रेगिस्तान का cactus बनो । Cactus कभी नहीं मरते ……..

अभी एक मित्र की पोस्ट पढ़ी fb पे ।
वो बता रहे थे कि पिछले दो महीने में वो कितनी बार bank और ATM की लाइन में कै कै घंटे और कै मिनट खड़े रहे ।
मुझे ध्यान आया , मैं और मेरा पूरा परिवार मने धर्म पत्नी और 3 बच्चों समेत एक भी आदमी इन 60 दिन में किसी बैंक या atm की लाइन में नहीं लगा । बस एक बार दिग्विजय लगा था 15 मिनट के लिए सो यहां पूर्वांचल में 15 मिनट की लाइन को लाइन नहीं माना जाता क्योंकि हमारे यहां सैदपुर में तो शांतिकाल अर्थात नोटबंदी से पूर्व भी ATM की लाइन में डेढ़ दो घंटा खड़े रहना आम बात थी ।
सो सवाल है कि मेरा कुनबा इस भयंकर cash crunch में भी line में खड़े रहने से कैसे बच गया ।
और फिर यही नहीं , मेरा परिवार तो आज तक किसी भी लाइन में कभी नहीं लगा । चाहे जैसी लाइन हो …… रेल बस की होय या कोई अन्य हो , रिजर्वेशन की हो …… मेरे लौंडे या मैं कभी लाइन में ना लगे ……. जानते हैं क्यों ?
मैंने अपने बच्चों को कभी formal शिक्षा मने स्कूली किताबी ज्ञान नहीं दिया ……. बड़का तो फिर भी कुछ दिन स्कूल गया , दोनों छोटे तो कभी स्कूल गए ही नहीं ……. इन सबको मैंने home education दी ……. बिना किसी syllabus curriculam के व्यवहारिक शिक्षा …….. और स्किल के नाम पे सिर्फ एक skill सिखायी ……. survival skill ……. मने इस जंगल में ज़िंदा कैसे रहना है ……… How to survive in this jungle among wolves …….. हमारे इस मुल्क में एक बड़ी जबरदस्त तकनीक है जिसे जुगाड़ तकनीक कहा जाता है । यदि आप इस तकनीक में महारथ हासिल कर लें तो आप छोटी से छोटी और बड़ी से बड़ी समस्या का हल चुटकियों में कर सकते हैं । और इस तकनीक को साधने के लिए आपको ज़्यादा से ज़्यादा समय अपने मम्मी पापा के पल्लू और गोद से दूर , घर की comforts से दूर , बिना प्लानिंग के , बिना रिजर्वेशन के , general और cattle class में travel करते बितानी पड़ती है , bare minimum मने न्यूनतम में गुजारा करना …….. जुगाड़ से लंबे समय तक जीना खाना …… मने सिर्फ एक jeans टी शर्ट में 15 दिन गुज़ार देना , ज़रूरत पड़ने पे एक mug पानी में नहा लेना , प्लेटफॉर्म पे अखबार या गमछा और वो भी न हो तो यूँ ही सिर के नीचे जूता रख के सो लेना और बिना पइसा के भर पेट खा लेना …….. जब ये स्किल आपके अंदर आ जाए ……. तो मान लीजिए कि अब आपको जंगल में छोड़ा जा सकता है ……. आप मरेंगे नहीं ………

मैंने अपने बच्चों को हमेशा सिखाया है ……. जलकुम्भी मत बनो ……. रेगिस्तान का cactus बनो ।
Cactus कभी नहीं मरते ……..
रेगिस्तान में उगे cactus में जो फूल खिलते हैं वो सालों नहीं मुरझाते ।

जलकुम्भी महीने दो महीने में सूख जाती है ।

भीलवाड़ा की पप्पू की कचोरी

पिछले एक साल में 3 बार भीलवाड़ा राजस्थान जाने का मौक़ा मिला ।
मैंने अबतक जो थोड़ा बहुत हिन्दुस्तान घूमा देखा …….. और खाया पीया …….
मैं कह सकता हूँ कि भारतीय भोजन में राजस्थानी cuisine अद्भुत है ।
मज़े की बात ये कि राजस्थान में भी विभिन्न क्षेत्रों यथा मेवाड़ मारवाड़ शेखावटी हाड़ौती ……. सबका रहन सहन खान पान अलग है । ढेर सारी समानताओं के बाद भी बहुत भिन्न ।
एक समानता तो ये दिखी कि घी तेल का मुक्त हस्त से और विशाल ह्रदय से प्रयोग । मने राजस्थानी भोजन बहुत रंग बिरंगा होता है । हल्दी और मिर्च का प्रयोग ज़्यादा होता है । अब चूँकि घी तेल खूब है और उसमे हल्दी और लाल मिर्च ठोक के पड़ी हो तो dish तो रंगीन बनेगी ही ।
मिर्च के प्रति राजस्थान की दीवानगी मुझे बहुत fascinate करती है ।
उसमे भी खासकर भीलवाड़ा ……. यूँ तो पूरे राजस्थान में ही मिर्च खूब खायी जाती है पर भीलवाड़ा की तो बात ही निराली है । आप मिर्च खाने के कितने भी शौक़ीन हों पर भीलवाड़ा में आपको अपने मेजबान से कहना ही पड़ता है ……. भैया …. बहिन जी …… मिर्च ज़रा सम्हाल के …….
भीलवाड़ा में तो बाकायदा एक मिर्ची बाज़ार है । सब्जी मंडी में और किराना बाज़ार में बीसियों किस्म की हरी मिर्च और लाल मिर्च मिलती हैं । सिर्फ रंग वाली , हल्की तीखी , तीखी , और बेहद तीखी …… इसी तरह हरी मिर्च में भी विभिन्न प्रयोगों में आने वाली मिर्च मिलेगी आपको । फीकी , बहुत हलकी तीखी , सामान्य और ज़हर जैसी तीखी …….. सब्जी मंडी में मिर्च की जो variety मैंने भीलवाड़ा में देखी वो हिन्दुस्तान में और कहीं नहीं देखी । यूँ मिर्च खाने के शौक़ीन तो जोधपुर वाले भी कम नहीं पर भीलवाड़ा की बात ही कुछ और है ।
तो इस बार भैया हुआ यूँ कि भीलवाड़ा जा के करेला नीम चढ़ गया ।
मिर्च का शौक़ीन मैं और मेरी होस्ट लक्ष्मी दी ……. वो मुझसे बहुत आगे ।
पिछली बार जब गए तो उन्होंने हमारे लिए राजस्थानी कचोरी मंगाई । साथ में थे भाई राजेश जी सेहरावत , पुष्कर भाई और अवनीश जी ……
लक्ष्मी ने कचोरी परोसी ……. तो राजेश भाई चूँकि हरियाणवी ठहरे …… और हरियाणा वाले तो मिर्च के नज़दीक से भी न गुजरते । उन ने surrender कर दिया ……. म्हारे बस की ना है ।
पुष्कर भाई लखनवी मिजाज़ के हैं …… लखनऊ में तीखेपन की कोई जगह नहीं ……..
अवनीश बेशक गोरखपुर के हैं और गोरखपुरिये मिर्च खा लेते हैं पर उन्होंने भी थोड़ी सी खा के हाथ खड़े कर दिए ( शायद पान मसाले के कारण )
अपन पूरी खा गए और ये भी कहा कि अबे क्या ख़ाक तीखी है …….. एक दम सामान्य मिर्च है …….
लक्ष्मी ने कहा , दादा ये तो बिना मिर्च की थी ।
अभी मंगाती हूँ भीलवाड़ा की मशहूर पप्पू की कचोरी ……..
और आई जो भैया पप्पू की कचोरी …….
पहला टुकडा खाया ……. हाँ …… इसे कहते हैं तीखी कचोरी …….
वाह क्या बात है ….. वाह ……
आधी कचोरी खाते खाते वो अपना रंग दिखाने लगी …….. और फिर उसके बाद तो आँख नाक से पानी और कानों से धुआँ ……. वाह क्या कचोरी थी …….. किसी तरह खा के ख़तम की …….
फिर शुरू हुआ उसका postmortom बोले तो विश्लेषण …….
क्या खासियत है पप्पू की कचोरी की ……..
उसकी पीठी बोले तो filling में बढ़िया हींग , और बेसन , मूंग की दाल , अदरक , लाल मिर्च , लौंग और ढेर सारी काली मिर्च ……. खूब सारी ……. वो तीखापन लाल मिर्च का नहीं बल्कि काली मिर्च का था ……..
आपको भी यदि कभी भीलवाड़ा जाने का मौक़ा मिले तो पप्पू की कचोरी ज़रूर try कीजिये ।
पूरी न सही …… एक टुकडा ही सही …….