17 में UP में जल प्रलय होगी

मुझे 2014 के लोकसभा चुनावों की वो शाम अब भी याद है ।
देश के मूर्धन्य पत्रकारों का ABP news के स्टूडियो में जमावड़ा था । वो पत्रकार जिनका “धंदा ” ही पत्रकारिता है …… वो जो कि पेशेवर पत्रकार हैं …… वो जिनके घरों के चूल्हे पत्रकारिता से जलते हैं ……. वो जो ये दावे करते हैं कि वो चुनाव के दौरान देश भर में घूमे ……..वो मूर्धन्य पत्रकार उस दिन उस स्टूडियो में जमा थे । अगली सुबह काउंटिंग होने वाली थी ……. किशोर अजवाणी प्रोग्राम कर रहे थे । डेढ़ दो घंटे के तमाशे के बाद अंतिम टिप्पणी के रूप में किशोर ने सभी मूर्धन्य पत्रकारों से सवाल पूछा । कितनी सीटें ?
किसी भी पत्रकार ने भाजपा या NDA को पूर्ण बहुमत न दिया । सब भाजपा को 180 से 200 के बीच सीटें दे रहे थे । NDA को 220 के आसपास ……. एक गंजे ने तो भाजपा को सिर्फ 160 से 180 सीटें ही दीं । ये वो पत्रकार थे जिन्होंने जीवन भर चुनाव ही कवर किये हैं । जो देश की नब्ज पहचानने का दावा करते हैं ।
उधर हम लोग जो सिर्फ अपनी सहज बुद्धि से गाँव गिरांव में थोड़ा बहुत घूम फिर के आकलन कर रहे थे …… हम लोग भाजपा को अकेले ही पूर्ण बहुमत दे रहे थे । मुझे याद है , पंजाब में जमीनी हकीकत और हवा का रुख देख मैंने AAP को 3 से 5 सीट दी थी । UP में गाजीपुर के मतदान से कोई 15 दिन पहले मैंने लिखा था …….. लगता है कि हम गाजीपुर भी जीत रहे हैं ( गाजीपुर भाजपा के लिए सबसे कठिन सीट है UP में ) ……… और अगर हम गाजीपुर जीत गए तो मान लेना कि जल प्रलय होगी …… मने सब बह जाएगा …… कुछ नहीं बचेगा ……. मेरे एक मित्र जो गाजीपुर के ही हैं और हैदराबाद के एक हिंदी अखबार के सह सम्पादक हैं , उन्होंने पूछा कि क्या राम मंदिर से भी ज़्यादा हवा है ?मैंने जवाब दिया , हवा नहीं लहर नहीं सुनामी की बात कीजिये …….
हमको तो कोई लहर नहीं दीखती …….
पेशेवर पत्रकारों को लहर क्यों नहीं दिखी ? क्या वाकई वो हवा का रुख पहचान नहीं पाए ?
ऐसा नहीं है ……. वो खूब जानते थे कि मोदी की सुनामी सब बहा ले गयी ……. पर इसके बावजूद वो सत्य से मुह क्यों चुरा रहे थे । इसके अलावा वो ये झूठ बोल के अपनी साख पे बट्टा क्यों लगा रहे थे । जमीनी आकलन में इतनी बड़ी चूक कर ये पत्रकार अपनी राजनैतिक सूझबूझ और समझ पे सवाल खडा क्यों कर रहे थे ? साख , इज्ज़त , मान सम्मान की चिंता शरीफ लोग करते हैं …… वेश्या की क्या इज्ज़त क्या मान सम्मान ?
पर भैया , मुझे अपनी इज्ज़त बहुत प्यारी है । मैं तो यूँ भी हमेशा कुछ लोगों के राडार पे रहता हूँ ….. मेरी पोस्ट्स के स्क्रीन शॉट सम्हाल के रखे जाते है । लोग याद रखते हैं कि कब क्या कहा या लिखा । इसके अलावा हम MSM के लोग नहीं हैं जहां कोई जवाबदेही accountability नहीं है । हम तो उस medium में लिखते हैं जहां लोग एक मिनट में सवाल कर देते हैं , तथ्य सामने रख देते हैं …… प्रूफ देते हैं …… विडियो दिखा देते हैं …… झूठ का पर्दाफ़ाश कर देते हैं और पोस्ट हटाने और माफ़ी मांगने को मजबूर कर देते हैं । यहाँ shoot n skoot मने थूको और भाग जाओ नहीं चलता …… यहाँ जवाबदेही है . social media जीवंत मीडिया है । इसलिए मैं यहाँ जो भी लिखता हूँ वो पूरे होशोहवास में सोच समझ के लिखता हूँ …… ताकि सनद रहे ।

सो आज नोट बंदी के 38 दिन बाद मैं ये महसूस कर रहा हूँ कि इस बार UP में भाजपा 2014 से बेहतर प्रदर्शन करने जा रही है । मोदी जी की लोकप्रियता 2014 की तुलना में बढ़ी है । 14 में भाजपा को लगभग 42% वोट मिला था और आज से दो महीने पहले ये अनुमान था कि 17 के विस चुनाव में ये आंकडा 32% के आसपास रहेगा । पर POK में सर्जिकल स्ट्राइक और नोटबंदी के बाद ये बढ़ के 36 % तक जा सकता है । यादव कुनबे की पारिवारिक कलह और हाथी के खिसकते जनाधार और गड़बड़ाते जातीय समीकरण ने इन दोनों पार्टियों की स्थिति बेहद खराब कर दी है । हाथी ने जैसे 14 में अंडा दिया वैसे ही अगर 17 में भी अंडा ही दे दे तो मुझे आश्चर्य नहीं होगा ।
हालांकि अभी समय है और टिकट वितरण पूरा नहीं हुआ है फिर भी अभी जो हालात हैं उनमे ये तीनों पार्टियां 60 के नीचे रह जाए तो बड़ी बात नहीं होगी ।
अब UP में भाजपा को रोकने का सिर्फ एक तरीका है ……. बिहार की तरह यहाँ भी एक ठगबंधन बने और सपा बसपा कांग्रेस मिल के चुनाव लड़ें ।
अगर सिर्फ सपा cong का ही गठबंधन हुआ तो भी ये दोनों मिल के 22+6=28% से ऊपर नहीं जाते । सपा को 22 % इस शर्त पे कि अखिलेश गुट अपने चचा के गुट के प्रत्याशियों को हारने के लिए भितरघात न करें । वरना सपा का आंकडा 16 – 18 % पे भी रुक सकता है और इसका लाभ सीधे सीधे भाजपा को मिलेगा ।
रही बात मुस्लिम मतदाता और मुस्लिम ध्रुवीकरण की तो अधिकाँश मने 60% तक मुसलमान आज भी सपा के साथ ही है । ऐसे में जे बीम जे बीम भी कोई काम करता नहीं दीखता ।

17 में जल प्रलय होगी ………

क्या है Alom Bagora से सीखने लायक ?

Fb पे मैंने बांग्लादेशी कलाकार Alom Bagora पे पोस्ट लिखी तो उस से पहले Fb Alom का और उसके रंग रूप शक्लो सूरत हाव भाव का मज़ाक उडाती पोस्ट्स से भरा हुआ था ।

पर जब मेरी पोस्ट आई , एक अलग perspective से तो अचानक Fb पे माहौल बदल गया ।

मित्रों ने मज़ाक उड़ाने वाली पोस्ट्स धड़ा धड उतारनी शुरू कर दीं । आम तौर पे मेरी पोस्ट्स पे अधिकाधिक 1000 likes आते हैं पर उस पोस्ट पे 2500 से ज़्यादा likes और 375 shares हुए । मने उस पोस्ट ने लोगों को अन्दर तक छुआ ।

कुछ मित्रों ने बहस को आगे बढाया । कहने लगे कि हम उसके शक्लो सूरत और रंग रूप नहीं बल्कि उसकी खराब acting और उसकी विडियो फिल्मों की लचर प्रस्तुति की आलोचना कर रहे थे ।

सत्य इसके विपरीत है । सत्य यह है कि आलोचना उसके रंग रूप और शक्लो सूरत की हो रही थी । उसकी लिहाड़ी ली जा रही थी । उसकी खूबसूरत पत्नी के साथ उसकी फोटो डाल के लंगूर के मुह में अंगूर बताया जा रहा था । सवाल उठता है कि ऐसा क्या ख़ास है जिसके लिए अलोम बगोरा की प्रशंसा होनी चाहिए ?

ये सच है कि Alom प्रचलित मान्यता में कुरूप है । आप उसे कुरूप मानते हैं ।

कुरूप है इसलिए उसे Showbiz में आने का हक नहीं । आप सिर्फ खूबसूरत चेहरे देखना चाहते हैं । पर इस से Alom को कोई फर्क नहीं पड़ा । आप Alom के बारे में क्या सोचते है इस से कोई फर्क नहीं पड़ता । फर्क इस बात से पड़ता है कि Alom अपने खुद के बारे में क्या सोचता है ।

आपने उसे कुरूप बदसूरत माना ……. पर उसने खुद को कुरूप मानने से इनकार कर दिया । खुद की निगाह में वो बेहद स्मार्ट है और एक दिन फिल्म स्टार बनेगा ……. इसे कहते हैं Self Esteem …… Amol ने अपनी कमियों को नज़रंदाज़ कर अपनी खूबियों को पहचाना …… अपनी life के लिय3 Goal set किये ……. बड़े ऊंचे थे उसके goals ……. और फिर जी जान से जुट गया उन्हें Achieve करने में । न दिन देखा न रात ……..सिर्फ लक्ष्य पे निगाह । काक चेष्टा बको ध्यानम् …….

फर्क इस बात से नहीं पड़ता कि आप आज कहाँ खड़े हैं ……… फर्क इस बात से पड़ता है कि आपको जाना कहाँ है ……. और Amol को पता था कि उसे जाना कहाँ है ……. ये नहीं पता था कि कैसे जाना है …… कैसे जाना है ये इतना महत्वपूर्ण भी नहीं होता ……. how ? ये महत्वपूर्ण नहीं होता ….. why …… कहाँ जाना है और क्यों जाना है ये ज़्यादा महत्वपूर्ण है ……. अगर आपकी why मज़बूत है तो how खोजना तो बहुत आसान है । अगर Why कमज़ोर हुई तो How कभी नहीं मिलेगा ।

Amol की Why बेहद मज़बूत थी ……. इसलिए उसकी लक्ष्य प्राप्ति में बदसूरती आड़े नहीं आई ……. शिक्षा का अभाव आड़े नहीं आया ……. training का अभाव भी आड़े नहीं आया …… गरीबी आड़े नहीं आई …… संसाधनों का अभाव भी आड़े नहीं आया ……. अगर Dreams बड़े हों …… Why क्लियर हो ……. तो कुछ भी आड़े नहीं आता ……..

उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत ……. जागो उठो और लक्ष्य प्राप्ति तक आगे बढ़ते रहो …….

If Amol can succede why can’t you ……. शुक्र मनाइये कि आप Amol से तो ज़्यादा ही खूबसूरत हैं …… उठिए …… stardom आपका इंतज़ार कर रही है ।

Amol ने आपको रास्ता दिखा के आपका काम आसान नहीं कर दिया ?

सेना और राजनीति

वादा 1 : 10 का था… 1 : 40 का नहीं…

जब हेमराज का सिर काट कर ले गए थे तो मोदी ने कहा था, एक के बदले दस सिर लेकर आओ.

जब लोकसभा चुनाव में प्रचार होने लगा तो मोदी ने कहा था कि घर में घुस कर मारूंगा और एक के बदले 10 सिर लेकर आऊंगा.

पिछले दिनों पाकिस्तानी सेना और घुसपैठिये शहीद मंदीप सिंह का सिर काट कर ले गए. तब राजनाथ सिंह ने कहा था कि इसका बदला लिया जाएगा.

यूँ युद्ध विराम उल्लंघन तो होते ही रहते हैं सीमा पर. छोटे हथियारों और बंदूकों से फायरिंग चलती ही रहती है.
पर मंदीप के कटे सिर का बदला लेने के लिए भारतीय सेना ने पहली बार Artillery Guns मने तोपों से हमला किया.

बताया जा रहा है कि 13 साल बाद भारतीय तोपें गरजी हैं. Artillery fire का मतलब होता है अर्जुन जैसे टैंकों और बोफोर्स जैसी तोपों से फायर….

इस फायरिंग में पकिस्तान की 4 चौकियां ध्वस्त कर दी गयी और 40 से ज़्यादा पाकिस्तानी सैनिकों के मारे जाने की खबर है. इसके अलावा घायलों की तो गिनती ही नहीं.

ये एक अकेले मंदीप के सिर का बदला है, जो मोदी ने लिया.

आर्मी चढ़ के मार रही है, घुस के मार रही है.

यही समस्या है.

विपक्ष को यही प्रॉब्लम है. उसको लगता है कि अब तो भाजपा के पक्ष में भारतीय सेना भी चुनाव प्रचार के लिए कूद पड़ी है.

जी हां…. फ़ौज अगर पाकिस्तान को मारती है, तो छाती मोदी की चौड़ी होती है.

ऊपर से शिवराज सिंह चौहान और मध्यप्रदेश पुलिस ने राहुल गांधी के कोढ़ में खाज कर दी.

मोदी पाकिस्तानियों को मार रहे, इधर मामा शिवराज ने सिमी का नंबर लगा दिया.

सिमी वालों की गुंडागर्दी से भोपाल जेल की पुलिस आज़िज़ आ चुकी थी.

सिमी आतंकियों ने जब जेल में गार्ड रमाशंकर की हत्या कर दी तभी मामा शिवराज ने कह दिया…. बस…. बहुत हुआ…. अब और नहीं.

ये 8 ज़्यादा गुंडागर्दी करते थे… चुन चुन के मारा… अब चिल्लाते रहो और कराते रहो जांच.

संदेश साफ़ स्पष्ट है.

ऐसे ही मारेंगे.

सीमा पार भी मारेंगे… घर में घुस के मारेंगे…

ज़रूरत पड़ी तो टैंक और तोप से मारेंगे, जेल से निकाल के मारेंगे, पहाड़ी पर चढ़ा कर मारेंगे, घेर के मारेंगे, ऐसे मारेंगे जैसे गाँव में पागल कुत्ता मारा जाता है.

समस्या ये है कि जनता तक ये संदेश साफ़ स्पष्ट पहुँच भी रहा है.

मोदी को वोट लेना आता है. सेक्यूलर(?) विपक्ष को यही खटक रहा है. मोदी तो सेना और एसटीएफ और एटीएस से भी चुनाव प्रचार कराये ले रहे हैं.

ये ओआरओपी का बवेला इसी लिए खड़ा किया जा रहा है. साज़िश ये है कि किसी तरह पूर्व सैनिकों को सरकार के खिलाफ खड़ा किया जा सके.

सरकार

 

बात 1998 की है। लोकसभा चुनावों में बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी और राजग सबसे बड़ा गठबंधन बन कर उभरा था। अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री नियुक्त किये गये थे। संसद में विश्वास प्रस्ताव पर बहस चल रही थी। कांग्रेस और सीपीएम ने मिल कर सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था। दोनों पार्टियों के नेता साथ-साथ बैठे थे और भाजपा-एनडीए के ऊपर तीखे हमले कर रहे थे। जब कांग्रेस का कोई नेता बोलता तो सीपीएम के नेता मेज थपथपा कर उसका समर्थन करते और जब सीपीएम का कोई नेता बोलता तो कांग्रेस के नेता मेज थपथपा कर उसका समर्थन करते। एनडीए का कोई वक्ता जब कांग्रेस को निशाने पर ले के बाण छोड़ता, तो उस बाण से कांग्रेस को बचाने के लिए सीपीएम के सांसद ढाल ले कर सामने आ जाते। अटल बिहारी की सांप्रदायिक सरकार को रोकने के लिए सेक्युलर ताकतें एकजुट हो गईं थीं।

सरकार की तरफ से धुरंधर नेता जॉर्ज फ़र्नान्डीस ने मोर्चा संभाला। उन्होंने कहा, “अध्यक्ष महोदय! मैं आपको बताना चाहता हूँ कि कांग्रेस पार्टी के बारे में इस देश के एक बहुत ही महत्वपूर्ण संगठन के क्या विचार हैं।” और जॉर्ज ने एक पतली सी पुस्तिका से पढना शुरू किया:
“Congress party is the fountainhead of corruption…(कांग्रेस सांसदों द्वारा शोर)…The British left and the Congress party replaced them. Over the past 50 years, Congress has established ever new records in corruption. (कांग्रेस सांसदों द्वारा पुनः शोर) Congress ministers have often been found embroiled in several scams, including Mundra scam, Churhat Lottery scam, Bofors scam, Sukhram scam, Harshad Mehta scam, JMM Bribery scam and Hawala, that took place during its regime. Congress has corrupted and misused every institution of the Indian democracy.”

कांग्रेस और कम्युनिस्ट सांसद उत्तेजित हो जाते हैं और लोकसभा अध्यक्ष से मांग करते हैं, “Speaker sir! Please ask the honourable member to name the source We can’t allow him to read from any unnamed document. Please restrain him.”

जॉर्ज फ़र्नान्डिस कहते हैं, “Please don’t get impatient. I’ll definitely name the source. But first let me complete what it says. It says, “The Congress party’s record on Secularism too has been chequered. At various times in history, Congressi goondas took active part in riots and killed people. 3000 Sikhs were butchered by them on streets of Delhi and prime minister Rajiv Gandhi watched it silently.”

कांग्रेस और कम्युनिस्ट सांसदों द्वारा फिर से शोर।

जॉर्ज कहते हैं, “Just give me two minutes…and then I’ll reveal the source”

जॉर्ज पुस्तिका से पढ़ना जारी रखते हैं “Speaker sir, it says, “No country in history has ever progressed with bad governance and excessive corruption as partners. None! The Congress suffers from this twin ailment since decades. Its survival is detrimental to the progress of India. Therefore, in the interest this nation, it’s important that Congress party is wiped out from this land for ever.”

कांग्रेस और कम्युनिस्ट सांसदों द्वारा ज़बरदस्त शोर। “Speaker sir! It cannot go on like this. We will not allow him to speak any further if he doesn’t give the source he is quoting from.”
“Ok, Ok” जॉर्ज कहते हैं, “There is more to read. But since our friends from Congress and CPM are so desperate to know the source, let me tell you what I am reading from…
…I’m reading from the Manifesto of CPI(M) issued just before these Lok Sabha elections.”

सदन में सन्नाटा… कांग्रेस और सीपीएम के सांसद बगलें झाँकने लगते हैं..
जॉर्ज गरजे, “क्यों, साँप सूंघ गया? बोलती बंद हो गई? बड़ा बोल रहे थे, we want to know the source, we want to know the source. सोर्स का नाम सुनते ही लकवा मार गया?…खुद पर शर्म आ रही है? आनी भी चाहिए…My friends from the Left! Either you don’t read your own manifesto or you don’t mean a word of it. In either case, you should be ashamed of yourselves. In the name of secularism, you have joined hands with Congress that has broken all records in corruption. I urge you to introspect to determine your future course of action. And if you do not mend your ways, your party will become history, sooner rather than later.”

सत्य प्रकाश सिंह जी की कलम से….
Alok Bhardwaj ji की wall से

नोट बंदी

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बात तब की है जब अभी मोदी जी की नोट बंदी बस हुई ही थी ।
उस दिन मैं अदिति गुप्ता नामक लौंडे का गुदा भंजन कर अलीगढ से वापस दिल्ली लौट रहा था । अलीगढ से मैंने UP roadways की AC बस पकड़ी ।
कंडक्टर ने टिकट बनाने शुरू किये ।
मेरे पास आया तो मैंने उसे 1000 का नोट थमाया ।
उसने कहा ये नहीं चलेगा ।
क्यों नहीं चलेगा भाई ?
1000 और 500 के नोट सरकार ने बंद कर दिए ।
अरे वो तो मुझे भी पता है कि 1000 – 500 के नोट बंद कर दिए पर ये भी तो कहा है कि रेल , बस , metro में चलेंगे अभी कुछ दिन ……..
नहीं , ये नहीं चलेगा ……. हमारे Depot Manager ने मना किया है ।

भाई ……. ये देश तेरे depot manager के कहने से चलेगा या प्रधान मंत्री मोदी के कहने से चलेगा ?

वो बोला ……. देश कैसे चलेगा ये तो पता नहीं पर ये बस तो depot manager के कहने से ही चलेगी ।

तो फिर हमारे पास तो पईसे ना हैं भाई ……. हम ना लेते टिकट …….. ईब तो हम बिना टिकट ही जावेंगे दिल्ली तक …….. अपने depot मेनेजर को बता दे कि यू पहलवान ना लेता टिकट ……
ना लेता टिकट तो उतर जा ……..

अबे चल न …. न टिकट लूंगा न उतरूंगा ………..

पहलवान जी आप तो जबरदस्ती कर रहे हो ……..

अबे जबरदस्ती मैं कर रिया हूँ कि तू …….. देश का वित्त मंत्री तू और तेरा मेनेजर हो गया ????????

अच्छा लाओ ……. वही दो हज़ार का ……..
नहीं ……. वो नहीं चलेगा अब …….. मोदी ने बंद कर दिया …….

अरे दे दो न …….

नहीं भाई …….. कैसे दे दूं ? वो नोट चलेगा ही नहीं …….. तेरे मेनेजर ने मने करी है 1000 का नोट लेण ते ………

दे दो न भाई साहब ……. आप तो दुखी कर रहे हो …….. प्लीज़ …….. कंडक्टर अब घिघियाने गिडगिडाने की मुद्रा में आ गया था ।

मैंने उस से कहा ……. क्यों ? आ गया न लाइन पे ?

कल एक मित्र ने एक पोस्ट पे comment किया कि उनके बच्चे की फीस स्कूल वाले चेक से नहीं ले रहे ………

क्या कहा ? चेक नहीं ले रहे ?
इनती माँ ती तूत ……. कैसे नहीं लेंगे चेक …….. अबे इनका तो मरा हुआ बाप भी लेगा ……… फ़ैल जाओ स्कूल में …….. बोल दो चेक लेते हो तो लो नहीं तो मैं चला …….. और फिर ले लेना फीस ……. साले 12वीं तक यही पढ़ाऊँगा लौंडे को और झांट एक पैसा फीस नहीं दूंगा …… और खबर दार जो लौंडे से एक बार भी फीस का तगादा कर दिया तो ……..
भैया …… गान्ही बाबा मरे तो हमको बहुत बड़ा हथियार दे गए …….
सत्याग्रह ……… मने सत्य का आग्रह …….
सत्य में बहुत बड़ी ताक़त होती है ।
अगर आप सच्चे हैं तो तुरंत फ़ैल जाओ …….. पूरा रायता फैला दो ……. सामने वाले के लिए समेटना मुश्किल हो जाता है ……..

हर उस प्रतिष्ठान में , जहां आप अक्सर जाते हैं ……. या आप जिसके permanent ग्राहक हैं ……. उसको ultimatum दे दीजिये …….. भैया App से पैसे लेना शुरू कर दे नहीं तो हम ना देने के cash ……. और जबरदस्ती चाय पियेंगे …… पैसे झांट नहीं देंगे ……. खाते में लिख ले …… जब cash होगा दे देंगे …….

सामने वाले को मजबूर कर दो कि वो नगद लेन देन बंद कर E Banking से काम करे ।

बाबा और क्रांति

अपना तो एक नियम है.

ठंडा करके खाओ. गर्म गर्म खाने में मुंह जल जाता है.

किसी भी घटना पर लिखने से पहले कम से कम 48 घंटे का cooling period दें.

मैं बाबा राम देव प्रकरण पर लिखने से पहले 48 घंटे इंतज़ार करना चाहता था.

इस बीच मित्र अश्विनी कुमार वर्मा ने ठीक वहीं बातें लिख दीं जो मैं समझ रहा था.

पढ़िए क्या लिखते हैं वे –

एक व्यापारी कभी संत नहीं हो सकता, क्योंकि संतों का धर्म लाभ-हानि की चिंता किए बगैर सत्य बोलना है.

लेकिन व्यापारी का धर्म अलग होता है. उसका धर्म ये है कि लाभ-हानि की चिंता करते हुए व्यवहार करे.

यदि वो ऐसा नहीं करता तो अर्थ खतरे में पड़ता है और जब अर्थ खतरे में पड़ता है तो धर्म भी खतरे में पड़ता है.

मैं पुनः अपनी पुरानी बात दोहरा रहा हूँ कि बाबा रामदेव एक साथ संत व व्यापारी दोनों बनना चाह रहे हैं और यही संकट का मुख्य कारण है.

कोई हैरानी नहीं यदि कल को उनका पतंजलि भी संकट में पड़ जाये. और इसी कारण आज मीडिया ने उन्हें अपने लपेटे में ले ही लिया.

बाबा रामदेव कोलकाता में मोदी जी की सराहना कर रहे थे लेकिन जब ममता, लालू पर प्रश्न पूछे गए तो उनकी भी तारीफ कर दी.

वो बोलने लगे कि वो सभी के साथ हैं. पतंजलि के विस्तार के लिए दिन-रात एक किए हुए व्यापारी से आप क्या उम्मीद करते हैं?

हम यही उम्मीद कर रहे थे न कि बाबा सच बोलें? कहाँ से बोलेंगे? बिहार और बंगाल में पतंजलि के विस्तार का क्या होगा? लेकिन बावजूद इसके हम उनसे उम्मीद लगा बैठते हैं.

और इसमें कमी किसी और की नहीं बल्कि बाबा रामदेव की ही है क्योंकि उन्होंने नाहक अपनी छवि संतों की बना रखी है, रह-रह के क्रांतिकारी हो जाते हैं, राजनैतिक टीका-टिप्पणी में समय गंवाते हैं.

मीडिया प्रश्नों का जाल फेंकता है और जवाब देने के चक्कर में वो फँस जाते हैं. इस बार भी मीडिया ने उन्हे फँसा दिया.

उन्होने एक व्यापारी धर्म निभाते हुए सभी नेताओं की तारीफ की लेकिन मीडिया ने अर्थ का अनर्थ कर डाला, लेकिन इसके जिम्मेदार बाबा रामदेव खुद हैं.

कल्पना कीजिये कि यदि मुकेश अंबानी से या रतन टाटा या किसी अन्य उद्योगपति से मीडिया ऐसे सवाल करता तो वो क्या जवाब देते?

वो यही बोलते कि वो राजनेता नहीं है, अतः ऐसे सवालों के जवाब नहीं देंगे, उनसे केवल बिज़नस से जुड़े सवाल ही पूछे जाएँ.

बाबा रामदेव ने ऐसा नहीं किया! बल्कि एक हाथ आगे जाकर वो राष्ट्रसंत की भाँति बयान देने लगे.

बाबा रामदेव ने राजीव दीक्षित जैसे संत के प्रवचन को अपने अर्थ के पुरुषार्थ से जिस प्रकार प्रचारित करवाया कि उन्होने एक आदर्श व धर्मनिष्ठ उद्यमी की भूमिका निभाई, (वैसे भी बिना अर्थ के धर्म का विस्तार नहीं होता, ऐसे हमारे शास्त्र कहते हैं), बदले में बाबा को स्वदेशी का सबसे बड़ा मार्केट उस संत के आशीर्वाद स्वरूप प्राप्त हुआ.

पहली बार बाबा रामदेव सुर्खियों में भी एक व्यापारी के रूप में ही आए थे, हमेशा उन्होने बिना लाग लपेट व्यापार के ही बारे में बात की, उच्च गुणवत्ता के स्वदेशी उत्पाद उपलब्ध कराए. लोगों को रोजगार भी मिला. देश को आत्मनिर्भरता भी. इसमें कोई बुराई नहीं थी. उन्हे व्यापार ही करना चाहिए.

बुराई ये है कि आप बार-बार संतों कि भूमिका में आकार वर्णसंकट पैदा कर डाल रहे हैं, फिर न इधर के, न उधर के. इधर भी कबाड़ा और उधर भी.

बेहतर होता कि बाबा रामदेव कैमरे से ओझल होके चुपचाप व्यापार करते, अखिलेश, मुलायम, लालू, माया, ममता सबकी तारीफ करें, व्यापार की तरक्की के लिए अच्छे संबंध बनाए लेकिन कैमरे के पीछे, जैसे बाकी के उद्योगपति करते हैं, वैसे ही.

कोई उद्योगपति फिजूल बयानबाजी नहीं करता. बाबा रामदेव के ऐसा करने से समर्थकों पर बुरा प्रभाव पड़ता है, भ्रम फैलता है, देश का भी नुकसान हो सकता है और साथ ही इससे किसी और को नहीं बल्कि स्वयं इनके पतंजलि को भी नुकसान पहुँच रहा है.

लेकिन पतंजलि के उत्पादों के बहिष्कार का कोई तुक नहीं है, क्योंकि बाबा रामदेव के नीयत में कोई खोट नहीं दिखाई पड़ता, केवल नीति में ही कमी जान पड़ती है.

फिर भी बॉयकॉट के स्लोगन तो अभी से आने शुरू हो गए हैं, शायद ये उन्हें जल्द ही अपनी नीति को सही करने में मदद करे.