुमेधा पाठक …….
माना कि तुम्हारे जीवन में बहुत समस्याएं हैं ……. पर इस लड़की को ज़रा ध्यान से देखो ।
कितनी खुश दीखती है ……… है कोई तनाव ?
अब ज़रा इस फोटो को पुनः देखो । सुमेधा wheel chair पे बैठी है । जब ये 10th क्लास में थी तो इसकी रीढ़ की हड्डी में कोई समस्या हुई और लाख इलाज कराने के बावजूद कोई सुधार न हुआ और धीरे धीरे ये paraplegic हो गई । paraplegic मने कमर के नीचे का हिस्सा सुन्न लकवा ग्रस्त हो गया ।
देश दुनिया का कोई डाक्टर अस्पताल नहीं छोड़ा । फिर भी कोई सुधार न हुआ । आज 3 साल से ज़्यादा हो गए ……. wheel chair पे है ।
माना कि तुम्हारे जीवन में समस्याएं हैं …… पर सुमेधा से ज़्यादा तो नहीं ?
जानती हो , एक समय ऐसा भी था जब इसे रोजाना 9-9 घंटे physiotherapy करानी पड़ती थी …… स्कूल छूट गया था …… सामने पहाड़ सा जीवन अन्धकार मय दीखता था …… फिर भी , उन्ही विपरीत परिस्थितियों में भी , सिर्फ घर पे self study कर के ही इसने 10th और 12th में 92 -94 % मार्क्स ले के top किया …… आज BHU से BCom कर रही है ……. माना कि जीवन में बहुत समस्याएं हैं फिर भी सुमेधा जितनी तो नहीं ……. आज के बाद जीवन में कभी निराशा हो तो सुमेधा की फोटो देखना और इश्वर को धन्यवाद देना …… हे इश्वर …… thanks …… मैं कम से कम अपने पैरों पे खड़ी तो हो सकती हूँ ……

और अब दो पंक्तियाँ सुमेधा के लिए …… बेटी सुमेधा ….. कभी जीवन में निराशा हो तो Stefan Hawkins की फोटो देखना ……. और इश्वर को धन्यवाद देना ……. हे इश्वर धन्यवाद …… मैं कम से कम कमर के ऊपर तो ठीक हूँ …….
Stephan Hawkins जब सिर्फ 19 साल के थे तो उनको भी वही समस्या हुई जो सुमेधा को है । तमाम इलाज के बावजूद वो भी गर्दन के नीचे लकवाग्रस्त हो गए …… quadriplegic ……. जब उन्हें पहली बार बीमारी का attack हुआ तो वो भी तुम्हारी तरह स्कूल में थे । उनके अगले 8 साल अस्पतालों के चक्कर काटते और physiotherapy कराते ही बीते । उनका paralysis progressive था और धीरे धीरे कमर से होता हुआ गर्दन तक पहुँच गया ।
तमाम दुश्वारियों के बाद भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी । एक समय ऐसा भी आया जब doctors ने उनको कहा कि वो सिर्फ 2 साल और जीवित रहेंगे । तब उन्होंने जवाब दिया …… अरे दो साल तो बहुत हैं ….. तब तक तो मैं आराम से अपनी Phd ख़त्म कर लूंगा । बीमारी और गर्दन से नीचे लकवा ग्रस्त शरीर Stephan Hawkins को दुनिया का महानतम वैज्ञानिक Physicist और Cosmologist बनने से नहीं रोक पाया । आज Stephan पूरी दुनिया में अपनी उपलब्धियों के लिए जाने जाते हैं और उनके शिष्य दुनिया के महानतम वैज्ञानिकों में शुमार होते हैं ……. इसलिए बिटिया सुमेधा ……. जब कभी उदास हो तो Stephan Hawkins को देखना और उनकी जीवनी पढ़ना और इश्वर को धन्यवाद देना …… हे इश्वर …… आभार आपका ……. कमर से ऊपर तो ठीक हूँ …… यदि Stephan Hawkins दुनिया का महानतम वैज्ञानिक बन सकता है तो सुमेधा क्यों नहीं बन सकती एक महान Economist ……..