बाबा और क्रांति

अपना तो एक नियम है.

ठंडा करके खाओ. गर्म गर्म खाने में मुंह जल जाता है.

किसी भी घटना पर लिखने से पहले कम से कम 48 घंटे का cooling period दें.

मैं बाबा राम देव प्रकरण पर लिखने से पहले 48 घंटे इंतज़ार करना चाहता था.

इस बीच मित्र अश्विनी कुमार वर्मा ने ठीक वहीं बातें लिख दीं जो मैं समझ रहा था.

पढ़िए क्या लिखते हैं वे –

एक व्यापारी कभी संत नहीं हो सकता, क्योंकि संतों का धर्म लाभ-हानि की चिंता किए बगैर सत्य बोलना है.

लेकिन व्यापारी का धर्म अलग होता है. उसका धर्म ये है कि लाभ-हानि की चिंता करते हुए व्यवहार करे.

यदि वो ऐसा नहीं करता तो अर्थ खतरे में पड़ता है और जब अर्थ खतरे में पड़ता है तो धर्म भी खतरे में पड़ता है.

मैं पुनः अपनी पुरानी बात दोहरा रहा हूँ कि बाबा रामदेव एक साथ संत व व्यापारी दोनों बनना चाह रहे हैं और यही संकट का मुख्य कारण है.

कोई हैरानी नहीं यदि कल को उनका पतंजलि भी संकट में पड़ जाये. और इसी कारण आज मीडिया ने उन्हें अपने लपेटे में ले ही लिया.

बाबा रामदेव कोलकाता में मोदी जी की सराहना कर रहे थे लेकिन जब ममता, लालू पर प्रश्न पूछे गए तो उनकी भी तारीफ कर दी.

वो बोलने लगे कि वो सभी के साथ हैं. पतंजलि के विस्तार के लिए दिन-रात एक किए हुए व्यापारी से आप क्या उम्मीद करते हैं?

हम यही उम्मीद कर रहे थे न कि बाबा सच बोलें? कहाँ से बोलेंगे? बिहार और बंगाल में पतंजलि के विस्तार का क्या होगा? लेकिन बावजूद इसके हम उनसे उम्मीद लगा बैठते हैं.

और इसमें कमी किसी और की नहीं बल्कि बाबा रामदेव की ही है क्योंकि उन्होंने नाहक अपनी छवि संतों की बना रखी है, रह-रह के क्रांतिकारी हो जाते हैं, राजनैतिक टीका-टिप्पणी में समय गंवाते हैं.

मीडिया प्रश्नों का जाल फेंकता है और जवाब देने के चक्कर में वो फँस जाते हैं. इस बार भी मीडिया ने उन्हे फँसा दिया.

उन्होने एक व्यापारी धर्म निभाते हुए सभी नेताओं की तारीफ की लेकिन मीडिया ने अर्थ का अनर्थ कर डाला, लेकिन इसके जिम्मेदार बाबा रामदेव खुद हैं.

कल्पना कीजिये कि यदि मुकेश अंबानी से या रतन टाटा या किसी अन्य उद्योगपति से मीडिया ऐसे सवाल करता तो वो क्या जवाब देते?

वो यही बोलते कि वो राजनेता नहीं है, अतः ऐसे सवालों के जवाब नहीं देंगे, उनसे केवल बिज़नस से जुड़े सवाल ही पूछे जाएँ.

बाबा रामदेव ने ऐसा नहीं किया! बल्कि एक हाथ आगे जाकर वो राष्ट्रसंत की भाँति बयान देने लगे.

बाबा रामदेव ने राजीव दीक्षित जैसे संत के प्रवचन को अपने अर्थ के पुरुषार्थ से जिस प्रकार प्रचारित करवाया कि उन्होने एक आदर्श व धर्मनिष्ठ उद्यमी की भूमिका निभाई, (वैसे भी बिना अर्थ के धर्म का विस्तार नहीं होता, ऐसे हमारे शास्त्र कहते हैं), बदले में बाबा को स्वदेशी का सबसे बड़ा मार्केट उस संत के आशीर्वाद स्वरूप प्राप्त हुआ.

पहली बार बाबा रामदेव सुर्खियों में भी एक व्यापारी के रूप में ही आए थे, हमेशा उन्होने बिना लाग लपेट व्यापार के ही बारे में बात की, उच्च गुणवत्ता के स्वदेशी उत्पाद उपलब्ध कराए. लोगों को रोजगार भी मिला. देश को आत्मनिर्भरता भी. इसमें कोई बुराई नहीं थी. उन्हे व्यापार ही करना चाहिए.

बुराई ये है कि आप बार-बार संतों कि भूमिका में आकार वर्णसंकट पैदा कर डाल रहे हैं, फिर न इधर के, न उधर के. इधर भी कबाड़ा और उधर भी.

बेहतर होता कि बाबा रामदेव कैमरे से ओझल होके चुपचाप व्यापार करते, अखिलेश, मुलायम, लालू, माया, ममता सबकी तारीफ करें, व्यापार की तरक्की के लिए अच्छे संबंध बनाए लेकिन कैमरे के पीछे, जैसे बाकी के उद्योगपति करते हैं, वैसे ही.

कोई उद्योगपति फिजूल बयानबाजी नहीं करता. बाबा रामदेव के ऐसा करने से समर्थकों पर बुरा प्रभाव पड़ता है, भ्रम फैलता है, देश का भी नुकसान हो सकता है और साथ ही इससे किसी और को नहीं बल्कि स्वयं इनके पतंजलि को भी नुकसान पहुँच रहा है.

लेकिन पतंजलि के उत्पादों के बहिष्कार का कोई तुक नहीं है, क्योंकि बाबा रामदेव के नीयत में कोई खोट नहीं दिखाई पड़ता, केवल नीति में ही कमी जान पड़ती है.

फिर भी बॉयकॉट के स्लोगन तो अभी से आने शुरू हो गए हैं, शायद ये उन्हें जल्द ही अपनी नीति को सही करने में मदद करे.

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