UP चुनाव

इस्माइल मेरठी (Ismail Meeruti) साहब का एक शेर है ……..

अर्ज किया है ……..

उल्फत का जब मजा है कि वो भी हों बेकरार,
दोनों तरफ हो आग बराबर लगी हुई।

और इसी शेर की तर्ज पे ……..

गठबंधन का तब मज़ा है कि दोनों ही हों बेजार ……..
औ दोनों तरफ हो गाँड …………… बराबर फटी हुई

UP में सपा और congress का गठबंधन होगा ज़रूर ।
क्योंकि दोनों मने अखिलेश औ राहुल ……. मने सपा औ कांग्रेस …….
भाजपा औ मोदी के मारे , दोनों की है गाँड बराबर फटी हुई ।

राहुल बाबा जानते हैं कि अगर गठबंधन न हुआ तो कांग्रेस की 5 सीट नहीं आएगी इस बार UP में ।
और कितना ही विकास का तंबू तान लें , सपा के लिए बिना गठबंधन 50 का आंकड़ा छूना मुश्किल है ।

Congress की जमीनी स्थिति ये है की कांग्रेसी वोटर जैसी कोई चीज़ UP में अब नहीं बची है । कुछ एक सीटों पे कुछ ऐसे लोग है जिनका अपना व्यक्तिगत भोट है …….. वो एक तरह से निर्दल लोग हैं …….. congress छोड़ अगर निर्दल भी लड़ जाएँ तो जीत जाएंगे । ऐसे 5 – 7 लोग कांग्रेस के टिकट पे लड़ के जीत जाते है इसलिए congress का खाता खुल जाता है UP में । ऐसी सीटों पे कुछ भोट उस प्रत्याशी की जात का और कुछ मुस्लिम भोट मिल के वो सीट जीती जाती है ।

मोदी जी ने पिछले 5 साल में सपा से उसका गैर यादव OBC वोट छीन लिया है ।
इसी तरह मायावती के दलित भोट बैंक में से मोदी जी ने गैर चमार – जाटव भोट में बड़ी सेंध लगायी है ।

सपा congress गठबंधन का सबसे बड़ा नुकसान BSP को होगा जहां उसका मुस्लिम भोट खिसक के सपा- cong के साथ आ जाएगा ।
मुस्लिम भोट बेशक एकमुश्त सपा को पड़ेगा जिसकी प्रतिक्रिया में हिन्दू भोट का counter polarization होगा ।

हालफिलहाल स्थिति ये है कि सपा – congress गठबंधन पूरी जोड़ जुगत के बाद भी 26 – 27 % तक पहुँच पायेगा जबकि इस चुनाव में भाजपा शुरुआत ही 34 % भोट के साथ करेगी जो campaign के साथ बढ़ेगा ।

यदि भाजपा ने 30% भोट लिया तो 220 सीट
32 % लिया तो 240 – 250
34% पे 260 से 280
36 % पे 300 +

आज की तारीख में सबसे खराब स्थिति BSP की है ।
यही हालत रही तो हाथी फिर अंडा दे सकता है ।
सिर्फ चमार – जाटव के बल पे तो 10 सीट आनी मुश्किल है ।

फिलहाल इंतज़ार कीजिये ……. टिकट वितरण और नाम वापसी होने दीजिए ।
तभी picture clear होगी ।

रेलगाड़ी बना Islamic Terrorism का नया हथियार ।

पाकिस्तान में एक हसन निसार साहब हैं ।
विद्वान् आदमी हैं । इस्लाम में जितनी इजाज़त है उस से ज़्यादा सच बोलते हैं ।
उनके सैकड़ों वीडियो Youtube पे उपलब्ध हैं ।
मुसलमानों को address करते हुए निसार साहब हमेशा एक बात कहते हैं ।
सिवाय दहशतगर्दी के और क्या contribution है इस्लाम का मानवता को ?
धर्म के नाम पे बेगुनाहों को मारने के अलावा कोई और उपलब्धि ?
विज्ञान में कोई कॉन्ट्रिब्यूशन ?
आज तक सुई भी ईजाद की ?
दहशतगर्दी के अलावा कुछ और दिया है दुनिया को ?
कोई Research and Development ?

हाँ ……. दहशतगर्दी , आतंक में ज़रूर research करते रहते हैं ।
हवाईजहाज को मिसाइल बना दो और highjack करके world trade center में लड़ा दो ।
अगर ट्रक चलाते हो तो अपने truck से ही भीड़ को कुचल दो ।
100 – 50 कुछ तो मरेंगे ?

कानपुर में लगातार दो Trains को derail करके सैकड़ों निर्दोष लोगों को मार के दहशतगर्दी की भारी सफलता के बाद अब तीसरी प्रस्तुति ……… जगदलपुर भुवनेश्वर हीराखंड एक्सप्रेस को सफलतापूर्वक derail कर सैकड़ों लोगों को मारने में सफल रहे ।

रेलगाड़ी बना Islamic Terrorism का नया हथियार ।

ज़रूरत से ज़्यादा संस्कृत निष्ठ हिंदी भी नहीं बोलनी चाहिए ।

बहुत पहिले मने 80 के दशक में जब कि राजीव गांधी PM थे अ उनके पास प्रचंड बहुमत था , तो वो अपने अनाड़ीपने अ चुतियापे में बोफोर्स तोप में घिर गए ।
उस समय ई राम जेठमलानी ने उनको बहुत हैरान किया ।
ई जेठमलनिया रोज़ाना राजीव गांधी औ कांग्रेस से 10 सवाल पूछता था जिसका कांग्रेस के पास कोई जवाब न होता । अ यूँ समझ लीजिए कि पूरी कांग्रेस जिसके 410 सांसद थे अ विपक्ष एकदम्मे गायब था , थर्राती थी इस राम जेठमलानी से …….
उन्ही दिनों की बात है , किसी बात पे बाबू चनसेखर सिंह बलिया के बागी से इस राम जेठमलानी की ठन गयी । राम जेठमलनिया उनहूँ से दस सवाल पूछ लिया ।
चनसेखर जी बोले , साला कुक्कुर लोग भोंकता रहता है ……. हम किस किस कुक्कुर का जवाब देंगे ।
जेठ मलानी नहीं माना ……..
चनसेखर जी ने अपने 10 – 5 लौंडों को बोला ……… tommy ……. शू बेटा …… पकड़ साले को ……..
और लौंडों ने राम जेठ मलानी को इसी दिल्ली में पकड़ के , सरेआम , दूरदर्शन के कैमरा के सामने मारा 5- 7 लप्पड़ …….. ज्यादा मारने लायक ऊ था नहीं …….. मने तब भी इतना ही बूढा था जितना आज है ……. मने इसकी expiry date तो कबकी निकल चुकी ।
सो लौंडों ने ज़्यादा मारा नहीं , मने सिर्फ 5 – 7 लप्पड़ मारा , पर कपड़ा ओपड़ा सब फाड़ दिए थे , मने एकदम चिन्दी चिन्दी कर दिए थे ।
इस high profile पिटाई को दूरदर्शन ने अगले दिन बहुत कायदे से कभर किया ।
आशा की जाती थी कि सुप्रीम कोर्ट का इतना बड़ा और नामी वकील , इस सरेआम दिन दहाड़े की गयी पिटाई पे बहुत हाय तौबा मचाएगा पर बुढ़वा चूं तक नहीं किया ……. उसके बाद राम जेठमलानी ऐसा पटाये कि कई साल दिल्ली में दिखाई नहीं दिया ।

मुझको अपने इन भाजपा और RSS नेताओं से बस यही शिकायत है कि ई साले सब जरुरत से जायदे मने गंडुत्व की हद तक शालीन हैं । मने होना तो ऐसा चाहिए कि किसी पत्रकार की हिम्मत ही न पड़े कोई ऐसा वैसा हल्का फुल्का सवाल पूछने की ……. मने ऐसे loaded questions जिनका आप कोई भी जवाब दें विविद होना ही होना …….. ऐसे सवाल पूछने वाले पत्रकार की शाम तक कंबल परेड करा देनी चाहिए ।
मुझे ऐसा ही एक किस्सा मोदी जी का याद आता है ……. जब CM थे गुजरात में ।
किसी function में से बाहर निकलते एक पत्रकार ने उनसे ऐसा ही एक loaded question पूछ लिया …….. मोदी ने कुछ नहीं कहा ……. सिर्फ उसको ताकते रहे …….. यही कोई 10 second ……. फिर बोले क्यों बेटा ? मिल गया जवाब ?
जिस स्कूल में तुम अडमीसन लिए हो न , हम उसके भीसी रिटायर हुआ हूँ ……..
देश के बड़े से बड़े पत्रकार मने वो जो फूल के अंडुआ हुए हैं न , उनकी भी हिम्मत नहीं होती कि मोदी और अमित शाह से कोई हल्का फुल्का सवाल पूछ ले …….. मने ऐसा आँख गिरोर के ताकते हैं कि पूछने वाले की फट के हाथ में आ जाए ।

कल मनमोहन वैद्य से loaded प्रश्न पूछा गया और वैद्य जी ने संघी शालीनता से उसका जवाब दिया जबकि उनको चाहिए था कि सामने आ रहे चुनावों के मद्देनजर उसे खांटी भोजपुरी में बनरसिया जवाब देते …….

ये ज़रूरत से ज़्यादा संस्कृत निष्ठ हिंदी भी नहीं बोलनी चाहिए ।

सिख कौम इतनी जल्दी भूल गयी 84 के कत्ले आम को ??????

बाबरी ढांचा भाजपा ने गिराया ।
ऊपी में तब सरकार भाजपा की थी ।
CM कल्याण सिंह थे पर UP के मुसलमानों ने कांग्रेस को ऐसा लतिआया , ऐसा लतिआया कि आज तक उठ नहीं पायी ।

1984 में कांग्रेस ने स्वर्ण मंदिर में घुस के पहले सिखों का कत्ले आम किया और फिर दिल्ली में इंदिरा की हत्या के बाद कांग्रेसी हत्यारों ने कांग्रेस की केंद्र सरकार द्वारा प्रायोजित कत्ले आम में 6000 सिखों को ज़िंदा जला डाला ………

इसके बावजूद ये सोच के आश्चर्य होता है कि पंजाब के सिख आज भी कांग्रेस के लिए भोट करते हैं ????????
जिस परिवार ने स्वर्ण मंदिर की बेइज़्ज़ती की और जिस परिवार ने दिल्ली में 6000 सिखों के गले में जलते हुए टायर डाल के ज़िंदा जलाया , उसी नेहरू गांधी परिवार का पिछवाड़ा चाट रहे हैं सरदार अमरेंद्र सिंह और सरदार नवजोत सिद्धू ……..
लानत है ऐसे सिख पे जो कहता है कि कांग्रेस मेरी माँ है ……. कांग्रेस मेरा असली घर है ???????
सिख कौम इतनी जल्दी भूल गयी 84 के कत्ले आम को ??????

ई सुहागरात पे सोहर काहें गा रहा है बे ?

अरे ओ साम्भा …….
अखिलेसवा तो बोलता था कि लखनऊ वाले शान से चलेंगे अब सम्मान से …….
अ टीभी पे विज्ञापन देखा देखा के कान पका दिया ……..
अ अभी पुष्कर दद्दा बता रहे थे कि अभी तो लखनऊ आगरा एक्सप्रेस वे में बहुत जायदे काम बाकी है । अभी कम से कम दुइ साल लगेगा expressway को पूरा होने में ……..
करे साम्भा ?
भइंस आज धनाई है ……. अभी गाभिन हुई कि नहीं हुई ई महिन्ना भर बाद पता चलेगा ……. अ ई सार जादो जी इन्नर खाये के न्योता पूरे गाँव को अबहियें बाँट दिए बे ……..

अबे ई सुहागरात पे सोहर काहें गा रहा है बे ?
अभी लखनऊ आगरा एस्प्रेस वे का चौथा महिन्ना चल रहा है ।
अभी तो पेटवो नहीं फूला है ।
अ ई ससुरा दाई बुलवा के पानी गर्म करवा रहा है ।

मैंने जीवन में पहली बार देखा है कि आधी अधूरी परियोजनाओं का उदघाटन किया जा रहा है ।
अपनी पीठ खुद थपथपाई जा रही है ।
जादो जी कब तक चूतिया बना के भोट लोगे ?
Public को और कितना चूतिया बनाओगे दोनों बाप बेटा ?

BiMaRU tag वाले 4 राज्य हुआ करते थे देश में । UP बिहार MP और राजस्थान ।
इन चार में से दो तुमसे मीलों आगे निकल चुके हैं । बिहार पिछले 8 – 10 साल में तुम्हारे बराबर आन खड़ा हुआ है ।
एक ज़माना था कि MP एक बेहद backward state था । वहां की दशा देख रोना आता था ।
आज शिवराज का MP देख के जी खुश हो जाता है ।
MP के state highway 4 lane हैं …… दूर दराज के गाँवों में 24 × 7 बिजली आती है ।
उद्योग धंदे लग रहे हैं । क़ानून बेवस्था दुरुस्त है । लोगों का जीवन स्तर सुधर रहा है । रोज़गार के लिए लोगों का पलायन रुक गया है ।
इसके विपरीत UP की बेहाली का बयान नहीं किया जा सकता ।

ये एक स्थापित सत्य है कि जहां भी , जिन राज्यों में भाजपा की सरकार रही है वहाँ विकास हुआ है और लोगों का जीवन स्तर सुधरा है ।

UP का कल्याण सिर्फ और सिर्फ भाजपा ही कर सकती है ।
ये बात UP वालों को समझ लेनी चाहिए ।

अखिलेश जादो , विकास का ढोल पीटना बंद करो ……..

पूर्वांचल में बनारस का पडोसी जिला है चंदौली ।
इसे पूरब का Rice bowl कहते हैं । इस से सटे 4 – 5 जिले जैसे कि वाराणसी , गाज़ीपुर , जौनपुर , आज़मगढ़ , मिर्ज़ापुर , भदोही और उधर बिहार के कुछ जिले , इनमे दुनिया का सबसे बेहतरीन धान उगाया जाता है ।
आम तौर पे शहरी लोग चावल की सिर्फ एक variety जानते हैं । बासमती ……. जो अपने स्वाद और लंबे दाने के लिए पसंद किया जाता है और 70 से 150 रु किलो तक में बिकता है । इसके महंगे बिकने का एक कारण तो ये होता है कि इसकी उपज अन्य vatieties से कम होती है ।
पर पूर्वांचल के इन जिलों में कुछ स्थानीय varieties होती हैं , जिनकी उपज भी भरपूर है , मने bumper crop होती है , और स्वाद गुण में बासमती के बाप हैं । स्थानीय बाजार में इन किस्मों की कीमत 20 से 25 रु किलो तक होती है । इनमे ख़ास कर सोनम , मंसूरी ( इसकी 3 varieties हैं , नाटी , मंझली और साम्भा मंसूरी ) , धनरेखा इत्यादि । इसके अलावा एक किस्म है जीरा 32 …….. इसका दाना बहुत छोटा और महीन होता है , एकदम जीरे जैसा । ये है असल में बासमती का बाप । स्थानीय बाजार में 45 रु किलो बिकता है । ऐसी 20 अन्य varieties और हैं जो यहाँ होती हैं ……… और bumper होती हैं ।
ऐसा ही एक rice bowl राजस्थान में भी है । हाड़ौती संभाग में कोटा , बूंदी जिले में । वहाँ भी दुनिया का बेहतरीन बासमती होता है । बताया जाता है कि कोटा बूंदी जिले में 100 से ज़्यादा अत्याधुनिक विशाल Rice Mills और shellers हैं जो इस धान को process कर market में उतरते हैं । आज कोटा बूंदी का बासमती पूरी दुनिया में अपनी धाक मचा रहा है । समूचे Europe , अमेरिका और Middle east में इसकी जबरदस्त मांग है ।

पर स्वाद और उपज के मामले में चंदौली belt का धान कोटा बूंदी से 21 नहीं बल्कि 25 है ।
मने चंदौली की मिट्टी पानी और जलवायु में उपजा धान कोटा बूंदी से लाख दर्जे बेहतर है ………

अब उत्तर प्रदेश के युवा मुख्यमंत्री से एक सवाल ……… अखिलेश जी , चंदौली और इसके आस पास के जिलों में कितनी rice mills हैं ?
आपके 5 साल के शासन काल में चंदौली के इर्द गिर्द कितनी नयी rice mills लगी ?
आपकी सरकार ने चंदौली belt की इन बेहतरीन और इतनी सस्ती मने 20 – 22 रु किलो बिकने वाली varieties को देश भर में promote कर लोकप्रिय बनाने के लिए क्या काम किया ?

वाराणसी मंडल और इसके लगते जिले , हम यहां दुनिया का सबसे स्वादिष्ट दूध पैदा करते हैं …….. जी हां …….. बनारस की मिठाई का स्वाद यहां के दूध और मावे की मिठास और स्वाद से है …….. गाँव के dairy farmer की समस्या है कि उसका सुबह का दूध तो बिक जाता है पर शाम का नहीं बिकता …….. ऊपर से दूध उत्पादन तो अहीरों का मुख्य पेशा है ?
अखिलेश जी , आप बताएँगे कि आपकी सरकार ने पिछले 5 साल में कितने milk processing प्लांट लगाए पूर्वांचल में ? कितने milk collection centers खोले ? कितने chilling plants लगाए ?

अखिलेश जी , UP के यादव तो आपके बंधुआ भोटर हैं न ? Dairy farming बढ़ेगी तो सीधे सीधे उन्हें फायदा होगा ……. आपने पिछले 5 साल में dairy उद्योग के लिए क्या किया ?
बीकानेर जैसा सूखा पानी को तरसता जिला पूरे देश में दूध supply कर सकता है तो पूर्वांचल तो स्वर्ग है हुज़ूर dairy farming के लिए ……. कितनी ग्रोथ हुई पिछले 5 साल में milk production में ?
कितने नए Dairy farms खुले ? कितने farmers ने अपने farms upgrade किये ? आपने कितना ऋण उपलब्ध कराया डेरी फार्मिंग के लिए ?
पूर्वांचल में कितनी sugar mills नयी लगीं ?
जो बंद पड़ी थीं उनमे से कितनी चालू हुई ?
कितने नए cold स्टोर बनाये आपने ?
कितनी नहरें खुदी ?
कौन सी नयी सिचाई परियोजना ले के आये आप ?
कितने नए thermal power projects आपने लगाए प्रदेश में , या मंजूरी दी ……..
नितिन गडकरी के NH छोड़ पूरे पूर्वांचल की कोई एक सड़क बता दीजिए , जो आपने बनवाना या चौड़ा करना तो दूर , जिसका आपने patch work ही करा दिया हो ?
कोई एक सड़क ? कोई एक state हाईवे ?

कोई एक नया उद्योग जो लगा हो पूर्वांचल के इन 40 जिलों में ???????
मिर्ज़ापुर भदोही में दुनिया का सबसे बेहतरीन कालीन बनता है घर घर ……… जिसका सत्यानाश कर मारा कैलाश सत्यार्थी ने ……… उसके revival के लिए क्या किया आपने ?
वाराणसी और मऊ के साडी बुनकर ( जिनमे अधिकाँश मुसलमान है ) उनके लिए क्या किया ?

कोई एक स्कूल कॉलेज बताइये जो आपकी सरकार ने बनवाया हो पिछले 5 साल में ?

किसका विकास किये हो भैया ?
कहाँ किये हो ?

गायत्री प्रजापति रोज़ाना 4 करोड़ रु देता था तुमरी मने प्रतीक गुप्ता जादो की मम्मी को …….. सिर्फ साधना गुप्ता जादो और उनके लौंडे का विकास हुआ है पिछले 5 साल में ।

अखिलेश जादो , विकास का ढोल पीटना बंद करो ……..

फ़ौज में नया नया भर्ती हुए एक फौजी की कहानी ।

फ़ौज में नया नया भर्ती हुए एक फौजी की कहानी ।
मेरे बेटे के साथ के जिला गाज़ीपुर के कुछ लड़के , जो इसके साथ ही पहलवानी करते थे , जब धीरे धीरे जवान हुए तो उन्हें रोज़ी रोज़गार की चिंता सताने लगी ।
खिलाड़ियों के लिए बड़े सीमित विकल्प होते हैं । खिलाड़ी आमतौर पे लिख लोढ़ा पढ़ पत्थर होते हैं । उनके बस का नहीं कि कोई entrance exam पास कर नौकरी पा लें ।
ऐसे में ले दे के एक sports quota का ही आसरा होता है ।
सो हुआ यूँ कि आज से कोई 5 साल पहले गोंडा में senior national championship हुई तो वहाँ army और Navy के coaches 18 – 19 साल के लड़कों को खोज खोज के भर्ती का offer दे रहे थे ।
नन्हे के साथ का एक लड़का जो बड़ा बेहाल परेशान था , उसने army की एक regimental टीम में भर्ती होना स्वीकार कर लिया ।
हमने उसे बहुत समझाया …….. रहन दो पहलवान ……. तुमरे बस की ना है फ़ौज की नौकरी ……..
साले छुट्टा सांड की तरह खेत खलिहान सीवान में घूमने चरने की तुमको आदत है । फ़ौज की नौकरी तुमको जेल सी लगेगी । अभी कुछ दिन में रेलवे की तमाम vacancy निकलेगी गोरखपुर , मुग़ल सराय , बनारस और DLW में , रेलवे की नौकरी आसान है , तुमसे निभ जायेगी ।
पहलवान परेशान था । decision ले नहीं पाया । थाली में सजा के नौकरी मिल रही है । इसे छोड़ दूं और कहीं वो भी न मिले ? इस से भी जाऊं और वो मिले न ।
अंततः उसने Army ज्वाइन कर ली । इधर उसका फ़ौज में हुआ उधर हमारे पहलवान ने रेलवे join कर ली ।
पूर्वांचल में आजकल unemployed लड़कों की कोई पूछ नहीं matrimony बाज़ार में । हर बाप , चाहे उसकी बिटिया कितनी भी निकम्मी क्यों न हो , उसे दामाद सरकारी नौकर ही चाहिये ।
सरकारी नौकरों में भी , फौजी आखिरी पायदान पे हैं । ससुर जी चाहते हैं कि दामाद या तो राज्य सरकार या केंद्र सरकर में सिविल नौकरी में हो । अगर belt वाली job है तो फिर पुलिस में हो ……. थक हार के जब कोई न मिले तो फौजी ही सही …….
उधर बेरोजगार लौण्डों का भी यही हाल है । अगर एक लड़के के हाथ में आप दो appointment letter रख दें , एक फ़ौज का और दूसरा निगम के सफाई कर्मी का , तो 100 में 90 लौंडे सफाईकर्मी लग जाएंगे , फ़ौज में सिपाही न बनें ।
फिर भी मरा हुआ हाथी भी लाख का …….. सो पूर्वांचल के matrimony बाजार में फौजी भाई का भी ठीक ठाक भाव लग जाता है , मने लाख दो लाख रु नगद और कम से कम एक Bike तो मिल ही जाती है । हमारे पहलवान फौजी भाई को भी मिल गयी । दुलहनिया घर आ गयी ।
अब शुरू हुई असली समस्या । कल तक जिस नौकरी के लिए तरसता था अब वही नौकरी काटने को दौड़ती थी ।
बेरोजगार आदमी को साल भर पगार मिल जाए तो वो बेरोजगारी का सारा दर्द , सारे कष्ट भूल जाता है । हमारे फौजी भाई के साथ भी वही हुआ । घर बैठी नयी नवेली दुल्हन को छोड़ कौन जाना चाहता है बॉडर पे ? अब उसे भी फ़ौज की नौकरी में सौ खामियां दिखने लगी हैं । छुट्टी आता है तो वापस जाना नहीं चाहता । खाना अच्छा नहीं है । अफसरों की गुलामी करनी पड़ती है …….. इसके अलावा और 100 कारण है जिनके कारण वो फ़ौज की नौकरी नहीं करना चाहता ।
25,000 रु तो कैसे भी कमाया जा सकता है ।
फ़ौज की नौकरी नहीं करनी ।

आज जो अचानक बाढ़ आ गयी है सोशल मीडिया पे , फ़ौज और अर्ध सैनिक बलों के जवानों की …….. कोई कह रहा की खाना अच्छा नहीं और कोई छुट्टी का रोना रो रहा , किसी को फ़ौज की सेवादारी बहुत बुरी लग रही …….. ये सब वही लोग हैं जिनसे belt की नौकरी हो नहीं रही , वो जो बेरोजगारी का दर्द और दंश भूल गए हैं ……..

कड़वा सत्य ये है कि आज सेना में कोई नहीं रहना चाहता । सबको मुफ्त की पगार चाहिए , सुविधा सब चाहिए , पर काम न करना पड़े ………

फ़ौज के लिए ये अच्छे लक्षण नहीं ।

मुझे अपने बचपन का वो किस्सा याद आता है जब 1971 की लड़ाई अभी बस ख़त्म ही हुई थी ।
पिता जी की regiment कश्मीर के छम्ब ज्योड़ियां sector में posted थी । जम्मू से आगे अखनूर जिले में छम्ब और ज्योड़ियां नामक दो गाँव हैं जो पकिस्तान सीमा से लगते हैं । बताया जाता है कि 1971 में इस छम्ब sector में भीषण युद्ध हुआ था ।
जिस समय युद्ध चल रहा था , हम लोग मने परिवार पठानकोट में था और पिता युद्धभूमि में ।
मेरी उम्र 6 साल थी …….. 6 साल का बालक युद्ध की विभीषिका का अंदाज़ा नहीं लगा सकता ।
उसे नहीं मालूम कि उसका पिता किस दशा में है । जीवित लौटेगा या नहीं ।
पर माँ ने वो दिन कैसे बिताये होंगे , पता नहीं ।
पर मुझे वो दिन आज भी याद है जब पिता जी गए थे । उन्होंने माँ से कहा था , फ़िक्र मत करना , अगर मुझे कुछ हो गया तो ये राष्ट्र तुम्हारा ध्यान रखेगा ।
तब की सेना में और आज की सेना में तो जमीन आसमान का फर्क है । वेतन भत्ते सुविधाएं और ex gratia पेमेंट ……. हर चीज़ में सुधार है । 1971 में ऐसा नहीं था । तब सेना के शहीदों को लाखों करोड़ों रु और ये petrol pump और Gas agency नहीं मिलती थी …….. 62 की indo China war में तो सैनिकों के पास जूते तक न थे । फिर भी , मुझे याद है , पिता जी पूरे उत्साह के साथ , हँसते खेलते गए थे ।
कुछ दिन बाद , जब कि युद्ध विराम हो गया और सेनाएं barracks में लौट आईं , और जब कि सैनिक अपने परिवारों से मिलने को मचल रहे थे , सबको छुट्टी देना संभव न था , सो पिता जी के CO कर्नल अर्जुन देव खन्ना ने अपने फौजियों से कहा , अपने परिवारों को यहीं बुला लो ।
और रेजीमेंट से कुछ दूर , एक खुले मैदान में , टेंट गाड़ दिए गए ।
उन दिनों ये रेल लाइन सिर्फ पठानकोट तक ही थी । सो पठानकोट रेलवे स्टेशन पे Jawan Bus लगा दी गयी । हर रेल से उतरने वाली families को ले के गाड़ियां छंब जाती ।
मुझे वो यात्रा आज भी याद है ………. जब उस 3 Ton गाडी में बैठ के हम छम्ब पहुंचे । लगभग सारा दिन ही लग गया ।
माँ ने ढेर सारी पूड़ियाँ और पतीला भर सब्जी बना रखी थी । रेल से उतरने वाले परिवारों के लिए ।
मुझे आज भी याद है वो picnic जब हम सबने पेड़ के नीचे बैठ के पूड़ियाँ खायी थी । उस 3Ton के driver और डंडा Man ने भी …….. जी हां फौजी गाडी के ड्राइवर के साथ जो खलासी helper होता था उसे उन दिनों डंडा Man कहा जाता था …….. वो एक डंडा लिए रहता था और driver को दिशा निर्देश देता था ।
Regiment में सुबह दोपहर शाम को लंगर से खाना नाश्ता ले के गाडी आती थी , सभी परिवारों के लिए । दूध के लिए Milk Maid के condensed milk के डब्बे और milk powder के कनस्तर । अमूल मक्खन के डिब्बे …….. राशन की कोई कमी नहीं थी ।
समस्या ये आयी कि बहुत से परिवार जो दक्षिण से आये थे उनके पास कोई गर्म कपड़ा न था जबकि छम्ब में भीषण सर्दी पड़ रही थी । ऐसे में मोटे मोटे काले खुरदुरे फौजी कंबल ……..
इफरात राशन होने के बावजूद भोजन का स्वाद अच्छा नहीं था ।
मूल समस्या थी अच्छे cooks का आभाव ।
मुझे याद है कि माँ लंगर से आयी दाल सब्जी को फिर से छौंक लगाती थी ।
फौजी रोटी की सबसे बड़ी खासियत कि उसे झाड़ झाड़ के खाना पड़ता था ।
क्योंकि बेलते समय रोटी को सीधे सीधे आटे पे रख के ही बेलते हैं जिस से उसमे अत्यधिक सूखा आटा जिसे परथन लग जाता था ।
पर फिर भी मुझे याद है कि वो खाना स्वाद रंग रूप में 19 हो सकता था पर पौष्टिक पूरा था , quality और quantity में कमी न थी ।
मुझे बचपन का वो दृश्य भी याद है कि हर फौजी पलटन में एक सूअर बाड़ा होता था जिसमे सूअर पाले जाते थे और उन सूअरों की खुराक पल्टन के लंगर और mess की जूठन ही होती थी जो इतनी ज़्यादा होती थी कि 30 – 40 सूअर पल जाते थे ।
कहने का मतलब ये कि फ़ौज को राशन की कमी कभी नहीं रही ।
एक बात और …….. आज के फौजी और तब के फौजी में अंतर था ।
मेरे पिता जी 1964 में सेना में गए ।
ये वो समय था जब कि 62 का युद्ध बस हुआ ही था और उसमें china ने भारयीय सेना को बुरी मार मारी थी । सेना के पास साजोसामान की भयंकर कमी थी । जूते और Rifles तक न थीं । सेना बाबा आदम के जमाने की 303 Rifles से लड़ रही थी । ऐसे बुरे हालात में जबकि चीन ने भारत के 27000 वर्ग Km भूभाग पे कब्जा कर लिया था , सेना का मनोबल पूरी तरह टूटा हुआ था और नेहरू मरने वाले थे , पिता जी सेना में गए । अभी ट्रेनिंग अधूरी ही थी कि 65 का युद्ध छिड़ गया । उसके बाद 71 …….. तब का फौजी जान हथेली पे ले के सेना में जाता था ……..
अब तो मौज ही मौज है । 71 से ले के 90 तक तो पूरा समय शान्ति रही ।
इसके बाद इक्का दुक्का छोटे मोटे ops हुए ।
60 के दशक में लौंडा फ़ौज में भर्ती हो जाए तो घर परिवार में मातम छा जाता था ।
आज बाप लोग 5 लाख रु ले के जुगाड़ खोजते फिरते हैं कि लौंडा किसी तरह भर्ती हो जाए ।
पूरब में अब फौजी लौंडों को दहेज़ में car मिल रही है ।
आजकल फौजी barrack के आगे 4 -6 swift और Dezire खड़ी दिख जाती हैं ।
25000 वेतन भी हो गया है ।
न फ़ौज अब पहले वाली रही न फौजी ।
पहले सिपाही निपट अनपढ़ अंगूठाटेक होते थे । अब BA , MA आम बात है ।
अब का सिपाही देश के लिए जान देने नहीं नौकरी करने गया है ।
अब वो अपने को अफसर से कमतर नहीं समझता ।
जबकि पैदल सेना का ये चरित्र है कि हर हाल में अफसर के हुक्म का पालन …….. yes Sir …….. अपना दिमाग बिलकुल नहीं लगाना …….. साहब ने कहा कि मौत के मुह में कूद जा तो कूद गया ……. न कुछ सोचा न समझा …….. न दिमाग लगाया …….. खुद को झोंक दिया ……..
युद्ध भूमि में दिमाग लगाने वाले लोग ही भगोड़े होते हैं ।

ये जो सेना और अर्द्धसैनिक बालों के जवानों के वीडियो धड़ाधड़ आ रहे हैं उस से लगता है कि योद्धाओं ने दिमाग लगाना शुरू कर दिया है । अफसरों को Villain बना के पेश किया जा रहा है ।
जबकि सेना में मान्यता है कि फ़ौज में सूबेदार मेजर साहब और Commanding Officer पिता सामान होते हैं जो अपने बच्चों से ज़्यादा ख़याल रखते हैं अपने जवानों का …….. Col. अर्जुन देव खन्ना ने सारे नियम कानून ताक पे रख के families को ही युद्ध भूमि में बुला लिया था ………. ये अपने योद्धाओं के welfare की पराकाष्ठा थी ।

पर आज जैसे अफसर बनाम NCO का माहौल बनाया जा रहा है , ये फ़ौज के लिए ये अच्छे लक्षण नहीं ।

न अपना जन्म दिन मनाऊंगा न मनाने दूंगा ।

न खाऊंगा न खाने दूंगा ।
न अपना जन्म दिन मनाऊंगा न मनाने दूंगा ।
न अपने जन्म दिन पे रंडी नचाऊंगा और न भोसड़ी वाले नकटेढ़वा तोतले को नचाने दूंगा ।
अपने जन्म दिन पे दो हज़ार के नोट की माला pink माला न खुद पहनूंगा न भैंसवती को पहनने दूंगा ।
अपने तो लाखों लोगों की रैली करूंगा पर इन भोसडीवालों को सिर्फ PC बोले तो press conference से काम चलाने पे मजबूर कर दूंगा ।

नोट बंदी का असर साफ़ दिख रहा है ।
चुनाव में सिर्फ एक महीना बचा है ।
पिछले 30 दिन में UP में कितनी rally हुई हैं ?
सपा की आखिरी rally कब हुई थी ?
बसपा की ?
Congress की बहराइच रैली को कितने दिन हुए ।
आज BMW का हैप्पी बड्डे है । कल्पना कीजिये कि नोटबंदी न हुई होती तो आज मायावती ने कितनी बड़ी रैली की होती UP में और कितना नगद चन्दा , कैसी कैसी माला पहनी होती और कैसे कैसे हीरे जड़े मुकुट पहने होते …….. आज भैंस वती कह रही थी कि मैं अपना जन्म दिन सादगी से मना रही हूँ । अबे यूँ कह न कि मोदिया साला भिखारी बना दिया । चड्ढी छोड़ सब ले गया ।
इतना बड़ा चुनाव ……. UP का …… मिनी General election ……..
और ऐसा सन्नाटा ?

ये नोटबंदी का असर नहीं तो क्या है ?

ये हाल के वर्षों में जब से ये धनबल बाहुबल की राजनीति शुरू हुई है , ये सबसे सस्ता चुनाव होने जा रहा है ।

भारत बदल रहा है ।

काबुल में सब घोड़े ही नहीं होंते । कुछ गधे भी होते हैं ।

कहावत है कि काबुल में सब घोड़े ही नहीं होंते ।
कुछ गधे भी होते हैं ।
फ़ौज में भी सब विक्रम बतरा नहीं होते । कुछ मनीष भटनागर भी होते हैं ।
बहरहाल फौजियों ने social media में अपने grievances के वीडियो बना के डालने शुरू कर दिए हैं । देश द्रोही मीडिया इन ख़बरों को चटखारे ले ले के दिखा रहा है ।
उधर सुनते हैं कि एक फौजी ने तो बाकायदा धरना भूख हड़ताल शुरू कर दी है ।
किसी फ़ौज के लिए इस से ज़्यादा भयावह स्थिति और नहीं हो सकती । फ़ौज में हुक्म उदूली की सज़ा dismissal होती है । इसके अलावा किसी किस्म की हड़ताल , धरना प्रदर्शन या भूख हड़ताल इत्यादि अक्षम्य अपराध माने जाते हैं । इस लगभग विद्रोह या Mutiny मान लीजिए ।

मीडिया को ऐसे issues की गैर जिम्मेदाराना reporting से बचना चाहिए ।
एक फौजी ने फ़ौज में अफसरों द्वारा अर्दली बनाने को ले के आपत्ति की है ।
इस अर्दली को ले के एक किस्सा आपको सुनाता हूँ ।

हमारे एक मित्र जो फ़ौज से रिटायर हो के आये थे उन्होंने ये किस्सा सुनाया । हुआ ये कि जब वो फ़ौज में थे तो एक बार अपने Major साहब के पास उनके बंगले पे कुछ फौजी जवान आये हुए थे और gate पे खड़े अपने साहब से बातें कर रहे थे ।
बगल वाला बँगला Air Force के एक Squadron Leader का था और वो घर शिफ्ट कर रहे थे । Air Force का truck आ के खड़ा हुआ और Sq. Leader साहब स्वयं truck से सामान उतारने लगे और उनकी पत्नी इस काम में उनका हाथ बंटाने लगी । इसी बीच कोई भारी सामान था उसे उतारना था । Sq Leader साहब ने अपने truck के driver से गुजारिश की कि थोड़ा हाथ लगा दे । वो एक दक्षिण भारतीय Air Man था । साफ़ नट गया । Sorry Sir , मेरी यूनिफार्म गन्दी हो जायेगी ।
हार के दोनों पति पत्नी स्वयं कोशिश करने लगे ।
Major साब से ये देखा न गया । उन्होंने अपने जवानों को ललकारा ……. क्या जवान ? अब यही होगा । चारों जवान लपक के truck पे चढ़ गए और 10 मिनट में पूरा truck खाली कर सामान घर के भीतर पहुंचा दिया ।
फिर मेरे मित्र जब रिटायर हो के आ गए और उनका बेटा जो मेरे स्कूल का student था , वो NDA मने National Defence Academy में भर्ती हो गया तो उन्होंने अपने बेटे को समझाया , भूल के भी Airforce या Navy में मत चले जाना । अफसर बनने का मजा सिर्फ Army में ।
Airforce और Navy में Air Man और Sailor अफसरों की सेवा में हाजिरी नहीं लगाते ।
Army का जवान साहब की सेवा में सर्वदा तत्पर रहता है । सिर्फ Army अपने अफसर को सेवादार या Orderly बोले तो अर्दली देती है ।
क्यों भला ?
इसका मर्म एक बार मुझे फ़ौज के एक कर्नल साहब ने ही समझाया ।
Navy और Airforce बड़ी साफ़ सुथरी forces होती हैं । उन्हें जमीन पे नहीं लड़ना । फ़ौज जमीन पे लड़ती है । धूल मिट्टी , कीचड़ , पानी , दलदल , बर्फ , जंगल पहाड़ रेगिस्तान , सांप बिछ्छू सबसे लड़ना है । जमीन खोद के trench में भी रहना। है और jungle में tent गाड़ के भी रहना है ……. मीलों पैदल मार्च करना है और hand to Hand combat भी करना है दुश्मन से ……. कभी barack में तो कभी totally Inhospitable terrain में भी रहना है ।
कभी घी में चुपड़ी खानी है तो कभी ज़िंदा रहने के लिए घास पात और सांप केकड़े भी खाने हैं ……. पहाड़ से खुरच के काई भी खानी पड़ती है कभी …….. वहाँ युद्ध के मैदान में कोई ढाबा restaurant नहीं खुला है । front पे जैसी भी कच्ची पक्की मिले पेट भर खाओ …… न पेट भर मिले तो आधा पेट खाओ ……… पर मुह से उफ्फ नहीं निकलनी चाहिए ।
फौजी बताते हैं कि फ़ौज में कभी बहुत अच्छा खाना मिलेगा तो कभी बहुत खराब ।
फौजी अफसरों के बारे में एक बात और ।
कारगिल युद्ध के शहीदों की सूचि उठा के देख लीजिए ।
सारे मने 90% शहीद जवान लड़के थे । 20 – 22 – 25 के ।
फ़ौज में जब भी कोई operation होता है ……. कहीं धावा बोलना है …… कहीं घुस के attack करना है …….. तो फ़ौज की टुकड़ी में एक JCO , कोई एकाध हवलदार होगा , 4 -6 सिपाही नायक लांस नायक होंगे ……. पर उनका नेतृत्व करेगा एक जवान लड़का ……. वो जो बस अभी IMA बोले तो Indian Military Academy से निकल के आया ही है …… कोई Lieutenant या कप्तान …….. वो सबसे आगे चलता है । वही सबसे आगे रहता है । वही सबसे पहले दुश्मन की मांद में घुसता है । तो नेतृत्व करता है । सबसे आगे उसी का सीना रहता है ।
अक्सर पहली गोली भी वही खाता है ।
और जनाब , सामने से 12 बोर के छर्रे नहीं LMG का burst आता है …….… आपके ऊपर कोई LMG का burst झोंक दे न , या LMG की गोली आपके बगल से निकल भर जाए न , तो सुना है कि अच्छे अच्छे जांबाज़ लोगों की पैंट गीली औ पीली हो जाए …….. ऐसे में वो 22- 24 साल का लौंडा जान हथेली पे ले के सबसे आगे चलता है । सबको हौसला देता चलता है ……..
ऐसे मुश्किल हालात में जीती है फ़ौज और इन्ही हालात से निपटने के लिए ही फौजी अफसरों को अर्दली मने सहायक देने की परंपरा शुरू हुई ।
महाभारत में भी ऐसा वर्णन है कि जब सूर्यास्त के बाद सेनाएं शिविर में लौट आतीं तो उनकी सेवा सुश्रुषा में कुछ लोग लपट जाते ।
शायद वही लोग सेवादार या अर्दली हुए । सेना एक ऐसा institution है जिसका सतत विकास हुआ और military Science भी इसी प्रकार Science के रूप में धीरे धीरे evolve हुई जिसमें कि हज़ारों हज़ारों सालों का अनुभव छुपा है । इसे यूँ हलके में खारिज नहीं किया जा सकता ।
अक्सर हम सेना को शांतिकाल में देख के उनका आकलन करने लगते हैं ।
पर इतना याद रखना चाहिए कि शांतिकाल में भी हर सेना battle ready होती है ।
सेना में अर्दलियों के दुरुपयोग और उनसे घरेलू काम कराये जाने कक शिकायतें अक्सर मिलती रहती हैं पर मेरा ये निजी अनुभव है कि हर किसी को अर्दली बना के नहीं भेजा जाता ।
1000 – 1200 लोगों की पल्टन में होते हैं 10 – 20 ऐसे जो इन्ही कामों के लायक होते हैं । कुछ लांगरी , कुछ धोबी नाई , कोई sweeper और कुछ सेवादार ।
फ़ौज में कभी भी किसी जांबाज़ किस्म के सिपाही को अर्दली ( घरेलू ) की ड्यूटी नहीं दी जाती ।
किसी को भी सेवादार भेजने से पहले बाकायदा पूछा जाता है ।
मुझे वो किस्सा भी याद है जब अम्बाला छावनी में वो फौजी पिता जी के सामने पेश हुआ और उसने कहा कि साहब मैं घरेलू सेवादार नहीं बनना चाहता और तत्काल उसकी duty बदल दी गयी थी ।
और वो राम स्वरुप भी याद है चंडीगढ़ में जो पूरे 2 साल बड़े मजे से हमारा सेवादार रहा ।
काबुल में सब घोड़े नहीं होते और किसो को जबरदस्ती न घोड़ा बनाया जा सकता है न गधा ।
फिर भी , फ़ौज में घरेलू सेवादार बनाने का सिस्टम तत्काल प्रभाव से बंद होना चाहिए ।