Wrestling coach by profession Social Media writer ....... Traveller ...... loves Biking , cooking,

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रेलगाड़ी बना Islamic Terrorism का नया हथियार ।

पाकिस्तान में एक हसन निसार साहब हैं ।
विद्वान् आदमी हैं । इस्लाम में जितनी इजाज़त है उस से ज़्यादा सच बोलते हैं ।
उनके सैकड़ों वीडियो Youtube पे उपलब्ध हैं ।
मुसलमानों को address करते हुए निसार साहब हमेशा एक बात कहते हैं ।
सिवाय दहशतगर्दी के और क्या contribution है इस्लाम का मानवता को ?
धर्म के नाम पे बेगुनाहों को मारने के अलावा कोई और उपलब्धि ?
विज्ञान में कोई कॉन्ट्रिब्यूशन ?
आज तक सुई भी ईजाद की ?
दहशतगर्दी के अलावा कुछ और दिया है दुनिया को ?
कोई Research and Development ?

हाँ ……. दहशतगर्दी , आतंक में ज़रूर research करते रहते हैं ।
हवाईजहाज को मिसाइल बना दो और highjack करके world trade center में लड़ा दो ।
अगर ट्रक चलाते हो तो अपने truck से ही भीड़ को कुचल दो ।
100 – 50 कुछ तो मरेंगे ?

कानपुर में लगातार दो Trains को derail करके सैकड़ों निर्दोष लोगों को मार के दहशतगर्दी की भारी सफलता के बाद अब तीसरी प्रस्तुति ……… जगदलपुर भुवनेश्वर हीराखंड एक्सप्रेस को सफलतापूर्वक derail कर सैकड़ों लोगों को मारने में सफल रहे ।

रेलगाड़ी बना Islamic Terrorism का नया हथियार ।

ज़रूरत से ज़्यादा संस्कृत निष्ठ हिंदी भी नहीं बोलनी चाहिए ।

बहुत पहिले मने 80 के दशक में जब कि राजीव गांधी PM थे अ उनके पास प्रचंड बहुमत था , तो वो अपने अनाड़ीपने अ चुतियापे में बोफोर्स तोप में घिर गए ।
उस समय ई राम जेठमलानी ने उनको बहुत हैरान किया ।
ई जेठमलनिया रोज़ाना राजीव गांधी औ कांग्रेस से 10 सवाल पूछता था जिसका कांग्रेस के पास कोई जवाब न होता । अ यूँ समझ लीजिए कि पूरी कांग्रेस जिसके 410 सांसद थे अ विपक्ष एकदम्मे गायब था , थर्राती थी इस राम जेठमलानी से …….
उन्ही दिनों की बात है , किसी बात पे बाबू चनसेखर सिंह बलिया के बागी से इस राम जेठमलानी की ठन गयी । राम जेठमलनिया उनहूँ से दस सवाल पूछ लिया ।
चनसेखर जी बोले , साला कुक्कुर लोग भोंकता रहता है ……. हम किस किस कुक्कुर का जवाब देंगे ।
जेठ मलानी नहीं माना ……..
चनसेखर जी ने अपने 10 – 5 लौंडों को बोला ……… tommy ……. शू बेटा …… पकड़ साले को ……..
और लौंडों ने राम जेठ मलानी को इसी दिल्ली में पकड़ के , सरेआम , दूरदर्शन के कैमरा के सामने मारा 5- 7 लप्पड़ …….. ज्यादा मारने लायक ऊ था नहीं …….. मने तब भी इतना ही बूढा था जितना आज है ……. मने इसकी expiry date तो कबकी निकल चुकी ।
सो लौंडों ने ज़्यादा मारा नहीं , मने सिर्फ 5 – 7 लप्पड़ मारा , पर कपड़ा ओपड़ा सब फाड़ दिए थे , मने एकदम चिन्दी चिन्दी कर दिए थे ।
इस high profile पिटाई को दूरदर्शन ने अगले दिन बहुत कायदे से कभर किया ।
आशा की जाती थी कि सुप्रीम कोर्ट का इतना बड़ा और नामी वकील , इस सरेआम दिन दहाड़े की गयी पिटाई पे बहुत हाय तौबा मचाएगा पर बुढ़वा चूं तक नहीं किया ……. उसके बाद राम जेठमलानी ऐसा पटाये कि कई साल दिल्ली में दिखाई नहीं दिया ।

मुझको अपने इन भाजपा और RSS नेताओं से बस यही शिकायत है कि ई साले सब जरुरत से जायदे मने गंडुत्व की हद तक शालीन हैं । मने होना तो ऐसा चाहिए कि किसी पत्रकार की हिम्मत ही न पड़े कोई ऐसा वैसा हल्का फुल्का सवाल पूछने की ……. मने ऐसे loaded questions जिनका आप कोई भी जवाब दें विविद होना ही होना …….. ऐसे सवाल पूछने वाले पत्रकार की शाम तक कंबल परेड करा देनी चाहिए ।
मुझे ऐसा ही एक किस्सा मोदी जी का याद आता है ……. जब CM थे गुजरात में ।
किसी function में से बाहर निकलते एक पत्रकार ने उनसे ऐसा ही एक loaded question पूछ लिया …….. मोदी ने कुछ नहीं कहा ……. सिर्फ उसको ताकते रहे …….. यही कोई 10 second ……. फिर बोले क्यों बेटा ? मिल गया जवाब ?
जिस स्कूल में तुम अडमीसन लिए हो न , हम उसके भीसी रिटायर हुआ हूँ ……..
देश के बड़े से बड़े पत्रकार मने वो जो फूल के अंडुआ हुए हैं न , उनकी भी हिम्मत नहीं होती कि मोदी और अमित शाह से कोई हल्का फुल्का सवाल पूछ ले …….. मने ऐसा आँख गिरोर के ताकते हैं कि पूछने वाले की फट के हाथ में आ जाए ।

कल मनमोहन वैद्य से loaded प्रश्न पूछा गया और वैद्य जी ने संघी शालीनता से उसका जवाब दिया जबकि उनको चाहिए था कि सामने आ रहे चुनावों के मद्देनजर उसे खांटी भोजपुरी में बनरसिया जवाब देते …….

ये ज़रूरत से ज़्यादा संस्कृत निष्ठ हिंदी भी नहीं बोलनी चाहिए ।

निगाह पूरे बकरे पे रहे , छीछड़ों पे नहीं ।

कहावत है कि बिल्ली को सपने में भी छीछड़े ही दिखते हैं ।
बिल्ली बड़ा नहीं सोच सकती ।
कल एक मित्र कह रहे थे कि भाजपा ने हमारी बिरादरी को आज तक दिया ही क्या है जो ये वहाँ जूते खाने चले जाते हैं ।
जब से भाजपा की लिस्ट आयी है , कुछ लोग चुटकी ले रहे हैं कि भाजपा ने दद्दा को टिकट नहीं दी । दद्दा ने पार्टी की इतनी सेवा की पर अहसान फरामोश भाजपा ने टिकट नहीं दी ।
छीछड़ों के सपने ऐसे ही देखे जाते हैं ।

लोगों को , समूहों को , वर्गों को , जातियों को अपने वोट की कीमत चाहिए ।
हमारी जात ने पार्टी को भोट दिया तो बदले में पार्टी की सरकार ने हमारी जाति को क्या दिया ?
कोई सरकार किसी जाति को अधिक से अधिक क्या दे सकती है ?
अधिक से अधिक आरक्षण ?

मुझे इस पार्टी कार्यकर्ता नामक शब्द से बहुत चिढ है ।
ये कार्यकर्ता आखिर होता क्या है ? क्या करता है ?
जब कोई नेता परेता आता है तो कार्यकर्ता उसी नेता से प्राप्त पैसों से एक दो गाड़ी ठलुए गाँव से भर के रैली में पहुंचा देता है , नेता ने जो पैसा दिया था उसमें से आधा बचा लेता है । सरकार अपनी हो तो थाने और तहसील की दलाली करता है । सड़क पे दो कुत्ते लड़ पड़े हो तो किसी एक के पक्ष में थाने में जा के पैरवी करता है , अनर्गल दबाव डालता है , पुलिस को काम नहीं करने देता , न्याय नहीं करने देता , पुलिस न सुने तो नेता जी से चुगली करो , कान भरो …….. थानेदार ने मेरा पालतू कुत्ता बनने से मना कर दिया ……. गौरतलब है कि ऐसे कार्यकर्ताओं की सेवा निःशुल्क नहीं होती बल्कि वो इसी थाने तहसील की दलाली से ही जीते खाते हैं । इसे कहते हैं जनता के टुकड़ों पे पलना , उसे नोच के खाना ।
थोड़ा बड़ा कार्यकर्ता , जो नेता जी को manpower और money power के साथ muscle power भी उपलब्ध कराता है , वो सरकार आने पे ठेकेदारी करता है । सरकार द्वारा किये गए सभी निर्माण और विकास कार्यों में उसे ठेकेदारी में हिस्सा चाहिए । वो पार्टी को दी गयी अपनी ” सेवा ” की पूरी कीमत वसूलना चाहता है ।
एक आम वोटर अपने वोट की कीमत 100 – 50 रु या एक पव्वा दारू मुर्गा नहीं तो एक सूती साड़ी लगाता है ।
बिकाऊ एक अकेला वोटर भी है , पूरी जाति बिकने को तैयार बैठी है । सवाल है , बदले में क्या देगी पार्टी और उसकी सरकार ?
बिल्ली की समस्या ये कि वो सबको बिल्ली ही समझती है ।
मैं उदयन चलाता हूँ । गाँव में जब उदयन शुरू हुआ तो पहले तो लोगों को कुछ समझ ही नहीं आया कि आखिर हो क्या रहा है ?
आखिर मुसहरों को घी क्यों पिलाया जा रहा है ?
पहला निष्कर्ष जो लोगों ने निकाला वो ये कि अजीत सिंह परधानी का चुनाव लड़ेंगे । गाँव की गुणा गणित में ये मान लिया गया कि एक प्रत्याशी हमारे परिवार का अवश्य होगा ।
परधानी का चुनाव आया और निकल गया । साल भर कंबल , रजाई , तोसक तकिया , कपड़ा जूता बांटा था , सो लोग समझते थे कि अजीत सिंह मुसहरों का 200 वोट तो एक मुश्त दिलवा ही देंगे ।
इधर अजीत सिंह परधानी के चुनाव से 20 दिन पहिले गाँव छोड़ जालंधर चले गए और जब बिजय जलूस निकल गया और खस्सी कट के बँट गया तब लौटे ।
हमने किसी से नहीं कहा कि फलनवा को भोट देना ।
लोग अब फिर कयास लगा रहे हैं कि अजीत सिंह आखिर क्यों , किस लालच में मुसहरों को घी पिया रहे हैं । उदयन के पीछे सचमुच इस समुदाय के कल्याण की भावना छिपी है यहाँ तक लोग सोच ही नहीं पाते ।
अजीत सिंह दिन रात एक किये हैं सोशल मीडिया पे , मोदी और भाजपा के पक्ष में ……..
किस लालच में ? क्या कीमत वसूलेंगे ? कोई कीमत तो सोची ही होगी ?
निस्वार्थ निर्विकार भाव से भी कोई काम किया जा सकता है , ये लोग सोच ही नहीं पाते ।
खस्सी कटा है तो ज़्यादा नहीं तो छीछड़े तो हमारे हिस्से आने ही चाहिए ???????

अबे छोडो यार छीछड़ों को ……… पूरे बकरे की सोचो ।
हर व्यक्ति अपनी सेवा की कीमत चाहता है ।
वो कर्त्तव्य समझ के कोई काम नहीं करना चाहता ।
व्यक्ति को समाज से , सरकार से और राष्ट्र से अपना हिस्सा चाहिए ।
My pound of flesh ……. Flesh न मिले तो छीछड़े ही सही ।

जैसी हमारी नीयत , मने इस राष्ट्र की collective नीयत , वैसी ही हमारी सरकारों की ।
आखिर सरकार भी तो हमारे ही चरित्र का reflection है ……….
सरकार जानती है कि ये समाज छीछड़े ही चाहता है । इसलिए उसने आज तक हमें छछड़ों पे ही पाला । नारों का slogans का lollypop चुसाती रही ।
एक ईमानदार सरकार अगर आ गयी और उसने कहा कि हम विदेशों में जमा काला धन ले के आएंगे , तो समाज ने तुरंत इसे लपक लिया …….. मेरे हिस्से के छीछड़े ? मेरे 15 लाख मेरे खाते में कब आएंगे ?
छीछड़े बाज आदमी अपने खाते में चाहता है ।
जिसकी निगाह पूरे बकरे पे है वो कहेगा , ठीक है , लाओ कालाधन और उसे राष्ट्र के समग्र विकास में लगाओ …….. मुझे मेरे हिस्से का विकास चाहिए …….
छीछड़े नहीं ।

इसलिए मित्रों , MLA का टिकट मेरे लिए तो छीछड़े से ज़्यादा कुछ नहीं ।
UP का चुनाव सिर पे है । निजी फायदे , निजी स्वार्थ छोड़ समाज के समग्र विकास के लिए भोट कीजिये ।

निगाह पूरे बकरे पे रहे , छीछड़ों पे नहीं ।

सिख कौम इतनी जल्दी भूल गयी 84 के कत्ले आम को ??????

बाबरी ढांचा भाजपा ने गिराया ।
ऊपी में तब सरकार भाजपा की थी ।
CM कल्याण सिंह थे पर UP के मुसलमानों ने कांग्रेस को ऐसा लतिआया , ऐसा लतिआया कि आज तक उठ नहीं पायी ।

1984 में कांग्रेस ने स्वर्ण मंदिर में घुस के पहले सिखों का कत्ले आम किया और फिर दिल्ली में इंदिरा की हत्या के बाद कांग्रेसी हत्यारों ने कांग्रेस की केंद्र सरकार द्वारा प्रायोजित कत्ले आम में 6000 सिखों को ज़िंदा जला डाला ………

इसके बावजूद ये सोच के आश्चर्य होता है कि पंजाब के सिख आज भी कांग्रेस के लिए भोट करते हैं ????????
जिस परिवार ने स्वर्ण मंदिर की बेइज़्ज़ती की और जिस परिवार ने दिल्ली में 6000 सिखों के गले में जलते हुए टायर डाल के ज़िंदा जलाया , उसी नेहरू गांधी परिवार का पिछवाड़ा चाट रहे हैं सरदार अमरेंद्र सिंह और सरदार नवजोत सिद्धू ……..
लानत है ऐसे सिख पे जो कहता है कि कांग्रेस मेरी माँ है ……. कांग्रेस मेरा असली घर है ???????
सिख कौम इतनी जल्दी भूल गयी 84 के कत्ले आम को ??????

ई सुहागरात पे सोहर काहें गा रहा है बे ?

अरे ओ साम्भा …….
अखिलेसवा तो बोलता था कि लखनऊ वाले शान से चलेंगे अब सम्मान से …….
अ टीभी पे विज्ञापन देखा देखा के कान पका दिया ……..
अ अभी पुष्कर दद्दा बता रहे थे कि अभी तो लखनऊ आगरा एक्सप्रेस वे में बहुत जायदे काम बाकी है । अभी कम से कम दुइ साल लगेगा expressway को पूरा होने में ……..
करे साम्भा ?
भइंस आज धनाई है ……. अभी गाभिन हुई कि नहीं हुई ई महिन्ना भर बाद पता चलेगा ……. अ ई सार जादो जी इन्नर खाये के न्योता पूरे गाँव को अबहियें बाँट दिए बे ……..

अबे ई सुहागरात पे सोहर काहें गा रहा है बे ?
अभी लखनऊ आगरा एस्प्रेस वे का चौथा महिन्ना चल रहा है ।
अभी तो पेटवो नहीं फूला है ।
अ ई ससुरा दाई बुलवा के पानी गर्म करवा रहा है ।

मैंने जीवन में पहली बार देखा है कि आधी अधूरी परियोजनाओं का उदघाटन किया जा रहा है ।
अपनी पीठ खुद थपथपाई जा रही है ।
जादो जी कब तक चूतिया बना के भोट लोगे ?
Public को और कितना चूतिया बनाओगे दोनों बाप बेटा ?

BiMaRU tag वाले 4 राज्य हुआ करते थे देश में । UP बिहार MP और राजस्थान ।
इन चार में से दो तुमसे मीलों आगे निकल चुके हैं । बिहार पिछले 8 – 10 साल में तुम्हारे बराबर आन खड़ा हुआ है ।
एक ज़माना था कि MP एक बेहद backward state था । वहां की दशा देख रोना आता था ।
आज शिवराज का MP देख के जी खुश हो जाता है ।
MP के state highway 4 lane हैं …… दूर दराज के गाँवों में 24 × 7 बिजली आती है ।
उद्योग धंदे लग रहे हैं । क़ानून बेवस्था दुरुस्त है । लोगों का जीवन स्तर सुधर रहा है । रोज़गार के लिए लोगों का पलायन रुक गया है ।
इसके विपरीत UP की बेहाली का बयान नहीं किया जा सकता ।

ये एक स्थापित सत्य है कि जहां भी , जिन राज्यों में भाजपा की सरकार रही है वहाँ विकास हुआ है और लोगों का जीवन स्तर सुधरा है ।

UP का कल्याण सिर्फ और सिर्फ भाजपा ही कर सकती है ।
ये बात UP वालों को समझ लेनी चाहिए ।

लंगड़े घोड़े युद्ध में नहीं उतारे जाते ।

एक मित्र हैं
Param Bhagwat …….
उन ने मेरी एक पोस्ट पे कमेंट किया है …….
मुलाहिजा फरमाएं ……..

टिकट बांटना पार्टी अध्यक्ष का अधिकार है, पर निष्ठावान कार्यकर्ताओं को छोड पांच साल सत्ता की मलाई खाने के बाद भाजपा मे आये, दलबदलूओं को टिकट देना कहाँ तक सही है, टिकट कम से कम दो साल पहले पार्टी ज्वाइन करने वालों को ही मिलना चाहिये, चुनाव के समय शामिल होने वालों को नही

देखो भैया , बड़ी कड़वी बात बोल रिया हूँ ।
चुनावी राजनीति में और युद्ध में सिर्फ एक लक्ष्य होता है ……
विजय ……..
By Hook or Crook ……. किसी भी कीमत पे …… विजय
जीतना जरुरी है ……..

ये धर्म युद्ध किताबी बातें हैं ……. युद्ध में धर्म और आदर्श और संस्कार और शराफत …… ये सब कुछ ना चलते ।

सिर्फ एक चीज़ का महत्त्व है ……. विजय ।

टिकट देते समय सिर्फ और सिर्फ एक बात देखी जाती है ……. Winnability .
उम्मीदवार जीतेगा या नहीं ।
टिकट उसको जो जीत के आये ।
अपनी तरफ से पार्टी टिकट सिर्फ और सिर्फ उसको देती है जो उसे लगता है कि सीट निकाल लेगा ।
बाकी यहां मोदी और अमित शाह कोई दान खाता , सदाव्रत और धर्म खाता खोल के नहीं बैठे हैं ।
और मोदी तो इतना निर्मोही कि वो तो अपने बाप कू बी ना दे टिकट ………

हमको तो जीतने वाला घोड़ा चाहिए …… फिर वो काबुल का होय चाहे काठियावाड़ का ………
लंगड़े घोड़े युद्ध में नहीं उतारे जाते ।

अखिलेश जादो , विकास का ढोल पीटना बंद करो ……..

पूर्वांचल में बनारस का पडोसी जिला है चंदौली ।
इसे पूरब का Rice bowl कहते हैं । इस से सटे 4 – 5 जिले जैसे कि वाराणसी , गाज़ीपुर , जौनपुर , आज़मगढ़ , मिर्ज़ापुर , भदोही और उधर बिहार के कुछ जिले , इनमे दुनिया का सबसे बेहतरीन धान उगाया जाता है ।
आम तौर पे शहरी लोग चावल की सिर्फ एक variety जानते हैं । बासमती ……. जो अपने स्वाद और लंबे दाने के लिए पसंद किया जाता है और 70 से 150 रु किलो तक में बिकता है । इसके महंगे बिकने का एक कारण तो ये होता है कि इसकी उपज अन्य vatieties से कम होती है ।
पर पूर्वांचल के इन जिलों में कुछ स्थानीय varieties होती हैं , जिनकी उपज भी भरपूर है , मने bumper crop होती है , और स्वाद गुण में बासमती के बाप हैं । स्थानीय बाजार में इन किस्मों की कीमत 20 से 25 रु किलो तक होती है । इनमे ख़ास कर सोनम , मंसूरी ( इसकी 3 varieties हैं , नाटी , मंझली और साम्भा मंसूरी ) , धनरेखा इत्यादि । इसके अलावा एक किस्म है जीरा 32 …….. इसका दाना बहुत छोटा और महीन होता है , एकदम जीरे जैसा । ये है असल में बासमती का बाप । स्थानीय बाजार में 45 रु किलो बिकता है । ऐसी 20 अन्य varieties और हैं जो यहाँ होती हैं ……… और bumper होती हैं ।
ऐसा ही एक rice bowl राजस्थान में भी है । हाड़ौती संभाग में कोटा , बूंदी जिले में । वहाँ भी दुनिया का बेहतरीन बासमती होता है । बताया जाता है कि कोटा बूंदी जिले में 100 से ज़्यादा अत्याधुनिक विशाल Rice Mills और shellers हैं जो इस धान को process कर market में उतरते हैं । आज कोटा बूंदी का बासमती पूरी दुनिया में अपनी धाक मचा रहा है । समूचे Europe , अमेरिका और Middle east में इसकी जबरदस्त मांग है ।

पर स्वाद और उपज के मामले में चंदौली belt का धान कोटा बूंदी से 21 नहीं बल्कि 25 है ।
मने चंदौली की मिट्टी पानी और जलवायु में उपजा धान कोटा बूंदी से लाख दर्जे बेहतर है ………

अब उत्तर प्रदेश के युवा मुख्यमंत्री से एक सवाल ……… अखिलेश जी , चंदौली और इसके आस पास के जिलों में कितनी rice mills हैं ?
आपके 5 साल के शासन काल में चंदौली के इर्द गिर्द कितनी नयी rice mills लगी ?
आपकी सरकार ने चंदौली belt की इन बेहतरीन और इतनी सस्ती मने 20 – 22 रु किलो बिकने वाली varieties को देश भर में promote कर लोकप्रिय बनाने के लिए क्या काम किया ?

वाराणसी मंडल और इसके लगते जिले , हम यहां दुनिया का सबसे स्वादिष्ट दूध पैदा करते हैं …….. जी हां …….. बनारस की मिठाई का स्वाद यहां के दूध और मावे की मिठास और स्वाद से है …….. गाँव के dairy farmer की समस्या है कि उसका सुबह का दूध तो बिक जाता है पर शाम का नहीं बिकता …….. ऊपर से दूध उत्पादन तो अहीरों का मुख्य पेशा है ?
अखिलेश जी , आप बताएँगे कि आपकी सरकार ने पिछले 5 साल में कितने milk processing प्लांट लगाए पूर्वांचल में ? कितने milk collection centers खोले ? कितने chilling plants लगाए ?

अखिलेश जी , UP के यादव तो आपके बंधुआ भोटर हैं न ? Dairy farming बढ़ेगी तो सीधे सीधे उन्हें फायदा होगा ……. आपने पिछले 5 साल में dairy उद्योग के लिए क्या किया ?
बीकानेर जैसा सूखा पानी को तरसता जिला पूरे देश में दूध supply कर सकता है तो पूर्वांचल तो स्वर्ग है हुज़ूर dairy farming के लिए ……. कितनी ग्रोथ हुई पिछले 5 साल में milk production में ?
कितने नए Dairy farms खुले ? कितने farmers ने अपने farms upgrade किये ? आपने कितना ऋण उपलब्ध कराया डेरी फार्मिंग के लिए ?
पूर्वांचल में कितनी sugar mills नयी लगीं ?
जो बंद पड़ी थीं उनमे से कितनी चालू हुई ?
कितने नए cold स्टोर बनाये आपने ?
कितनी नहरें खुदी ?
कौन सी नयी सिचाई परियोजना ले के आये आप ?
कितने नए thermal power projects आपने लगाए प्रदेश में , या मंजूरी दी ……..
नितिन गडकरी के NH छोड़ पूरे पूर्वांचल की कोई एक सड़क बता दीजिए , जो आपने बनवाना या चौड़ा करना तो दूर , जिसका आपने patch work ही करा दिया हो ?
कोई एक सड़क ? कोई एक state हाईवे ?

कोई एक नया उद्योग जो लगा हो पूर्वांचल के इन 40 जिलों में ???????
मिर्ज़ापुर भदोही में दुनिया का सबसे बेहतरीन कालीन बनता है घर घर ……… जिसका सत्यानाश कर मारा कैलाश सत्यार्थी ने ……… उसके revival के लिए क्या किया आपने ?
वाराणसी और मऊ के साडी बुनकर ( जिनमे अधिकाँश मुसलमान है ) उनके लिए क्या किया ?

कोई एक स्कूल कॉलेज बताइये जो आपकी सरकार ने बनवाया हो पिछले 5 साल में ?

किसका विकास किये हो भैया ?
कहाँ किये हो ?

गायत्री प्रजापति रोज़ाना 4 करोड़ रु देता था तुमरी मने प्रतीक गुप्ता जादो की मम्मी को …….. सिर्फ साधना गुप्ता जादो और उनके लौंडे का विकास हुआ है पिछले 5 साल में ।

अखिलेश जादो , विकास का ढोल पीटना बंद करो ……..

फ़ौज में नया नया भर्ती हुए एक फौजी की कहानी ।

फ़ौज में नया नया भर्ती हुए एक फौजी की कहानी ।
मेरे बेटे के साथ के जिला गाज़ीपुर के कुछ लड़के , जो इसके साथ ही पहलवानी करते थे , जब धीरे धीरे जवान हुए तो उन्हें रोज़ी रोज़गार की चिंता सताने लगी ।
खिलाड़ियों के लिए बड़े सीमित विकल्प होते हैं । खिलाड़ी आमतौर पे लिख लोढ़ा पढ़ पत्थर होते हैं । उनके बस का नहीं कि कोई entrance exam पास कर नौकरी पा लें ।
ऐसे में ले दे के एक sports quota का ही आसरा होता है ।
सो हुआ यूँ कि आज से कोई 5 साल पहले गोंडा में senior national championship हुई तो वहाँ army और Navy के coaches 18 – 19 साल के लड़कों को खोज खोज के भर्ती का offer दे रहे थे ।
नन्हे के साथ का एक लड़का जो बड़ा बेहाल परेशान था , उसने army की एक regimental टीम में भर्ती होना स्वीकार कर लिया ।
हमने उसे बहुत समझाया …….. रहन दो पहलवान ……. तुमरे बस की ना है फ़ौज की नौकरी ……..
साले छुट्टा सांड की तरह खेत खलिहान सीवान में घूमने चरने की तुमको आदत है । फ़ौज की नौकरी तुमको जेल सी लगेगी । अभी कुछ दिन में रेलवे की तमाम vacancy निकलेगी गोरखपुर , मुग़ल सराय , बनारस और DLW में , रेलवे की नौकरी आसान है , तुमसे निभ जायेगी ।
पहलवान परेशान था । decision ले नहीं पाया । थाली में सजा के नौकरी मिल रही है । इसे छोड़ दूं और कहीं वो भी न मिले ? इस से भी जाऊं और वो मिले न ।
अंततः उसने Army ज्वाइन कर ली । इधर उसका फ़ौज में हुआ उधर हमारे पहलवान ने रेलवे join कर ली ।
पूर्वांचल में आजकल unemployed लड़कों की कोई पूछ नहीं matrimony बाज़ार में । हर बाप , चाहे उसकी बिटिया कितनी भी निकम्मी क्यों न हो , उसे दामाद सरकारी नौकर ही चाहिये ।
सरकारी नौकरों में भी , फौजी आखिरी पायदान पे हैं । ससुर जी चाहते हैं कि दामाद या तो राज्य सरकार या केंद्र सरकर में सिविल नौकरी में हो । अगर belt वाली job है तो फिर पुलिस में हो ……. थक हार के जब कोई न मिले तो फौजी ही सही …….
उधर बेरोजगार लौण्डों का भी यही हाल है । अगर एक लड़के के हाथ में आप दो appointment letter रख दें , एक फ़ौज का और दूसरा निगम के सफाई कर्मी का , तो 100 में 90 लौंडे सफाईकर्मी लग जाएंगे , फ़ौज में सिपाही न बनें ।
फिर भी मरा हुआ हाथी भी लाख का …….. सो पूर्वांचल के matrimony बाजार में फौजी भाई का भी ठीक ठाक भाव लग जाता है , मने लाख दो लाख रु नगद और कम से कम एक Bike तो मिल ही जाती है । हमारे पहलवान फौजी भाई को भी मिल गयी । दुलहनिया घर आ गयी ।
अब शुरू हुई असली समस्या । कल तक जिस नौकरी के लिए तरसता था अब वही नौकरी काटने को दौड़ती थी ।
बेरोजगार आदमी को साल भर पगार मिल जाए तो वो बेरोजगारी का सारा दर्द , सारे कष्ट भूल जाता है । हमारे फौजी भाई के साथ भी वही हुआ । घर बैठी नयी नवेली दुल्हन को छोड़ कौन जाना चाहता है बॉडर पे ? अब उसे भी फ़ौज की नौकरी में सौ खामियां दिखने लगी हैं । छुट्टी आता है तो वापस जाना नहीं चाहता । खाना अच्छा नहीं है । अफसरों की गुलामी करनी पड़ती है …….. इसके अलावा और 100 कारण है जिनके कारण वो फ़ौज की नौकरी नहीं करना चाहता ।
25,000 रु तो कैसे भी कमाया जा सकता है ।
फ़ौज की नौकरी नहीं करनी ।

आज जो अचानक बाढ़ आ गयी है सोशल मीडिया पे , फ़ौज और अर्ध सैनिक बलों के जवानों की …….. कोई कह रहा की खाना अच्छा नहीं और कोई छुट्टी का रोना रो रहा , किसी को फ़ौज की सेवादारी बहुत बुरी लग रही …….. ये सब वही लोग हैं जिनसे belt की नौकरी हो नहीं रही , वो जो बेरोजगारी का दर्द और दंश भूल गए हैं ……..

कड़वा सत्य ये है कि आज सेना में कोई नहीं रहना चाहता । सबको मुफ्त की पगार चाहिए , सुविधा सब चाहिए , पर काम न करना पड़े ………

फ़ौज के लिए ये अच्छे लक्षण नहीं ।

मुझे अपने बचपन का वो किस्सा याद आता है जब 1971 की लड़ाई अभी बस ख़त्म ही हुई थी ।
पिता जी की regiment कश्मीर के छम्ब ज्योड़ियां sector में posted थी । जम्मू से आगे अखनूर जिले में छम्ब और ज्योड़ियां नामक दो गाँव हैं जो पकिस्तान सीमा से लगते हैं । बताया जाता है कि 1971 में इस छम्ब sector में भीषण युद्ध हुआ था ।
जिस समय युद्ध चल रहा था , हम लोग मने परिवार पठानकोट में था और पिता युद्धभूमि में ।
मेरी उम्र 6 साल थी …….. 6 साल का बालक युद्ध की विभीषिका का अंदाज़ा नहीं लगा सकता ।
उसे नहीं मालूम कि उसका पिता किस दशा में है । जीवित लौटेगा या नहीं ।
पर माँ ने वो दिन कैसे बिताये होंगे , पता नहीं ।
पर मुझे वो दिन आज भी याद है जब पिता जी गए थे । उन्होंने माँ से कहा था , फ़िक्र मत करना , अगर मुझे कुछ हो गया तो ये राष्ट्र तुम्हारा ध्यान रखेगा ।
तब की सेना में और आज की सेना में तो जमीन आसमान का फर्क है । वेतन भत्ते सुविधाएं और ex gratia पेमेंट ……. हर चीज़ में सुधार है । 1971 में ऐसा नहीं था । तब सेना के शहीदों को लाखों करोड़ों रु और ये petrol pump और Gas agency नहीं मिलती थी …….. 62 की indo China war में तो सैनिकों के पास जूते तक न थे । फिर भी , मुझे याद है , पिता जी पूरे उत्साह के साथ , हँसते खेलते गए थे ।
कुछ दिन बाद , जब कि युद्ध विराम हो गया और सेनाएं barracks में लौट आईं , और जब कि सैनिक अपने परिवारों से मिलने को मचल रहे थे , सबको छुट्टी देना संभव न था , सो पिता जी के CO कर्नल अर्जुन देव खन्ना ने अपने फौजियों से कहा , अपने परिवारों को यहीं बुला लो ।
और रेजीमेंट से कुछ दूर , एक खुले मैदान में , टेंट गाड़ दिए गए ।
उन दिनों ये रेल लाइन सिर्फ पठानकोट तक ही थी । सो पठानकोट रेलवे स्टेशन पे Jawan Bus लगा दी गयी । हर रेल से उतरने वाली families को ले के गाड़ियां छंब जाती ।
मुझे वो यात्रा आज भी याद है ………. जब उस 3 Ton गाडी में बैठ के हम छम्ब पहुंचे । लगभग सारा दिन ही लग गया ।
माँ ने ढेर सारी पूड़ियाँ और पतीला भर सब्जी बना रखी थी । रेल से उतरने वाले परिवारों के लिए ।
मुझे आज भी याद है वो picnic जब हम सबने पेड़ के नीचे बैठ के पूड़ियाँ खायी थी । उस 3Ton के driver और डंडा Man ने भी …….. जी हां फौजी गाडी के ड्राइवर के साथ जो खलासी helper होता था उसे उन दिनों डंडा Man कहा जाता था …….. वो एक डंडा लिए रहता था और driver को दिशा निर्देश देता था ।
Regiment में सुबह दोपहर शाम को लंगर से खाना नाश्ता ले के गाडी आती थी , सभी परिवारों के लिए । दूध के लिए Milk Maid के condensed milk के डब्बे और milk powder के कनस्तर । अमूल मक्खन के डिब्बे …….. राशन की कोई कमी नहीं थी ।
समस्या ये आयी कि बहुत से परिवार जो दक्षिण से आये थे उनके पास कोई गर्म कपड़ा न था जबकि छम्ब में भीषण सर्दी पड़ रही थी । ऐसे में मोटे मोटे काले खुरदुरे फौजी कंबल ……..
इफरात राशन होने के बावजूद भोजन का स्वाद अच्छा नहीं था ।
मूल समस्या थी अच्छे cooks का आभाव ।
मुझे याद है कि माँ लंगर से आयी दाल सब्जी को फिर से छौंक लगाती थी ।
फौजी रोटी की सबसे बड़ी खासियत कि उसे झाड़ झाड़ के खाना पड़ता था ।
क्योंकि बेलते समय रोटी को सीधे सीधे आटे पे रख के ही बेलते हैं जिस से उसमे अत्यधिक सूखा आटा जिसे परथन लग जाता था ।
पर फिर भी मुझे याद है कि वो खाना स्वाद रंग रूप में 19 हो सकता था पर पौष्टिक पूरा था , quality और quantity में कमी न थी ।
मुझे बचपन का वो दृश्य भी याद है कि हर फौजी पलटन में एक सूअर बाड़ा होता था जिसमे सूअर पाले जाते थे और उन सूअरों की खुराक पल्टन के लंगर और mess की जूठन ही होती थी जो इतनी ज़्यादा होती थी कि 30 – 40 सूअर पल जाते थे ।
कहने का मतलब ये कि फ़ौज को राशन की कमी कभी नहीं रही ।
एक बात और …….. आज के फौजी और तब के फौजी में अंतर था ।
मेरे पिता जी 1964 में सेना में गए ।
ये वो समय था जब कि 62 का युद्ध बस हुआ ही था और उसमें china ने भारयीय सेना को बुरी मार मारी थी । सेना के पास साजोसामान की भयंकर कमी थी । जूते और Rifles तक न थीं । सेना बाबा आदम के जमाने की 303 Rifles से लड़ रही थी । ऐसे बुरे हालात में जबकि चीन ने भारत के 27000 वर्ग Km भूभाग पे कब्जा कर लिया था , सेना का मनोबल पूरी तरह टूटा हुआ था और नेहरू मरने वाले थे , पिता जी सेना में गए । अभी ट्रेनिंग अधूरी ही थी कि 65 का युद्ध छिड़ गया । उसके बाद 71 …….. तब का फौजी जान हथेली पे ले के सेना में जाता था ……..
अब तो मौज ही मौज है । 71 से ले के 90 तक तो पूरा समय शान्ति रही ।
इसके बाद इक्का दुक्का छोटे मोटे ops हुए ।
60 के दशक में लौंडा फ़ौज में भर्ती हो जाए तो घर परिवार में मातम छा जाता था ।
आज बाप लोग 5 लाख रु ले के जुगाड़ खोजते फिरते हैं कि लौंडा किसी तरह भर्ती हो जाए ।
पूरब में अब फौजी लौंडों को दहेज़ में car मिल रही है ।
आजकल फौजी barrack के आगे 4 -6 swift और Dezire खड़ी दिख जाती हैं ।
25000 वेतन भी हो गया है ।
न फ़ौज अब पहले वाली रही न फौजी ।
पहले सिपाही निपट अनपढ़ अंगूठाटेक होते थे । अब BA , MA आम बात है ।
अब का सिपाही देश के लिए जान देने नहीं नौकरी करने गया है ।
अब वो अपने को अफसर से कमतर नहीं समझता ।
जबकि पैदल सेना का ये चरित्र है कि हर हाल में अफसर के हुक्म का पालन …….. yes Sir …….. अपना दिमाग बिलकुल नहीं लगाना …….. साहब ने कहा कि मौत के मुह में कूद जा तो कूद गया ……. न कुछ सोचा न समझा …….. न दिमाग लगाया …….. खुद को झोंक दिया ……..
युद्ध भूमि में दिमाग लगाने वाले लोग ही भगोड़े होते हैं ।

ये जो सेना और अर्द्धसैनिक बालों के जवानों के वीडियो धड़ाधड़ आ रहे हैं उस से लगता है कि योद्धाओं ने दिमाग लगाना शुरू कर दिया है । अफसरों को Villain बना के पेश किया जा रहा है ।
जबकि सेना में मान्यता है कि फ़ौज में सूबेदार मेजर साहब और Commanding Officer पिता सामान होते हैं जो अपने बच्चों से ज़्यादा ख़याल रखते हैं अपने जवानों का …….. Col. अर्जुन देव खन्ना ने सारे नियम कानून ताक पे रख के families को ही युद्ध भूमि में बुला लिया था ………. ये अपने योद्धाओं के welfare की पराकाष्ठा थी ।

पर आज जैसे अफसर बनाम NCO का माहौल बनाया जा रहा है , ये फ़ौज के लिए ये अच्छे लक्षण नहीं ।

वो गन्दा सा सरदार

बात उन दिनों की है जब पंजाब में आतंकवाद अपने चरम पर था …….हम लोग पटियाला में रहते थे उन दिनों …….शाम 6 बजे curfew जैसी स्थिति हो जाती थी …….बसें बंद हो जाती थीं ……..सिख आतंकवादी सरे आम हिन्दुओं को बसों से उतार कर गोलियों से भून दिया करते थे …….कानून व्यवस्था एवं प्रशासन नाम की चीज़ नहीं रह गयी थी …..अदालतों ने आतंकवादियों के मुक़दमे सुनने बंद कर दिए थे क्योंकि न्यायाधीशों की कोई सुरक्षा नहीं रह गयी थी ……अखबारों ने आतंकियों के निर्देश पर उन्हें आतंकवादी न लिख कर खाड़कू लिखना शुरू कर दिया था ……….स्थिति बेहद निराशाजनक थी …….सो उन दिनों की बात है ……..
मेरी नई नई शादी हुई थी …….तभी खबर आयी की ज्योति के पिता जी को कल रात उठा के ले गए ……ज्योति यानी मेरी बहनों और पत्नी की एक अत्यंत घनिष्ठ सहेली जिनसे हमारा बहुत नजदीकी पारिवारिक सम्बन्ध भी था ………बड़ी बुरी खबर थी …….अब ये घटना थी मेहता चौक की …..मेहता चौक अमृतसर जिले का एक अंदरूनी इलाका था और भिंडरावाले का गढ़ था …….वहां का नाम सुन के ही रूह कांप जाती थी उन दिनों ………..खैर ,हम दोनों पति पत्नी चल पड़े बस से ……4 -5 घंटे का सफ़र था ……पूरी बस में सब सिख थे सिर्फ हम 4 -6 लोग हिन्दू थे …वैसे उन दिनों हिन्दुओं ने भी बाल दाढ़ी बढ़ा कर पगड़ी बांधनी शुरू कर दी थी ………पूरे रास्ते सड़क के दोनों तरफ सुरक्षा बालों ने पिकेट बना रखे थे और मशीन गन ले के बैठे थे …….माहौल में दहशत और आतंक था ……..सर्दियों के दिन थे ……..वहां पहुँचते पहुँचते शाम हो गयी …..जब हम बस अड्डे पर उतरे तो हालांकि धुंधलका था फिर भी बाज़ार बंद हो चुके थे …..अड्डा सुनसान था ….बस से कोई 8 -10 सवारियां उतरीं और न जाने कहाँ गायब हो गयीं ………..कोई रिक्शा नहीं था सड़क पर ….हम दोनों पैदल ही चल पड़े ………सुनसान सड़क पर अभी कुछ ही दूर गए होंगे की एक जिप्सी हमारे बगल में आ कर रुकी और उसमें से एक कड़कती हुई आवाज़ आयी …..कौन हो तुम लोग और इस समय सड़क पर क्या कर रहे हो ……..पुलिस की जिप्सी थी और उसमें एक डिप्टी एस पी बैठा था …हमने उसे पूरी बात बताई ……..उसने हमसे कहा अन्दर बैठो और हमें घर तक छोड़ दिया ……..

एक बड़ी सी राइस मिल की चार दीवारी पे बड़ा सा गेट था …..हम उसे खटखटाने लगे …..बहुत देर तक कोई हलचल न हुई …..अन्दर जीवन का कोई चिन्ह नहीं था ……..
अब हमें काटो तो खून नहीं ……..जाएँ तो जाएँ कहाँ ??????? वो जिप्सी भी जा चुकी थी ….खैर एक बार और गेट खटखटाया ………तो हलकी सी एक आवाज़ आयी ….कौन है ???? हमारी जान में जान आयी ……..मेरी पत्नी चिल्लाई ……..ज्योति …….फिर ज्योति गेट पर आयी और उसने गेट खोला …हम अन्दर आये ……..इतनी बड़ी सुनसान सी राईस मिल में ….अकेली लड़की …….मां पहले ही चल बसी थी ..अब बाप भी गया ……..
अन्दर पहुंचे तो एक आदमी बैठा था ………सरदार …..गन्दा सा …..
ये कौन है …..मैंने धीरे से पूछा ………
ओह ये सुखदेव अंकल है …….
कौन सुखदेव …कहाँ का अंकल ….ये कहाँ से प्रकट हो गया ……आज तक तो सुना नहीं था …….
बहुत सारे प्रश्न ले कर हम अन्दर पहुंचे …………
दुआ सलाम हुई …….रात भर रहे ……
वो अजीब सा आदमी ………..एक दम शांत ……..कोई हरकत नहीं ……
उसने हमें सिर्फ इतना कहा …आप लोग चिंता न करें ……मैं हूँ न ……
अब तो हमारी चिंता और बढ़ गयी ….
सुनसान घर में अकेली जवान लड़की ………और ये गंदा सा सरदार ……..
और उन दिनों तो हम हिन्दुओं के मन में सरदारों के लिए एक स्वाभाविक सी नफरत तो थी ही …………अकेले में पूछा अरे भाई ये है कौन …सो पता चला की किसान है कोई ……..इसका धान आया करता था कभी राईस मिल पर ………तो अब यहाँ क्या कर रहा है …….पता चला की ये भी हमारी तरह खबर सुन कर आया है …..तो हमने कहा इस से कह दो अब ये जाए ….क्योंकि अब हम लोग आ गए हैं …..पर वो बोला ……आप लोगों के बस का कुछ नहीं है ….और आप लोगों का यहाँ रहना भी सुरक्षित नहीं है सो आप लोग अब जाओ ………जल्दी निकलो और टाइम से अपने घर पहुँचो……..कल की तरह लेट नहीं होना ………जिस अधिकार से और रोब से उसने ये बात कही और ज्योति चुपचाप सुनती रही तो हमारे सामने अब कोई चारा भी नहीं था और हम हारे जुआरी की तरह चुप चाप निकल लिए ……
घर आये और सारी बात बतायी …….सब लोग चिंतित थे …….पर कोई कुछ कर नहीं सकता था ………खोज खबर लेते रहे ….ज्योति के पिता जी का कुछ पता न चला …..लाश तक न मिली ………
बीच बीच में खबरें आती रहीं ……..वो सरदार अब परमानेंट वहीं रहने लगा था ……..
मेरी माँ अक्सर परेशान होतीं …….बहनें चिंता करती …….सबका यही मत था की बेचारी अकेली अनाथ लड़की ….निरीह ,बेसहारा ….और उस अनजान सरदार के चंगुल में …..बाद में ये भी पता चला की वो किसी बैंक में काम करता है …सो हम सब यही कहते ….अरे बैंक में है तो जा के अपनी नौकरी करे …वहां क्या पड़ा है ………मां कहती …लड़की वहां बिलकुल भी सुरक्षित नहीं है ………देखना एक दिन मार देगा …सब कुछ हड़प लेगा ……..इतनी बड़ी राईस मिल है ……घर है …इतनी ज़मीन है ……..क्या उम्र है उसकी ………शादी ही क्यों नहीं कर लेता उससे ……..
अरे नहीं मम्मी अधेड़ है …होगा कोई 45 एक साल का …जवान लड़का है उसका ……..
अरे जवान लड़का है तो उसी से शादी करा दे ज्योति की …………
ऐसी तमाम चर्चाएँ चला करती थीं हमारे घर में ……और सब लोग पानी पी पी कर …..”उस गंदे से सरदार “को गरियाते थे ……….

खैर समय बीतता गया ……..हम लोग भी अपने अपने कामों में व्यस्त हो गए ………ज्योति को हमने उसके भाग्य के भरोसे छोड़ दिया ……….बीच बीच में उसकी खबर आ जाया करती थी …………..2 -1 साल बाद खबर मिली की वो ठीक है …….वो गन्दा सा सरदार अब भी वहीं रहता है ……..फिर यह भी पता चला की ज्योति ने वो राईस मिल जो बंद हो गयी थी फिर शुरू कर दी है …..अब वो उसे चलाती है और वो सरदार उसकी मदद करता है ………..फिर एक दिन ये खबर आयी की वो चलती चलाती मिल और वो सारी ज़मीन जायदाद उस सरदार ने बेच दी ………..ज्योति का कहीं कोई पता नहीं था ……..हम लोग मन मसोस कर रह गए ………मेरा भी ट्रान्सफर पटियाला से दिल्ली हो गया फिर कुछ महीनों बाद हम दिल्ली से अपने गाँव आ गए और सब कुछ पीछे छूट गया ………

10 एक साल बाद एक बार हम दोनों जालंधर गए थे और तभी मेरी पत्नी मोनिका को उसकी कोई पुरानी सहेली मिल गयी …..हमने बस यूँ ही पूछ लिया ………ज्योति का कुछ पता चला ???? तो वो बोली हाँ …अमृतसर में रहती है ….बहुत खुश है ….बहुत सुखी है ….एक बेटी है ……….सरकारी नौकरी करती है ………address ?????? एड्रेस का तो पता नहीं …पर हाँ इतना पता है की अमृतसर में रहती है ……अब इतने बड़े शहर में बिना पते के उसे खोजना संभव न था और न इतना टाइम था हमारे पास सो हम लोग वापस गाँव चले गए ……..हम तो उसे न ढूंढ पाए पर उसने हमें ढूंढ लिया कुछ साल बाद …….हुआ यूँ की मेरी बहन जो की एक नामी खिलाड़ी है सो किसी खिलाड़ी से उसने उसका पता ढूंढ कर फोन किया ………मेरी बहनें उस से मिलने गयीं ……फिर हम लोग भी गए ………..मिले जुले……. हाल चाल लिया …..उसके पति से मिले जो की एक बेहद खुशमिजाज़ .जिंदादिल आदमी है …बेहद स्मार्ट ……..सजीला जवान 6 फुटा ………उनकी बेटी बेहद ख़ूबसूरत …एकदम अपने बाप पे थी ……सो एकांत में हमने उससे सारा किस्सा पूछा और ये की ये श्रीमान जी कौन हैं ?????? कहाँ से मिले ………
वो सरदार कहाँ है …….
सुखदेव अंकल ???????? अरे वो ठीक हैं …………अभी कल ही तो आये थे …आजकल अपने गाँव रहते हैं ……नौकरी से retire हो गए हैं ……..और हम लोग सारी रात गप्पें मारते रहे …सुख दुःख होता रहा …और उस रात जो कहानी निकल के आयी वो कुछ इस तरह है ………

वो गन्दा सा सरदार……… कोई रिश्ता नहीं था उसका इस परिवार से …..मेहता चोक में एक बैंक में पोस्टेड था जहाँ ज्योति के पिता जी का bank ac था ….सो हलकी फुलकी जान पहचान थी ….कभी कभी चाय पीने आ जाता था …और गप्पें मारने ……..फिर उसका वहां से ट्रान्सफर हो गया ….और जब ज्योति के पिता जी का अपहरण हो गया तो वो हाल चाल लेने आया ………लड़की अकेली थी …कोई रिश्तेदार न था …सो उसने छुट्टी ले ली …और फिर वहीं रहने लगा ……..मिल के जो भी लेन देन थे उसने पूरे किये ……..लोगों से पैसा वसूला ….लोगों की देनदारियां निपटाईं ………सारा हिसाब किताब लड़की को समझाया ………बंद पड़ी मिल चालू कराई ……सारा धंधा लड़की को समझाया …….उन दिनों आतंकवाद से पीड़ित लोगों को सरकारी नौकरी दी जाती थी …..पर उसके लिए एड़ियाँ रगडनी पड़ती थीं ……सो तीन साल तक उसके लिए भाग दौड़ की….और अंत में ज्योति को सरकारी नौकरी स्कूल टीचर की दिलाई …….एक अच्छा सा लड़का ……बेहद शरीफ ….अच्छे परिवार का ……ढूंढ कर लड़की के हाथ पीले किये ……..इस बीच कई बार आतंकियों की धमकी आयी पर वो टस से मस न हुआ …..फिर सबकी सलाह से वो मिल और सारी जायदाद वहां से बेच कर अमृतसर में एक अच्छा सा मकान खरीद कर दिया ….बाकी के पैसे कायदे से लड़की को सुपुर्द कर दिए ……..
उन दिनों को याद कर के ज्योति रोती रही और वो सारे किस्से सुनाती रही ……..
हम भी नाम आँखों से सुनते रहे ………..

अब सुखदेव अंकल बैंक से retire हो गए हैं …दो बेटे हैं उनके ….दोनों विदेश में रहते हैं ……….और वो अकेले फरीदकोट में अपने गाँव में रहते हैं ……..अक्सर ज्योति से मिलने अमृतसर आते रहते हैं ……ज्योति उनसे कहती है की आप यहीं मेरे पास ही रह जाइए ….तो वो कहते है की नहीं बेटा …..बाप को बेटी के घर में नहीं रहना चाहिए ………..
वो गन्दा सा सरदार