Wrestling coach by profession Social Media writer ....... Traveller ...... loves Biking , cooking,

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फ़ौज के लिए ये अच्छे लक्षण नहीं ।

मुझे अपने बचपन का वो किस्सा याद आता है जब 1971 की लड़ाई अभी बस ख़त्म ही हुई थी ।
पिता जी की regiment कश्मीर के छम्ब ज्योड़ियां sector में posted थी । जम्मू से आगे अखनूर जिले में छम्ब और ज्योड़ियां नामक दो गाँव हैं जो पकिस्तान सीमा से लगते हैं । बताया जाता है कि 1971 में इस छम्ब sector में भीषण युद्ध हुआ था ।
जिस समय युद्ध चल रहा था , हम लोग मने परिवार पठानकोट में था और पिता युद्धभूमि में ।
मेरी उम्र 6 साल थी …….. 6 साल का बालक युद्ध की विभीषिका का अंदाज़ा नहीं लगा सकता ।
उसे नहीं मालूम कि उसका पिता किस दशा में है । जीवित लौटेगा या नहीं ।
पर माँ ने वो दिन कैसे बिताये होंगे , पता नहीं ।
पर मुझे वो दिन आज भी याद है जब पिता जी गए थे । उन्होंने माँ से कहा था , फ़िक्र मत करना , अगर मुझे कुछ हो गया तो ये राष्ट्र तुम्हारा ध्यान रखेगा ।
तब की सेना में और आज की सेना में तो जमीन आसमान का फर्क है । वेतन भत्ते सुविधाएं और ex gratia पेमेंट ……. हर चीज़ में सुधार है । 1971 में ऐसा नहीं था । तब सेना के शहीदों को लाखों करोड़ों रु और ये petrol pump और Gas agency नहीं मिलती थी …….. 62 की indo China war में तो सैनिकों के पास जूते तक न थे । फिर भी , मुझे याद है , पिता जी पूरे उत्साह के साथ , हँसते खेलते गए थे ।
कुछ दिन बाद , जब कि युद्ध विराम हो गया और सेनाएं barracks में लौट आईं , और जब कि सैनिक अपने परिवारों से मिलने को मचल रहे थे , सबको छुट्टी देना संभव न था , सो पिता जी के CO कर्नल अर्जुन देव खन्ना ने अपने फौजियों से कहा , अपने परिवारों को यहीं बुला लो ।
और रेजीमेंट से कुछ दूर , एक खुले मैदान में , टेंट गाड़ दिए गए ।
उन दिनों ये रेल लाइन सिर्फ पठानकोट तक ही थी । सो पठानकोट रेलवे स्टेशन पे Jawan Bus लगा दी गयी । हर रेल से उतरने वाली families को ले के गाड़ियां छंब जाती ।
मुझे वो यात्रा आज भी याद है ………. जब उस 3 Ton गाडी में बैठ के हम छम्ब पहुंचे । लगभग सारा दिन ही लग गया ।
माँ ने ढेर सारी पूड़ियाँ और पतीला भर सब्जी बना रखी थी । रेल से उतरने वाले परिवारों के लिए ।
मुझे आज भी याद है वो picnic जब हम सबने पेड़ के नीचे बैठ के पूड़ियाँ खायी थी । उस 3Ton के driver और डंडा Man ने भी …….. जी हां फौजी गाडी के ड्राइवर के साथ जो खलासी helper होता था उसे उन दिनों डंडा Man कहा जाता था …….. वो एक डंडा लिए रहता था और driver को दिशा निर्देश देता था ।
Regiment में सुबह दोपहर शाम को लंगर से खाना नाश्ता ले के गाडी आती थी , सभी परिवारों के लिए । दूध के लिए Milk Maid के condensed milk के डब्बे और milk powder के कनस्तर । अमूल मक्खन के डिब्बे …….. राशन की कोई कमी नहीं थी ।
समस्या ये आयी कि बहुत से परिवार जो दक्षिण से आये थे उनके पास कोई गर्म कपड़ा न था जबकि छम्ब में भीषण सर्दी पड़ रही थी । ऐसे में मोटे मोटे काले खुरदुरे फौजी कंबल ……..
इफरात राशन होने के बावजूद भोजन का स्वाद अच्छा नहीं था ।
मूल समस्या थी अच्छे cooks का आभाव ।
मुझे याद है कि माँ लंगर से आयी दाल सब्जी को फिर से छौंक लगाती थी ।
फौजी रोटी की सबसे बड़ी खासियत कि उसे झाड़ झाड़ के खाना पड़ता था ।
क्योंकि बेलते समय रोटी को सीधे सीधे आटे पे रख के ही बेलते हैं जिस से उसमे अत्यधिक सूखा आटा जिसे परथन लग जाता था ।
पर फिर भी मुझे याद है कि वो खाना स्वाद रंग रूप में 19 हो सकता था पर पौष्टिक पूरा था , quality और quantity में कमी न थी ।
मुझे बचपन का वो दृश्य भी याद है कि हर फौजी पलटन में एक सूअर बाड़ा होता था जिसमे सूअर पाले जाते थे और उन सूअरों की खुराक पल्टन के लंगर और mess की जूठन ही होती थी जो इतनी ज़्यादा होती थी कि 30 – 40 सूअर पल जाते थे ।
कहने का मतलब ये कि फ़ौज को राशन की कमी कभी नहीं रही ।
एक बात और …….. आज के फौजी और तब के फौजी में अंतर था ।
मेरे पिता जी 1964 में सेना में गए ।
ये वो समय था जब कि 62 का युद्ध बस हुआ ही था और उसमें china ने भारयीय सेना को बुरी मार मारी थी । सेना के पास साजोसामान की भयंकर कमी थी । जूते और Rifles तक न थीं । सेना बाबा आदम के जमाने की 303 Rifles से लड़ रही थी । ऐसे बुरे हालात में जबकि चीन ने भारत के 27000 वर्ग Km भूभाग पे कब्जा कर लिया था , सेना का मनोबल पूरी तरह टूटा हुआ था और नेहरू मरने वाले थे , पिता जी सेना में गए । अभी ट्रेनिंग अधूरी ही थी कि 65 का युद्ध छिड़ गया । उसके बाद 71 …….. तब का फौजी जान हथेली पे ले के सेना में जाता था ……..
अब तो मौज ही मौज है । 71 से ले के 90 तक तो पूरा समय शान्ति रही ।
इसके बाद इक्का दुक्का छोटे मोटे ops हुए ।
60 के दशक में लौंडा फ़ौज में भर्ती हो जाए तो घर परिवार में मातम छा जाता था ।
आज बाप लोग 5 लाख रु ले के जुगाड़ खोजते फिरते हैं कि लौंडा किसी तरह भर्ती हो जाए ।
पूरब में अब फौजी लौंडों को दहेज़ में car मिल रही है ।
आजकल फौजी barrack के आगे 4 -6 swift और Dezire खड़ी दिख जाती हैं ।
25000 वेतन भी हो गया है ।
न फ़ौज अब पहले वाली रही न फौजी ।
पहले सिपाही निपट अनपढ़ अंगूठाटेक होते थे । अब BA , MA आम बात है ।
अब का सिपाही देश के लिए जान देने नहीं नौकरी करने गया है ।
अब वो अपने को अफसर से कमतर नहीं समझता ।
जबकि पैदल सेना का ये चरित्र है कि हर हाल में अफसर के हुक्म का पालन …….. yes Sir …….. अपना दिमाग बिलकुल नहीं लगाना …….. साहब ने कहा कि मौत के मुह में कूद जा तो कूद गया ……. न कुछ सोचा न समझा …….. न दिमाग लगाया …….. खुद को झोंक दिया ……..
युद्ध भूमि में दिमाग लगाने वाले लोग ही भगोड़े होते हैं ।

ये जो सेना और अर्द्धसैनिक बालों के जवानों के वीडियो धड़ाधड़ आ रहे हैं उस से लगता है कि योद्धाओं ने दिमाग लगाना शुरू कर दिया है । अफसरों को Villain बना के पेश किया जा रहा है ।
जबकि सेना में मान्यता है कि फ़ौज में सूबेदार मेजर साहब और Commanding Officer पिता सामान होते हैं जो अपने बच्चों से ज़्यादा ख़याल रखते हैं अपने जवानों का …….. Col. अर्जुन देव खन्ना ने सारे नियम कानून ताक पे रख के families को ही युद्ध भूमि में बुला लिया था ………. ये अपने योद्धाओं के welfare की पराकाष्ठा थी ।

पर आज जैसे अफसर बनाम NCO का माहौल बनाया जा रहा है , ये फ़ौज के लिए ये अच्छे लक्षण नहीं ।

वो गन्दा सा सरदार

बात उन दिनों की है जब पंजाब में आतंकवाद अपने चरम पर था …….हम लोग पटियाला में रहते थे उन दिनों …….शाम 6 बजे curfew जैसी स्थिति हो जाती थी …….बसें बंद हो जाती थीं ……..सिख आतंकवादी सरे आम हिन्दुओं को बसों से उतार कर गोलियों से भून दिया करते थे …….कानून व्यवस्था एवं प्रशासन नाम की चीज़ नहीं रह गयी थी …..अदालतों ने आतंकवादियों के मुक़दमे सुनने बंद कर दिए थे क्योंकि न्यायाधीशों की कोई सुरक्षा नहीं रह गयी थी ……अखबारों ने आतंकियों के निर्देश पर उन्हें आतंकवादी न लिख कर खाड़कू लिखना शुरू कर दिया था ……….स्थिति बेहद निराशाजनक थी …….सो उन दिनों की बात है ……..
मेरी नई नई शादी हुई थी …….तभी खबर आयी की ज्योति के पिता जी को कल रात उठा के ले गए ……ज्योति यानी मेरी बहनों और पत्नी की एक अत्यंत घनिष्ठ सहेली जिनसे हमारा बहुत नजदीकी पारिवारिक सम्बन्ध भी था ………बड़ी बुरी खबर थी …….अब ये घटना थी मेहता चौक की …..मेहता चौक अमृतसर जिले का एक अंदरूनी इलाका था और भिंडरावाले का गढ़ था …….वहां का नाम सुन के ही रूह कांप जाती थी उन दिनों ………..खैर ,हम दोनों पति पत्नी चल पड़े बस से ……4 -5 घंटे का सफ़र था ……पूरी बस में सब सिख थे सिर्फ हम 4 -6 लोग हिन्दू थे …वैसे उन दिनों हिन्दुओं ने भी बाल दाढ़ी बढ़ा कर पगड़ी बांधनी शुरू कर दी थी ………पूरे रास्ते सड़क के दोनों तरफ सुरक्षा बालों ने पिकेट बना रखे थे और मशीन गन ले के बैठे थे …….माहौल में दहशत और आतंक था ……..सर्दियों के दिन थे ……..वहां पहुँचते पहुँचते शाम हो गयी …..जब हम बस अड्डे पर उतरे तो हालांकि धुंधलका था फिर भी बाज़ार बंद हो चुके थे …..अड्डा सुनसान था ….बस से कोई 8 -10 सवारियां उतरीं और न जाने कहाँ गायब हो गयीं ………..कोई रिक्शा नहीं था सड़क पर ….हम दोनों पैदल ही चल पड़े ………सुनसान सड़क पर अभी कुछ ही दूर गए होंगे की एक जिप्सी हमारे बगल में आ कर रुकी और उसमें से एक कड़कती हुई आवाज़ आयी …..कौन हो तुम लोग और इस समय सड़क पर क्या कर रहे हो ……..पुलिस की जिप्सी थी और उसमें एक डिप्टी एस पी बैठा था …हमने उसे पूरी बात बताई ……..उसने हमसे कहा अन्दर बैठो और हमें घर तक छोड़ दिया ……..

एक बड़ी सी राइस मिल की चार दीवारी पे बड़ा सा गेट था …..हम उसे खटखटाने लगे …..बहुत देर तक कोई हलचल न हुई …..अन्दर जीवन का कोई चिन्ह नहीं था ……..
अब हमें काटो तो खून नहीं ……..जाएँ तो जाएँ कहाँ ??????? वो जिप्सी भी जा चुकी थी ….खैर एक बार और गेट खटखटाया ………तो हलकी सी एक आवाज़ आयी ….कौन है ???? हमारी जान में जान आयी ……..मेरी पत्नी चिल्लाई ……..ज्योति …….फिर ज्योति गेट पर आयी और उसने गेट खोला …हम अन्दर आये ……..इतनी बड़ी सुनसान सी राईस मिल में ….अकेली लड़की …….मां पहले ही चल बसी थी ..अब बाप भी गया ……..
अन्दर पहुंचे तो एक आदमी बैठा था ………सरदार …..गन्दा सा …..
ये कौन है …..मैंने धीरे से पूछा ………
ओह ये सुखदेव अंकल है …….
कौन सुखदेव …कहाँ का अंकल ….ये कहाँ से प्रकट हो गया ……आज तक तो सुना नहीं था …….
बहुत सारे प्रश्न ले कर हम अन्दर पहुंचे …………
दुआ सलाम हुई …….रात भर रहे ……
वो अजीब सा आदमी ………..एक दम शांत ……..कोई हरकत नहीं ……
उसने हमें सिर्फ इतना कहा …आप लोग चिंता न करें ……मैं हूँ न ……
अब तो हमारी चिंता और बढ़ गयी ….
सुनसान घर में अकेली जवान लड़की ………और ये गंदा सा सरदार ……..
और उन दिनों तो हम हिन्दुओं के मन में सरदारों के लिए एक स्वाभाविक सी नफरत तो थी ही …………अकेले में पूछा अरे भाई ये है कौन …सो पता चला की किसान है कोई ……..इसका धान आया करता था कभी राईस मिल पर ………तो अब यहाँ क्या कर रहा है …….पता चला की ये भी हमारी तरह खबर सुन कर आया है …..तो हमने कहा इस से कह दो अब ये जाए ….क्योंकि अब हम लोग आ गए हैं …..पर वो बोला ……आप लोगों के बस का कुछ नहीं है ….और आप लोगों का यहाँ रहना भी सुरक्षित नहीं है सो आप लोग अब जाओ ………जल्दी निकलो और टाइम से अपने घर पहुँचो……..कल की तरह लेट नहीं होना ………जिस अधिकार से और रोब से उसने ये बात कही और ज्योति चुपचाप सुनती रही तो हमारे सामने अब कोई चारा भी नहीं था और हम हारे जुआरी की तरह चुप चाप निकल लिए ……
घर आये और सारी बात बतायी …….सब लोग चिंतित थे …….पर कोई कुछ कर नहीं सकता था ………खोज खबर लेते रहे ….ज्योति के पिता जी का कुछ पता न चला …..लाश तक न मिली ………
बीच बीच में खबरें आती रहीं ……..वो सरदार अब परमानेंट वहीं रहने लगा था ……..
मेरी माँ अक्सर परेशान होतीं …….बहनें चिंता करती …….सबका यही मत था की बेचारी अकेली अनाथ लड़की ….निरीह ,बेसहारा ….और उस अनजान सरदार के चंगुल में …..बाद में ये भी पता चला की वो किसी बैंक में काम करता है …सो हम सब यही कहते ….अरे बैंक में है तो जा के अपनी नौकरी करे …वहां क्या पड़ा है ………मां कहती …लड़की वहां बिलकुल भी सुरक्षित नहीं है ………देखना एक दिन मार देगा …सब कुछ हड़प लेगा ……..इतनी बड़ी राईस मिल है ……घर है …इतनी ज़मीन है ……..क्या उम्र है उसकी ………शादी ही क्यों नहीं कर लेता उससे ……..
अरे नहीं मम्मी अधेड़ है …होगा कोई 45 एक साल का …जवान लड़का है उसका ……..
अरे जवान लड़का है तो उसी से शादी करा दे ज्योति की …………
ऐसी तमाम चर्चाएँ चला करती थीं हमारे घर में ……और सब लोग पानी पी पी कर …..”उस गंदे से सरदार “को गरियाते थे ……….

खैर समय बीतता गया ……..हम लोग भी अपने अपने कामों में व्यस्त हो गए ………ज्योति को हमने उसके भाग्य के भरोसे छोड़ दिया ……….बीच बीच में उसकी खबर आ जाया करती थी …………..2 -1 साल बाद खबर मिली की वो ठीक है …….वो गन्दा सा सरदार अब भी वहीं रहता है ……..फिर यह भी पता चला की ज्योति ने वो राईस मिल जो बंद हो गयी थी फिर शुरू कर दी है …..अब वो उसे चलाती है और वो सरदार उसकी मदद करता है ………..फिर एक दिन ये खबर आयी की वो चलती चलाती मिल और वो सारी ज़मीन जायदाद उस सरदार ने बेच दी ………..ज्योति का कहीं कोई पता नहीं था ……..हम लोग मन मसोस कर रह गए ………मेरा भी ट्रान्सफर पटियाला से दिल्ली हो गया फिर कुछ महीनों बाद हम दिल्ली से अपने गाँव आ गए और सब कुछ पीछे छूट गया ………

10 एक साल बाद एक बार हम दोनों जालंधर गए थे और तभी मेरी पत्नी मोनिका को उसकी कोई पुरानी सहेली मिल गयी …..हमने बस यूँ ही पूछ लिया ………ज्योति का कुछ पता चला ???? तो वो बोली हाँ …अमृतसर में रहती है ….बहुत खुश है ….बहुत सुखी है ….एक बेटी है ……….सरकारी नौकरी करती है ………address ?????? एड्रेस का तो पता नहीं …पर हाँ इतना पता है की अमृतसर में रहती है ……अब इतने बड़े शहर में बिना पते के उसे खोजना संभव न था और न इतना टाइम था हमारे पास सो हम लोग वापस गाँव चले गए ……..हम तो उसे न ढूंढ पाए पर उसने हमें ढूंढ लिया कुछ साल बाद …….हुआ यूँ की मेरी बहन जो की एक नामी खिलाड़ी है सो किसी खिलाड़ी से उसने उसका पता ढूंढ कर फोन किया ………मेरी बहनें उस से मिलने गयीं ……फिर हम लोग भी गए ………..मिले जुले……. हाल चाल लिया …..उसके पति से मिले जो की एक बेहद खुशमिजाज़ .जिंदादिल आदमी है …बेहद स्मार्ट ……..सजीला जवान 6 फुटा ………उनकी बेटी बेहद ख़ूबसूरत …एकदम अपने बाप पे थी ……सो एकांत में हमने उससे सारा किस्सा पूछा और ये की ये श्रीमान जी कौन हैं ?????? कहाँ से मिले ………
वो सरदार कहाँ है …….
सुखदेव अंकल ???????? अरे वो ठीक हैं …………अभी कल ही तो आये थे …आजकल अपने गाँव रहते हैं ……नौकरी से retire हो गए हैं ……..और हम लोग सारी रात गप्पें मारते रहे …सुख दुःख होता रहा …और उस रात जो कहानी निकल के आयी वो कुछ इस तरह है ………

वो गन्दा सा सरदार……… कोई रिश्ता नहीं था उसका इस परिवार से …..मेहता चोक में एक बैंक में पोस्टेड था जहाँ ज्योति के पिता जी का bank ac था ….सो हलकी फुलकी जान पहचान थी ….कभी कभी चाय पीने आ जाता था …और गप्पें मारने ……..फिर उसका वहां से ट्रान्सफर हो गया ….और जब ज्योति के पिता जी का अपहरण हो गया तो वो हाल चाल लेने आया ………लड़की अकेली थी …कोई रिश्तेदार न था …सो उसने छुट्टी ले ली …और फिर वहीं रहने लगा ……..मिल के जो भी लेन देन थे उसने पूरे किये ……..लोगों से पैसा वसूला ….लोगों की देनदारियां निपटाईं ………सारा हिसाब किताब लड़की को समझाया ………बंद पड़ी मिल चालू कराई ……सारा धंधा लड़की को समझाया …….उन दिनों आतंकवाद से पीड़ित लोगों को सरकारी नौकरी दी जाती थी …..पर उसके लिए एड़ियाँ रगडनी पड़ती थीं ……सो तीन साल तक उसके लिए भाग दौड़ की….और अंत में ज्योति को सरकारी नौकरी स्कूल टीचर की दिलाई …….एक अच्छा सा लड़का ……बेहद शरीफ ….अच्छे परिवार का ……ढूंढ कर लड़की के हाथ पीले किये ……..इस बीच कई बार आतंकियों की धमकी आयी पर वो टस से मस न हुआ …..फिर सबकी सलाह से वो मिल और सारी जायदाद वहां से बेच कर अमृतसर में एक अच्छा सा मकान खरीद कर दिया ….बाकी के पैसे कायदे से लड़की को सुपुर्द कर दिए ……..
उन दिनों को याद कर के ज्योति रोती रही और वो सारे किस्से सुनाती रही ……..
हम भी नाम आँखों से सुनते रहे ………..

अब सुखदेव अंकल बैंक से retire हो गए हैं …दो बेटे हैं उनके ….दोनों विदेश में रहते हैं ……….और वो अकेले फरीदकोट में अपने गाँव में रहते हैं ……..अक्सर ज्योति से मिलने अमृतसर आते रहते हैं ……ज्योति उनसे कहती है की आप यहीं मेरे पास ही रह जाइए ….तो वो कहते है की नहीं बेटा …..बाप को बेटी के घर में नहीं रहना चाहिए ………..
वो गन्दा सा सरदार

सारनाथ express में नवाज़ुद्दीन की फिल्म

5 साल पुराना किस्सा है ।
किसी काम से भोपाल गया था. पहुंचा ही था की खबर मिली की माँ बीमार है और अस्पताल में भर्ती है. सो सब काम छोड़ कर बनारस जाना पडा. जो भी पहली ट्रेन मिली पकड़ ली. southern express पकड़ के झांसी तक आया. वहाँ से रात तीन बजे संपर्क क्रांति मिली जिसने सुबह दस बजे मानिक पुर उतार दिया. दस मिनट बाद ही दुर्ग छपरा सारनाथ एक्सप्रेस आ गयी. उसमें स्लीपर क्लास में दरवाज़े के साथ जो एक अकेली सीट होती है TTE वाली उस पे बैठ गया. सारनाथ एक्सप्रेस में PANTRY CAR नहीं होती. मानिक पुर की कैंटीन से खाना चढ़ता है. सो एक पैंट्री कर्मी वहाँ से सवार हुआ और उसने दरवाज़ा बंद कर वहीं सामने ज़मीन पे 30 -40 प्लेट खाना रख दिया. ट्रेन चल पडी और वो अलग अलग डिब्बों में खाना आर्डर के अनुसार पहुंचाने लगा.
तभी वहाँ एक लड़का आया. उम्र रही होगी यही कोई तेरह चौदह साल. एक दम फटेहाल नहीं था. बहुत गंदा मैला कुचैला भी नहीं था. उसकी निगाह वहाँ रखे खाने की प्लेटों पे पडी. दो किस्म की प्लेटें थी. एक तो सामान्य थर्माकोल की प्लेट थी जिसपे silverfoil चढ़ा था. उसके ऊपर कुछ hifi किस्म की प्लेटें रखी थी. एकदम पारदर्शी. और उसमे रखा भोजन बड़ा आकर्षक था. दो तीन किस्म की सब्जी, परांठे, पुलाव, रायता, सलाद……. और हाँ ……एक गुलाब जामुन भी था.

सामने रखा भोजन देख वो लड़का ठिठक गया. बड़ी गौर से उसने खाने की तरफ देखा. फिर उसकी निगाह मेरे ऊपर पडी. एक दो मिनट वो वहीं खड़ा रहा. कभी मुझे देखता था कभी खाने को. फिर मुझसे बोला ………. अंकल जी ………. पूड़ी खाउंगा………. मैंने उस से कहा, नहीं बेटा, ये पूड़ी किसी और की है. अच्छा बैठ, तुझे पूड़ी खिलाते हैं. वहीं बगल में एक मौलाना साब खड़े थे. साथ में उनका परिवार था. उन्होंने अपनी पत्नी सी पूछा , खाना बचा है ? उन्होंने ना में सर हिला दिया. मैंने उस लड़के से कहा अच्छा रुक, कोई न कोई तो आयेगा. कुछ देर बाद एक बिस्कुट बेचने वाली आयी और मैंने उसे दस रु के बिस्किट दिलवाए और कहा बेटा, अब कट ले यहाँ से, और वो अगले डिब्बे में चला गया.

अभी दो मिनट भी न बीते थे की एक और भिखारी आ गया. लंबा चौड़ा, हट्टा कट्टा सा था. मैली कुचैली शर्ट पहने था, लम्बे बिखरे बाल थे. उसने भूखी नज़रों से वहाँ पड़े उस खाने को देखा. खाना देखते ही उसकी आँखों में चमक आ गयी. फिर उसकी निगाह मुझपे पड़ी और वो ठिठक गया. वहीं सामने वाले दरवाज़े के पास खडा हो गया. उसके पास पानी की बोतल थी. उसने वो पानी की बोतल एक सांस में खाली कर दी. और फिर ललचाई नज़रों से खाने को देखने लगा.
कुछ दृश्य ऐसे होते हैं जो जीवन भर नहीं भूलते. ऐसा ही एक दृश्य मैंने Newyork फिल्म में देखा था जिसमे नवाज़उद्दीन ने इतना बेहतरीन अभिनय किया था कि वो दृश्य मेरे ज़ेहन से आज तक नहीं उतरा. पर वो तो फिर भी अभिनय था. यहाँ एक भूखा आदमी नज़रें बचा कर सामने रखे खाने को ललचाई नज़रों से देख रहा था और सामान्य होने का अभिनय भी कर रहा था.
मैं हमेशा से कहता आया हूँ की travelling से बड़ा दुनिया का कोई अनुभव नहीं होता ……… आज ये दृश्य देख के मुझे अजीब सा लग रहा था. वो भिखारी दो तीन मिनट वहीं खडा रहा. कभी मुझे देखता कभी खाने को. मैंने जान बूझ कर आँखें बंद करने का अभिनय किया और बंद आँखों से सब देखता रहा. मुझे सोया देख कर फिर उसकी आँखों में चमक आ गयी. उसने हिम्मत जुटाई और एक झपट्टे में वो ऊपर वाली प्लेट उठा ली और दूसरे डिब्बे में निकल गया. मैं हमेशा ये लिखता हूँ कि भूख का मुझे कभी कोई First hand experience नहीं हुआ. जब भूख के मारे अंतड़ियों में जलन हो रही हो और सामने खाना पडा हो तो मन में क्या भाव उठते होंगे. और उस समय आदमी कैसे मन को समझाता होगा, बहलाता होगा. रशीद मसूद, राज बब्बर और राहुल गाँधी ने अगर कभी भूख महसूस की होती तो शायद वो भूख और गरीबी पे ऐसे बेशर्म बयान न देते.
मेरी फिल्म का इंटरवल हो गया था

दस मिनट बाद फिल्म फिर शुरू हुई. वो खाने वाला वापस आया. उसने वो खाने की प्लेट देखी तो कहा, एक प्लेट कहाँ गयी ? मैंने यूँ नाटक किया जैसे कुछ नहीं जानता. कौन सी प्लेट, कैसी प्लेट ? अरे तुम्ही तो ले गए थे 8 -10 प्लेट ………… अरे नहीं एक प्लेट और थी यहाँ ………. अरे हाँ शायद, यहाँ जो भिखारी खड़ा था, वही ले गया होगा. उधर गया है शायद. और वो भाग के उधर गया. मैं उसके पीछे पीछे चल दिया. दूसरे डिब्बे में वो भिखारी एक कोने में बैठा जल्दी जल्दी वो खाना खा रहा था. और वो आदमी………… उसने उसे कुछ नहीं कहा………… चुपचाप खडा देखता रहा…………….मैं सोचता था कि चिल्लाएगा, नाराज़ होगा, मारेगा पीटेगा………… पर उसने कुछ नहीं कहा. बस खड़ा देखता रहा. और मैं दूर से उन दोनों को देखता रहा. फिर वो मुंह लटकाए वापस आ गया. और बाकी बचे खाने को सहेजने समेटने लगा. उसके चेहरे पे हताशा और निराशा के भाव थे. उसे सहज होने में तीन चार मिनट लगे.

मैंने पूछा , कितने की प्लेट थी ?
120 रु की ………
और ये सस्ती वाली?
50 की …………
मैंने पूछा क्या मिलता है तुम्हें इसमें?
3 रु प्लेट कमीशन मिलता है ………
मैंने हिसाब लगाया, आज की दिहाड़ी तो गयी इसकी. फिर मुझे पश्चाताप होने लगा, आत्म ग्लानि हुई. बेटा अजीत सिंह, तुमने खुद मज़ा लेने के चक्कर में इस गरीब आदमी का नुकसान करा दिया. बड़ी देर तक वो आदमी मुंह लटकाए, बुझे मन से लोगों को घूम घूम के खाना खिलाता रहा. मैं उसे देखता रहा. जब सारा खाना ख़त्म हो गया और वो आख़िरी प्लेट उठाने आया तो मैंने उसे रोका और कहा…….. हे, सुनो…….. ये लो 120 रु…….
उसे सहसा विश्वास न हुआ….किस बात के…….
यूँ ही…..रख लो…….
उसने कहा, नहीं रहने दीजिये…….. आप क्यों देंगे?
मै बोला, नहीं ले लो…….. मैंने उसे जान बूझ कर नहीं रोका था…. उसने मेरे सामने वो प्लेट उठायी थी…. मैं चाहता तो उसे रोक सकता था. इसलिए ये 120 रु तुम मुझसे ले लो.
उसके चेहरे पे एक हल्की से मुस्कान दौड़ गयी. और आँखों में चमक…… और उसने धीरे से वो 120 रु थाम लिए.
मैं देर तक अपनी सीट पे बैठा सोचता रहा….
हिसाब लगाया… कमबख्त आज की फिल्म 130 रु में पड़ गयी.

ये कोई किस्सा कहानी नहीं बल्कि एक सत्य घटना है ।
सबसे पहले अपने ब्लॉग पे लिखी थी । फिर बीसियों बार फेसबुक पे भी शेयर की ।
ये मेरी सर्वाधिक लोकप्रिय रचनाओं में एक रही है ।
फेसबुक तो समंदर है । वहाँ रचनाएं खो जाती हैं , डूब जाती है ।
इसलिए आज इसे यहाँ चिपका दिया है ताकि खोए न ……..

UP को अब सिर्फ मोदी से आस

पिछले 3 दिन देश के सर्वाधिक बैकवर्ड इलाके में बीते ।
जिला गाज़ीपुर – उत्तर प्रदेश में ।
चुनावी माहौल में भी गाँव में सिर्फ 6 से 8 घंटे बिजली ।
वो आठ घंटे भी दो किश्तों में ।
उसमे भी हर एकाध घंटे बाद 10 -5 मिनट के लिए कट जाती थी ।
सड़कें बेहाल ।
मेरे साथ विपिन भाई थे । विपिन भाई भीलवाड़ा राजस्थान से हैं । हमारे जिले के state highway की दशा देख के बोले , इतनी बदतर सड़कें ? बिजली की ये दशा ? फिर भी आपका CM अपने को विकास पुरुष कहता है ?
मैंने राजस्थान की सड़कें देखी हैं । NH या state highway तो छोड़ दीजिए , गाँव की सड़कें भी शानदार हैं ।
विपिन भाई ने एक मज़ेदार टिप्पणी की । बोले अजीत भाई आप लोग तो हमसे भी 50 साल पीछे हैं ।
एकदम टूटी हुई सड़क पे जिसपे सड़क तो है ही नहीं , सिर्फ गड्ढे हैं , car बमुश्किल 20 की स्पीड से चल रही थी , लोगों ने तकरीबन हर 100 या 200 मी पे speed breaker बना रखे थे ।
विपिन भाई बोले , पिछड़ापन एक मानसिक अवस्था है । इसका economy या infrastructure से कोई सम्बन्ध नहीं ।
मेरे गाँव में किसी भी कंपनी के किसी भी नेटवर्क पे कोई भी नेट , 4g छोडो 2G तक नहीं चल रहा था । Jio तो खैर सिरे से गायब है । अभी यहाँ आना बाकी है ।
3 दिन बाद जब मुग़ल सराय पहुंचे तो net नसीब हुआ ।

पर कुछ positive चिन्ह भी दिखे । लगभग हर सड़क के किनारे ताज़ी ताज़ी बिछी हुई OFC बोले तो Optical Fibre cable दिखी । साथ बैठे एक मित्र ने ढांढस बधाया । सिर्फ एक साल और ……. फिर आपको हाई स्पीड net मिलेगा (thanks to Ravi Shankar )

रेलवे में जबरदस्त काम हो रहा है । हमारे जिले में दो रेलवे रुट हैं ।
एक औंडिहार गाज़ीपुर बलिया और दूसरा औंडिहार मऊ गोरखपुर ।
दोनों रूट के प्रत्येक स्टेशन पे development का काम चल रहा है । जखिनिया स्टेशन देख के तो तबियत खुश हो गयी । तमाम आधुनिक सुविधाएं और शानदार निर्माण कार्य ।
औंडिहार सारनाथ लाइन का दोहरीकरण हो चुका है । वाराणसी बलिया का विद्युतीकरण अंतिम चरण में है । खंबे लग चुके हैं , सिर्फ तार लगाना बाकी है । (thanks to Manoj Sinha )
हमारे गाँव में 50 बरस बाद नया transformer लगा है ।
पहली बार हम लोगों का पंखा भी तेज चला …… उस बेचारे को भी 140 – 150 volt की आदत पड़ गयी थी । ( thanks Piyush Goyal )
विकास कार्य जो भी है वो केंद्र सरकार के कारण ।
अकललेस जादो तो बस लखनऊ मेट्रो और लखनऊ आगरा expressway बना के मस्त हैं ।
उनका विकास सिर्फ लखनऊ सैफई तक सीमित है ।

UP को अब सिर्फ मोदी से आस है ।
सिर्फ मोदी ही प्रदेश का विकास कर सकते हैं ।

न अपना जन्म दिन मनाऊंगा न मनाने दूंगा ।

न खाऊंगा न खाने दूंगा ।
न अपना जन्म दिन मनाऊंगा न मनाने दूंगा ।
न अपने जन्म दिन पे रंडी नचाऊंगा और न भोसड़ी वाले नकटेढ़वा तोतले को नचाने दूंगा ।
अपने जन्म दिन पे दो हज़ार के नोट की माला pink माला न खुद पहनूंगा न भैंसवती को पहनने दूंगा ।
अपने तो लाखों लोगों की रैली करूंगा पर इन भोसडीवालों को सिर्फ PC बोले तो press conference से काम चलाने पे मजबूर कर दूंगा ।

नोट बंदी का असर साफ़ दिख रहा है ।
चुनाव में सिर्फ एक महीना बचा है ।
पिछले 30 दिन में UP में कितनी rally हुई हैं ?
सपा की आखिरी rally कब हुई थी ?
बसपा की ?
Congress की बहराइच रैली को कितने दिन हुए ।
आज BMW का हैप्पी बड्डे है । कल्पना कीजिये कि नोटबंदी न हुई होती तो आज मायावती ने कितनी बड़ी रैली की होती UP में और कितना नगद चन्दा , कैसी कैसी माला पहनी होती और कैसे कैसे हीरे जड़े मुकुट पहने होते …….. आज भैंस वती कह रही थी कि मैं अपना जन्म दिन सादगी से मना रही हूँ । अबे यूँ कह न कि मोदिया साला भिखारी बना दिया । चड्ढी छोड़ सब ले गया ।
इतना बड़ा चुनाव ……. UP का …… मिनी General election ……..
और ऐसा सन्नाटा ?

ये नोटबंदी का असर नहीं तो क्या है ?

ये हाल के वर्षों में जब से ये धनबल बाहुबल की राजनीति शुरू हुई है , ये सबसे सस्ता चुनाव होने जा रहा है ।

भारत बदल रहा है ।

काबुल में सब घोड़े ही नहीं होंते । कुछ गधे भी होते हैं ।

कहावत है कि काबुल में सब घोड़े ही नहीं होंते ।
कुछ गधे भी होते हैं ।
फ़ौज में भी सब विक्रम बतरा नहीं होते । कुछ मनीष भटनागर भी होते हैं ।
बहरहाल फौजियों ने social media में अपने grievances के वीडियो बना के डालने शुरू कर दिए हैं । देश द्रोही मीडिया इन ख़बरों को चटखारे ले ले के दिखा रहा है ।
उधर सुनते हैं कि एक फौजी ने तो बाकायदा धरना भूख हड़ताल शुरू कर दी है ।
किसी फ़ौज के लिए इस से ज़्यादा भयावह स्थिति और नहीं हो सकती । फ़ौज में हुक्म उदूली की सज़ा dismissal होती है । इसके अलावा किसी किस्म की हड़ताल , धरना प्रदर्शन या भूख हड़ताल इत्यादि अक्षम्य अपराध माने जाते हैं । इस लगभग विद्रोह या Mutiny मान लीजिए ।

मीडिया को ऐसे issues की गैर जिम्मेदाराना reporting से बचना चाहिए ।
एक फौजी ने फ़ौज में अफसरों द्वारा अर्दली बनाने को ले के आपत्ति की है ।
इस अर्दली को ले के एक किस्सा आपको सुनाता हूँ ।

हमारे एक मित्र जो फ़ौज से रिटायर हो के आये थे उन्होंने ये किस्सा सुनाया । हुआ ये कि जब वो फ़ौज में थे तो एक बार अपने Major साहब के पास उनके बंगले पे कुछ फौजी जवान आये हुए थे और gate पे खड़े अपने साहब से बातें कर रहे थे ।
बगल वाला बँगला Air Force के एक Squadron Leader का था और वो घर शिफ्ट कर रहे थे । Air Force का truck आ के खड़ा हुआ और Sq. Leader साहब स्वयं truck से सामान उतारने लगे और उनकी पत्नी इस काम में उनका हाथ बंटाने लगी । इसी बीच कोई भारी सामान था उसे उतारना था । Sq Leader साहब ने अपने truck के driver से गुजारिश की कि थोड़ा हाथ लगा दे । वो एक दक्षिण भारतीय Air Man था । साफ़ नट गया । Sorry Sir , मेरी यूनिफार्म गन्दी हो जायेगी ।
हार के दोनों पति पत्नी स्वयं कोशिश करने लगे ।
Major साब से ये देखा न गया । उन्होंने अपने जवानों को ललकारा ……. क्या जवान ? अब यही होगा । चारों जवान लपक के truck पे चढ़ गए और 10 मिनट में पूरा truck खाली कर सामान घर के भीतर पहुंचा दिया ।
फिर मेरे मित्र जब रिटायर हो के आ गए और उनका बेटा जो मेरे स्कूल का student था , वो NDA मने National Defence Academy में भर्ती हो गया तो उन्होंने अपने बेटे को समझाया , भूल के भी Airforce या Navy में मत चले जाना । अफसर बनने का मजा सिर्फ Army में ।
Airforce और Navy में Air Man और Sailor अफसरों की सेवा में हाजिरी नहीं लगाते ।
Army का जवान साहब की सेवा में सर्वदा तत्पर रहता है । सिर्फ Army अपने अफसर को सेवादार या Orderly बोले तो अर्दली देती है ।
क्यों भला ?
इसका मर्म एक बार मुझे फ़ौज के एक कर्नल साहब ने ही समझाया ।
Navy और Airforce बड़ी साफ़ सुथरी forces होती हैं । उन्हें जमीन पे नहीं लड़ना । फ़ौज जमीन पे लड़ती है । धूल मिट्टी , कीचड़ , पानी , दलदल , बर्फ , जंगल पहाड़ रेगिस्तान , सांप बिछ्छू सबसे लड़ना है । जमीन खोद के trench में भी रहना। है और jungle में tent गाड़ के भी रहना है ……. मीलों पैदल मार्च करना है और hand to Hand combat भी करना है दुश्मन से ……. कभी barack में तो कभी totally Inhospitable terrain में भी रहना है ।
कभी घी में चुपड़ी खानी है तो कभी ज़िंदा रहने के लिए घास पात और सांप केकड़े भी खाने हैं ……. पहाड़ से खुरच के काई भी खानी पड़ती है कभी …….. वहाँ युद्ध के मैदान में कोई ढाबा restaurant नहीं खुला है । front पे जैसी भी कच्ची पक्की मिले पेट भर खाओ …… न पेट भर मिले तो आधा पेट खाओ ……… पर मुह से उफ्फ नहीं निकलनी चाहिए ।
फौजी बताते हैं कि फ़ौज में कभी बहुत अच्छा खाना मिलेगा तो कभी बहुत खराब ।
फौजी अफसरों के बारे में एक बात और ।
कारगिल युद्ध के शहीदों की सूचि उठा के देख लीजिए ।
सारे मने 90% शहीद जवान लड़के थे । 20 – 22 – 25 के ।
फ़ौज में जब भी कोई operation होता है ……. कहीं धावा बोलना है …… कहीं घुस के attack करना है …….. तो फ़ौज की टुकड़ी में एक JCO , कोई एकाध हवलदार होगा , 4 -6 सिपाही नायक लांस नायक होंगे ……. पर उनका नेतृत्व करेगा एक जवान लड़का ……. वो जो बस अभी IMA बोले तो Indian Military Academy से निकल के आया ही है …… कोई Lieutenant या कप्तान …….. वो सबसे आगे चलता है । वही सबसे आगे रहता है । वही सबसे पहले दुश्मन की मांद में घुसता है । तो नेतृत्व करता है । सबसे आगे उसी का सीना रहता है ।
अक्सर पहली गोली भी वही खाता है ।
और जनाब , सामने से 12 बोर के छर्रे नहीं LMG का burst आता है …….… आपके ऊपर कोई LMG का burst झोंक दे न , या LMG की गोली आपके बगल से निकल भर जाए न , तो सुना है कि अच्छे अच्छे जांबाज़ लोगों की पैंट गीली औ पीली हो जाए …….. ऐसे में वो 22- 24 साल का लौंडा जान हथेली पे ले के सबसे आगे चलता है । सबको हौसला देता चलता है ……..
ऐसे मुश्किल हालात में जीती है फ़ौज और इन्ही हालात से निपटने के लिए ही फौजी अफसरों को अर्दली मने सहायक देने की परंपरा शुरू हुई ।
महाभारत में भी ऐसा वर्णन है कि जब सूर्यास्त के बाद सेनाएं शिविर में लौट आतीं तो उनकी सेवा सुश्रुषा में कुछ लोग लपट जाते ।
शायद वही लोग सेवादार या अर्दली हुए । सेना एक ऐसा institution है जिसका सतत विकास हुआ और military Science भी इसी प्रकार Science के रूप में धीरे धीरे evolve हुई जिसमें कि हज़ारों हज़ारों सालों का अनुभव छुपा है । इसे यूँ हलके में खारिज नहीं किया जा सकता ।
अक्सर हम सेना को शांतिकाल में देख के उनका आकलन करने लगते हैं ।
पर इतना याद रखना चाहिए कि शांतिकाल में भी हर सेना battle ready होती है ।
सेना में अर्दलियों के दुरुपयोग और उनसे घरेलू काम कराये जाने कक शिकायतें अक्सर मिलती रहती हैं पर मेरा ये निजी अनुभव है कि हर किसी को अर्दली बना के नहीं भेजा जाता ।
1000 – 1200 लोगों की पल्टन में होते हैं 10 – 20 ऐसे जो इन्ही कामों के लायक होते हैं । कुछ लांगरी , कुछ धोबी नाई , कोई sweeper और कुछ सेवादार ।
फ़ौज में कभी भी किसी जांबाज़ किस्म के सिपाही को अर्दली ( घरेलू ) की ड्यूटी नहीं दी जाती ।
किसी को भी सेवादार भेजने से पहले बाकायदा पूछा जाता है ।
मुझे वो किस्सा भी याद है जब अम्बाला छावनी में वो फौजी पिता जी के सामने पेश हुआ और उसने कहा कि साहब मैं घरेलू सेवादार नहीं बनना चाहता और तत्काल उसकी duty बदल दी गयी थी ।
और वो राम स्वरुप भी याद है चंडीगढ़ में जो पूरे 2 साल बड़े मजे से हमारा सेवादार रहा ।
काबुल में सब घोड़े नहीं होते और किसो को जबरदस्ती न घोड़ा बनाया जा सकता है न गधा ।
फिर भी , फ़ौज में घरेलू सेवादार बनाने का सिस्टम तत्काल प्रभाव से बंद होना चाहिए ।

तेज बहादुर की समस्या आखिर है क्या ?

आजकल खबरंडियां सैनिक बलों के welfare को ले के भोत जायदे चिंतित हो गयी हैं ।
भोत रंडी रोना मचा हुआ है ।
सब लोग फौजी भाइयों की दशा दुर्दशा को ले के भोत चिंतित लग रिये हैं ।
ये सारा रंडी रोना देख के मेरे को बहुत पुराना ये किस्सा याद आ गया ।
हुआ ये के 1984 में जब कि मैं पहलवानी करता था , मेरा room mate और मेरा पार्टनर सोनीपत जिले का एक जाट भाई था । दिल्ली के नज़दीक ही उसका गाँव था । अक्सर उसके गाँव जाना होता था । उसका एक चचेरा भाई था । भोत हैरान परेशान प्राणी था । उसके दुःख से पूरा गांव दुखी था ।
मैंने पूछा क्या problem है ?
बताया गया कि भाई पहले फ़ौज में था ।
जिस दिन भर्ती हुआ उसी दिन से दुःखी है । फ़ौज की हर एक चीज़ से दिक्कत थी उसे । उठने बैठने खाने पीने सोने ,कपडे लत्ते दवा दारू ……. हर चीज़ से परेशानी थी । सच कहें तो उसका जी कभी फ़ौज में लगा ही नहीं । खैर ……. ट्रेनिंग सेंटर से जब पहली बार घर आया छुट्टी पे , तो उसका यूँ स्वागत हुआ मानो कोई जंग जीत के लौटा हो । पूरा घर सर आँखों पे बिठाये रखता ……. जहां जाता पूरा गांव इज़्ज़त से बुलाता …… आजा फौजी भाई …… लोग सम्मान से बुलाते बैठाते । घर में माँ दाल में एक्सट्रा घी गेर के रोटी खिलाती । फौजी भाई को लगा असली ज़िन्दगी तो ये है ।
फिर जब वापस ड्यूटी पे जाने की बेला आयी तो उसकी जान हलक में आ गयी ।
ड्यूटी पे जा के राजी न था । घर वालों ने समझा बुझा के धक्का दे के भेजा । कुछ दिन में भाग आया । रेजिमेंट से 4 सिपाही आये , पकड़ के गाडी में ऐसे लादा जैसे मुन्सिपाल्टी की dog van लादती है । वहाँ पट्ठे को 28 दिन का पिट्ठू और quarter guard ……. एक अफसर घर आया माँ बाप को समझाने कि अपने लौंडे को समझाओ कि अब वो फ़ौज में है …… इस तरह से भगोड़ा होना उचित नहीं । इस बार तो CO साहब ने बच्चा समझ के छोड़ दिया है पर आगे मुश्किल होगी ।
पर फौजी भाई कहाँ सुधरने वाला था । हमारे यहां गाँव गिरांव में एकाध गोरु चउआ ऐसा होता है जो हमेशा छुड़ाने और खूंटा उपारने की फिराक में रहता है । ऐसे ही गोरु को नाथ दिया जाता है ।
बहरहाल फौजी भाई का मन फ़ौज में नहीं लगना था न लगा । कुछ दिन बाद जब सादी बियाह हो गया तो करेला नीम चढ़ गया । नयी नवेली बीवी को छोड़ कौन जाना चाहता है ड्यूटी पे ?
फौजी रेजिमेंट में जाता तो हमेशा भागने की फिराक में रहता । घर आता तो इधर बीबी समझाती उधर माँ बाप , चचा ताऊ ……
लोग पूछते अबे दिक्कत क्या है तेरे को …… दाल में छौंक नहीं , रोटी झाड़ के खानी पड़ती है …….
उसको indian Army से सबसे बड़ी प्रॉब्लम ये थी कि फौजी जूता बहुत भारी होता है और साले गर्मियों में भी गर्म जुराब पहनाते हैं ।
अंततः इस कथा का अंत यूँ हुआ की फौजी भाई जैसे तैसे कैसे भी डिस्चार्ज ले के घर आ गया ।
कुछ दिन तो भोत अच्छा लगा ।
फौजी फ़ौज से जब छुट्टी आता है तो कुछ दिन बहुत सेवा होती है पर जल्दी ही चाव उतर जाता है ।
उनका भी उतर गया । जो गाँव घर माँ बाप और बीबी कल तक बहुत अच्छे लगते थे वो अब काटने को दौड़ते थे । जो माँ कल तक घी गेर के दाल खिलाती थी अब सूखी रोटी गंठे और सीत (प्याज और लस्सी ) के साथ थमा देती थी । बेरोजगारी बुरी बला है । कुछ दिन में फौजी भाई एक एक पैसे को मोहताज हो गया । अब इस नाक से मक्खी जाती थी और दूसरी से आती थी ।
दो तीन साल फौजी भाई की बहुत दुर्दशा हुई ।
1988 के आसपास घर वालों ने उसे 5 लाख रु दे के हरियाणा पुलिस में भर्ती कराया ।
फौजी भाई आज भी HP में है । है तो वहाँ भी असंतुष्ट ही पर मजबूरी में किसी तरह दिन काट रहा है । वो तमाम दिक्कतें जो उसे फ़ौज से थीं हरियाणा पुलिस से भी हैं पर एक बार चूँकि दूध से जल चुका है इसलिए फूंक फूंक के पी रहा है ।
फ़ौज की हर पलटन में ऐसे दो चार होते हैं और इनसे कैसे निपटना है फ़ौज खूब जानती है ।
BSF तेज बहादुर के court martial 2010 में ही करने जा रही थी पर उसके बीबी बच्चों पे तरस खा के सिर्फ 89 days की Rigourous Punishment दे के छोड़ दिया था और उसके परिवार बीबी बच्चों पे तरस खा उनके भविष्य की चिंता करते हुए उसे तब तक बर्दाश्त किया जब तक की उसकी नौकरी pension पाने लायक न हो गयी । फ़ौज की और अपने सीनियर अफसरों की भलमनसत का क्या सिला दिया है तेज बहादुर और उसकी बीबी ने ।
आज के बाद शायद फ़ौज इतनी tolerant न रहे , और जिन लड़कों को फ़ौज में शुरूआती तालमेल बैठाने में दिक्कत आती है उन्हें पहली ही गलती पे निकाल बाहर करे ।
तेज बहादुर ने बेशक एक महत्वपूर्ण विषय की ओर ध्यान दिलाया है पर एक बहुत गंभीर अनुशासन हीनता की शुरुआत भी कर दी है ।

समाजवादी पाल्टी तो डूबी ही डूबी ।

समाजवादी पाल्टी अपने अस्तित्व की लडाई लड़ रही है ।
करो या मरो …….. चुनाव सिर पे है ।
खबर है कि 1500 करोड़ से ऊपर की चुनाव सामग्री छप के तैयार है । इसमें पार्टी के झंडे banor पोस्टर Tshirt बनियान बिल्ले स्टिकर्स flex boards और hoardings और न जाने क्या क्या है ।
UP जैसे विशाल प्रदेश में , जहां 20 करोड़ की जनसंख्या और 11 करोड़ से ज़्यादा भोटर है ……. जहां 400 से ज़्यादा सीट पे प्रत्याशी उतारे जाने हैं ……. वहाँ पार्टी के दो फाड़ होने का ख़तरा है ।
ऊपर से नेताओं को यही नहीं पता कि उन्हें किस चुनाव चिन्ह पे चुनाव लड़ना है । समस्या ये है की भारी मात्रा में जो चुनाव प्रचार सामग्री छप के तैयार है वो सब साइकिल चुनाव चिन्ह से छपी है । अब इस साइकिल पे ही ख़तरा मंडरा रहा है ।
कल को अगर चुनाव आयोग ने ये साइकिल ही फ्रीज़ कर दी तो दोनों गुटों अर्थात अखिलेश और मुलायम सिपाल दोनों को नए सिंबल पे चुनाव लड़ना पडेगा । नयी प्रचार सामग्री कोई रातों रात तो छप नहीं जायेगी ।
जैसे पति पत्नी बच्चों की वजह से तलाक़ नहीं ले पाते और मजबूरन साथ रहते हैं उसी तरह साइकिल के मोह में मुलायम अकलेस अलग नहीं हो पा रहे । इसके अलावा इक्लेस जादो ने समाजवादी पाल्टी के दोनों बैंक खाते भी seize करा दिए …… मने कंगाली में आटा गीला ।

पकिस्तान भारत के बीच शान्ति रहे इसमें एक बड़ी समस्या ये आती है कि पाकिस्तान में पाक सरकार के अलावा कई Non State actors हैं । Army है , ISI है , उसके बाद विभिन्न जिहादी गुट हैं । आखिर भारत सरकार पाकिस्तान में शान्ति वार्ता करे तो किस से ?
यही हाल समाजवादी पाल्टी का है । अखिलेश मुलायम का बस चले तो दो मिनट में झगड़ा सुलटा लें ।
पर उधर रामगोपाल और इधर सिपाल जादो और अमर सींग …… ये तीन शान्ति और समझौता वार्ता में रोड़ा बने बैठे हैं । इक्लेस जादो और मुलायम जादो को अगर शान्ति स्थापना करनी है तो इन दोनों को रामगोपाल , सिपाल और अमर सींग इन तीनो को GPL मार के पार्टी से 60 साल के लिए निष्कासित कर देना चाहिए । इसके अलावा पार्टी में जितने भाई भतीजे भांजे बहू बेटियां बहन भेनजी भांजी भतीजी बुआ मौसी नानी समधी साले सालियाँ साढ़ू सरहज हैं उन सबकी G पे भी लात मार के party से बाहर कर देना चाहिए । इसके अलावा परतीक गुप्ता जादो और उसकी बीबी अपरना गुप्ता जादो को भी घर और पाल्टी दोनों से G पे लात मार के भगा देना चाहिए । भैंचो पोलिटिकल पाल्टी है कि तबेला ???????

पर काश …… GPL मार के भगा देना इतना ही आसान रहा होता ………. अमर सिंघवा एक नंबर का दलाल नहीं दल्ला है । न जाने किस किस के संग किस किस की रिकॉडिंग रखा होगा …….. और न जाने किस किस मुद्रा में रखा होगा ……. कम्बकब्त सोसल मीडिया का ज़माना है । एक घंटे में 45 लाख शेयर और views हो जाते हैं वीडियो clip के ।
अमर सिंह से पार पाना मुलायम इक्लेस जादो के बस का नहीं ।

समाजवादी पाल्टी का किस्सा खत्म समझ लो ।
बिना सिंबल , बिना प्रचार सामग्री , बिना funds , बिना नेता , हर सीट पे बागी उम्मीदवार , free for all gang bang ……. कब कौन किसकी कहाँ कैसे मार ले क्या पता ?ऊपर से भाजपा और मोदी जैसा सशक्त प्रतिद्वंद्वी ।

समाजवादी पाल्टी तो डूबी ही डूबी ।

भारत रत्न मरहूम उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ की मुफलिसी का सच ।

भारत रत्न मरहूम उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ की मुफलिसी का सच ।

आज से कुछ साल पहले जब कि उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ साहेब जीवित थे , और न सिर्फ जीवित थे बल्कि पूरी तरह fit थे , सक्रिय थे , एक दिन ये खबर आयी कि उस्ताद जी बेहद मुफलिसी में जी रहे हैं । रोटी के लाले पड़े हुए हैं । देश चिंता में डूब गया । कई जगह से इमदाद आने की खबरें आई । भारत सरकार भी सक्रिय हुई । भारत रत्न मुफलिसी में जी रहा ? आनन् फानन में संसद में उनके शहनाई वादन का कार्यक्रम रखा गया । बाकायदे 5 लाख का मेहनताना दिया गया ।
ये सब देख सुन मेरा माथा ठनका ।
मेरे कू बात समझ में न आयी ।
बिस्मिल्लाह खान जैसा super star मुफलिसी में जी रहा ? बात गले उतरती न थी ।
मैं उन दिनों जालंधर की हरिवल्लभ महासभा से जुड़ा हुआ था । ये महासभा हर साल शास्त्रीय संगीत की एक बहुत बड़ी conference बोले तो संगीत सम्मलेन कराती है जो लगभग 140 साल पुराना है ।
पलुस्कर भीमसेन जोशी रविशंकर लगायित कोई ऐसा गवैया न हुआ जो यहाँ न आया हो …….
मैं पहुंचा कपूर साब के पास जो महासभा के secretary हैं ।
मैंने पूछा गुरु क्या मामिला है ? की खाँ साहेब काहें मुफलिसी को प्राप्त हो गए जबकि यहां तो अदना सा नया लौंडा भी जो कि अभी classical संगीत में उभर रहा है वो भी एक performance के 30 हज़ार माँगता है और खाँ साब जैसे सीनियर तो 5 लाख के नीचे बात तक ना करते ……. आज जो सीनियर कलाकार है वो प्रति concert 5 लाख लेते हैं और एक महीने में 10 से 15 दिन बुक रहते हैं ……. तो इनको क्या पिराब्लम हो गिया ?
कपूर साब हल्का सा मुस्किया दिए ।
बोले , लो किस्सा सुनो ।
आज से कोई 10 साल पहले हमने एक बार खाँ साब को बुला लिया हरिबल्लभ में ।
एक लाख में तय था । सुबह पंजाब मेल से आना था । एक गाडी भेज दी स्टेशन पे ।
वहाँ से ड्राइवर का फून आया । sir एक गाडी से काम न चलेगा । पूरी bus भेजो ।
अबे कित्ते आदमी हैं ? हम ये मान के चल रहे थे कि साजिंदे मिला के 4 – 5 आदमी होंगे ।
ड्राइवर बोला अजी बीसियों हैं सब केना मेना चूंची बच्चा मिला के …….
अपना माथा ठनका । होटल में दो कमरे बुक थे । तीन और खुलवाये । एक एक कमरे में 5 – 5 जा घुसे । उस्ताद ने शहनाई जो बजायी , लोग अश अश कर उठे । भाव विभोर …… उस्ताद की उँगलियों में जादू था । तीन दिन जमे तहे उस्ताद सम्मलेन में पूरी फ़ौज के साथ । गाजे बाजे के साथ बिदा हुए ।
होटल का बिल आया तो माथा ठनका । तीन दिन का बिल यही कोई सवा लाख रु ……. क्या कहा ?
सवा लाख ? अबे दिमाग खराब है ?
अजी 25 आदमी थे । मुर्गे के अलावा कुछ नहीं खाते थे । जाते जाते 35 मुर्गे तो रास्ते के लिए pack करा के ले गए । उस दिन महासभा ने कान पकडे । फिर कभी नहीं बुलाया ।
मैंने पूछा 25 आदमी थे कौन जो उनके साथ पधारे थे । अजी उस्ताद जी के अपने एक दर्जन और उन एक दर्जन के आगे एक एक दर्जन ………
पर गुरु आज जितने ये star performers हैं इन सबने अपने अपने बच्चे जीते जी stage पे set कर दिए ……. उस्ताद जी के लौंडों का क्या हाल है ?
अजी सब एक से बढ़ के एक निकम्मे । किसी को शहनाई पे हाथ तक रखना नहीं आता ।
दारू और भांग गांजे से फ़ुरसत होंय तो शहनाई पे हाथ धरे ।
शास्त्रीय संगीत है भैया । 20 – 20 साल तक लोग 10 – 15 घंटे रोज़ाना रियाज़ करते हैं तो कुछ लायक होते हैं । उसमें भी stardom बुढौती में मिलता है । पंडित जसराज को 55 साल हो गए stage पे परफॉर्म करते ।
और इस तरह उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ साहेब अपने दर्जन भर से ज़्यादा आवारा लौंडों और उनके आगे 10 दर्जन नाती पोतों का पेट भरने में अपनी सारी कमाई खर्च करते एक दिन उसी मुफलिसी में अल्लाह को प्यारे हो गए ।
उनके सबसे बड़े बेटे को मैंने सबसे पहली बार देखा 2014 में जब की भाजपा ने उनको बनारस में मोदी जी के पर्चा दाखिले में प्रस्तावक बनने के लिए आमंत्रित किया जिसे उन्होंने एक बार स्वीकार कर फिर मुस्लिम समाज के दबाव में ठुकरा दिया ।

फिर पिछले साल खबर आयी कि मरहूम उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ साहेब भारत रत्न की डुमरांव स्थित पुस्तैनी हवेली और जमीन पे कुछ बिहारी गुंडों बाहुबलियों ने कब्जा कर लिया ।
मचा जो बमचक ।
जांच हुई तो पता चला कि उस्ताद के सबसे बड़े बेटे ने खुद ही चोरी छिपे पूरे परिवार को अँधेरे में रख वो जमीन बेच खायी थी ।

फिर पिछले दिनों खबर आयी कि उस्ताद जी की चांदी जड़ी 4 शहनाइयां उनके पैतृक निवास से चोरी हो गयी । बनारस में फिर मचा बमचक ।
तब मेरे मुह से यूँ ही निकला …… अबे कौन चुराएगा ।
खुद बेच खायी होंगी सालों ने ।
आज खबर आयी कि STF ने बनारस में मरहूम उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ साहब भारत रत्न के पोते जनाब नज़र ए आलम साहब सुपुत्र जनाब काज़िम खाँ साहिब को दो jewellers के साथ गिरफ्तार कर चारो शहनाइयां बरामद कर लीं ।

काश उस्ताद जी ने किसी साक्षी महाराज type संघी की सलाह मान ली होती और 14 की जगह सिर्फ एक या दो पैदा किये होते तो ये नौबत न आती ।

BSF जवान के भूखे मरने वाले वीडियो का सच क्या है ?

सोशल मीडिया पे इन दिनों BSF के एक जवान का वीडियो viral हुआ जाता है ।
बेचारा जवान भूखा मर रिया है ।
वो बेचारा सारा दिन बर्फ में खड़ा duty देता है और पीछे से उसका घी Commandant साहब खा जाते हैं ।
मैंने कल वो वीडियो देखा तो मेरा तो खून खौल उठा ।
देस की तो आज़ादी खतरे में है भाई ।
गाली महोत्सव तो बनता है । पर इसके लिए गाली पर्रीकर को नहीं राजनाथ सिंह को दो ।
BSF एवं अन्य para military forces MHA बोले तो ministry of Home affairs के अंतर्गत आते हैं ।

अब मेरी चूँकि भारत सरकार में एकदम ऊपर तक बात है सो मैंने तुरंत फून लगाया ……. बात कराओ साले से …….. क्यूँ बे मलेच्छ …… BSF का राशन खा गया बे साले चोर ? भुक्खड़ ?

By god की कसम ……. खाजनाथ वहीं धोती में मूत दिए ……. बोले गुस्सा थूक दीजिये मालिक …….. राशन supply फ़ौज में होती है मालिक । वहाँ ये सब चोरी चकारी चलती है ।
बाकी para military forces में हम लोग Ration Money देते हैं हुज़ूर …….. वो ration money सिपाही की पगार के साथ उसको दे दी जाती है ।
अब उस पैसे को वो कैसे खर्च करते हैं ये उनकी regiment या battalion जाने ।
उनका commandant जाने ।
हमने तुरंत commandant को फून लगाया …….. क्यों बे साले चोरकट ……. चिन्दी चोर …… साले तनख्वाह में पेट नहीं भरता बे ? साले जवानों का राशन खा जाता है ?
अब जब उसको पता चला कि सोसल मीडिया मने फेसबुक के इतने बड्डे मठाधीस का फून आया है …… माँ कसम थर थर कांपने लगा commandant …….. बोला सर गलती हो गयी जी ……. पर मेरी बात तो सुन ल्यो हुजूर ………
Sir जी , system नयूं है जी कि BSF या किसी भी para military force में Ration की supply नहीं होती । मैं यानि कि commandant महीने में एक बार पूरी battalion की एक open meeting लेता हूँ जिसे दरबार कहा जाता है । उस दरबार में एक mess committee बनायी जाती है ।
इसमें एक Inspector , एक sub inspector , एक HC बोले तो head कांस्टेबल और 6 सिपाही रहते हैं । हर महीने नयी कमेटी बनती है । कमेटी का चयन मैं नहीं बल्कि battalion के जवान खुद मनोनीत करते हैं ।
फिर वो कमेटी जिसमे इंस्पेक्टर से ले के कांस्टेबल तक सब होते है बाज़ार से खुद जा के local purchase करते हैं Ration की ……. आटा , चावल, दालें ,तेल ,मसाला , दूध , घी , मक्खन, bread ,अंडे ,पनीर , Meat सब कुछ local market से खरीदा जाता है । LPG भी ……. batallion में cook होते हैं । ज़रूरत पड़ने पे local helper भी वेतन पे रख लिया जाता है ।
क्या खाना है कैसे खाना है देसी घी में दाल छौंकनी है या काजू बादाम खाने हैं इसका निर्णय सब वही कमेटी लेती है …….. सबकी मने खाने वालों की सलाह या demand के अनुसार ।
Commandant बीच बीच में देखता ताकता रहता है । कोशिश यही रहती है कि हर जवान का mess bill कम से कम इतना ज़रूर आये जितनी उसकी ration money है । मने बेशक उसकी जेब से 100 -200 लग जाए पर वो ration money में से पैसा बचाने न लगे ……..

आज सुबह मैंने कुछ मित्रों जानकारों से फोन पे बात की । ऐसे लोगों से जो BSF , CRPF या CISF में हैं । एक मित्र ने बताया कि उनकी battalion जम्मू के पास posted है ।
हमारा सारा राशन अखनूर रोड स्थित wallmart से आता है ।
सारा सामान A ग्रेड उच्च quality …….. खुद हमारे अपने cook बनाते हैं । हम लोग खुद हिसाब किताब रखते हैं । मेरी regiment में mess कमेटी हर महीने बदलती है ।
Commandant साहब खुद हमसे पूछते हैं कि किसको रखना चाहते हो कमेटी में ………
एक HC हमारा फेवरिट है । हमने जब उसी को continue करने की बात कही तो साहब नहीं माने क्योंकि हर महीने आदमी बदलने का rule है । अगले महीने जब फिर दरबार सजा तो जवानों ने फिर उसी HC की मांग की ……. साहब ने पूछा , आखिर इसकी इतनी demand क्यों है। जवानों ने बताया कि इसके management में सबसे बढ़िया खाना बनता है । हर के साहब ने उसे फिर मनोनीत कर दिया ।

अब जब ऐसी व्यवस्था है तो फिर ये जवान सोशल मीडिया में ऐसी बात क्यों कह रहा है ये जांच का विषय है ।
मैंने ये पोस्ट जो लिखी है वो विभिन्न forces के अलग अलग लोगों से बात करके लिखी है ।
यदि इसके तथ्य गलत हैं तो लोग स्वयं बताएँगे ।

सत्य सामने आना ही चाहिए ।