तुम्हें आज तक कितने लोगों ने Touch किया ???????

2011 में डायरेक्टर मिलन लूथरिया ने एक फिल्म बनायी थी ……The Dirty Picture ……. दक्षिण भारतीय फिल्म उद्योग की बहु चर्चित अभिनेत्री Silk Smitha के जीवन पे आधारित थी फिल्म । सिल्क स्मिता दक्षिण की C ग्रेड फिल्मों की अभिनेत्री थी ।
फिल्म का विषय और कथानक bold था पर मिलन लूथरिया ने इस संवेदनशील विषय पे एक बेहतरीन फिल्म बनायी ।
वो जिसे Cinematic Experience कहा जाता है उसके हिसाब से Dirty Picture एक बेहतरीन फिल्म थी ।
Stall में बैठ के soft porn फिल्म देखने वाले दर्शकों की हिरोइन पे बनी फिल्म के कथानक और विषय वस्तु पे शुद्धता वादी लोग नाक भौं सिकोड़ सकते हैं पर नारी देह पे आधारित फिल्म का फिल्मांकन जिस खूबसूरती से मिलन लूथरिया ने किया वो काबिले तारीफ था ।
पूरी फिल्म को उन्होंने कभी भी vulgar नहीं होने दिया ।
फिल्म में विद्या बालन , नसीरुद्दीन शाह और इमरान हाशमी , राजेश शर्मा ने बेहतरीन काम किया ।
मैं तो इसे नसीरुद्दीन शाह की जीवन की सबसे बेहतरीन फिल्म मानता हूँ ।

इसके अलावा फिल्म के लेखन और dialogues भी कमाल के थे ।
गंभीर फिल्मों के शौकीनों के लिए ये एक बेहतरीन Cinematic Experience था ।

फिल्म का एक दृश्य है जिसमे इमरान हाशमी विद्या बालन से पूछता है ।
तुम्हें आज तक कितने लोगों ने Touch किया ???????
विद्या जवाब देती है ……. touch तो बहुतों ने किया पर छुआ आज तक किसी ने नहीं …….

***

मोदी जी ने एक दिन राज्य सभा में सरदार जी को घेर लिया ।
पूछा ……. Dr साब ……. इत्ते दिन कांग्रेस की सेवा में रहे ……. 35 साल ……… कितने लोगों ने पीछे touch किया ?

Dr साब बोले …… न आज तक किसी ने touch किया न छुआ …….
हमेशा Condom इस्तेमाल किया …….. इसीलिए मैं आज तक अनछुई सती साबित्री हूँ …….
न कोई दाग …… न धब्बा …….
Mr Clean ………

लड़ाई बसपा भाजपा में हैं ।

मुझे याद है ।
2012 के चुनावी दिन थे ।
कांग्रेस का tempo high था ।
2009 में UPA2 ने अप्रत्याशित सफलता हासिल की थी और कांग्रेस तो UP में लोकसभा की 22 सीट जीत के सातवें आसमान पे थी ।
राहुल गांधी UP की जीत में दूल्हा बने घूम रहे थे ।
उधर भाजपा का all time Low चल रहा था ।
UP में बमुश्किल 10 सीट …….
रालोद जैसी पार्टियां जिनकी गिनती न तीन में है न तेरह में , वो भी 5 सीट जीत के भाजपा से बराबरी का दम भर रही थीं …….
ऐसे माहौल में 2012 का विधान सभा चुनाव आया UP में ।
राहुल बाबा के नेतृत्व में कांग्रेस बम बम थी ।
माहौल ऐसे बनाया जा रहा था मानो अबकी बार कांग्रेस सरकार ।
यूँ लगता था मानो कांग्रेस का वनवास इस बार समाप्त हो ही जाएगा ।
कांग्रेसी नेताओं में इस बात को ले के खींच तान शुरू हो गयी कि कौन बनेगा मुख्य मंत्री ???????

पर जब नतीजा आया तो फुसस्सससस्स ……..
कुल जमा 28सीट पे सिमट के रह गयी कांग्रेस ।
भाजपा की भी दुर्दशा हुई । कुल जमा 47 सीट आयी ।
कहने का मतलब ये की उन दिनों भाजपा की औकात रालोद और कांग्रेस जैसी थी UP में ।
2012 में बसपा को हरा के सपा चुनाव जीती । अखिलेश भैया की साइकिल आसमान में उड़ी जा रही थी । अहीरों ने पूरे UP में बमचक मचा रखा था ।
ऐसे में मोदी जी ने गुजरात में लगातार तीसरी बार चुनाव जीता और कूद पड़े राष्ट्रीय राजनीति में ……. और प्रधान मंत्री पद के लिए अपनी दावेदारी पेश कर दी ……
उस समय , जबकि UP में भाजपा अभी ताजा ताजा अपनी मिट्टी पलीद करा के बैठी थी , राजनीति के पंडितों ने सवाल उछाला …….. हम्ममम्म ……. प्रधान मंत्री बनोगे ???????
कहाँ से लियाओगे सीट ?
जानते हो …….. 272 सीट लगता है परधान मंतरी बनने को …….
कहाँ से लियाओगे हेतना सीट ?

मोदी जी ने जवाब दिया ……. अब लड़ेंगे तो सीट भी आ ही जाएगा ………
अच्छा ??????? आ जाएगा ? अबे ठेले पे बिकता है का ? जो आ जाएगा ???????
अच्छा ई बताओ …….. ऊपी में केतना सीट जीत के PM बनोगे ।
तब IBTL में एक लेख छपा ।
IBTL कुछ right wing टाइप पोर्टल था । उसने कहा कि भाजपा UP में 20 सीट जीतेगी ।
20 सीट सुन के सेक्युलर leftist मीडिया और जनता ने खूब मज़ाक बनाया ……. ये मुह और मसूर की दाल ? Huhhhhh ……. 20 सीट …… सीट मानो पेड़ पे लगती है ……. गए और तोड़ लाये ।
खैर …….. मोदी जी भाजपा के अंदर खुद को PM प्रत्याशी घोषित करने के लिए संघर्षरत थे । उधर देश में आपकी लोकप्रियता का ग्राफ निरंतर बढ़ रहा था ।
2012 में UP में भाजपा की ये समस्या थी कि इनके पास UP में सिर्फ और सिर्फ बनिया / सुनार वोट बचा था । यहां गक कि मजबूरी में ठाकुर तक छोड़ गए थे ।
2013 में जब मोदी जी PM प्रत्याशी के तौर पे उभरने लगे तो भाजपा में सबसे पहले जो वर्ग लौटा वो ठाकुर थे । जिनके साथ साथ ही ब्राह्मण और भूमिहार भी आ चढ़े । अब समस्त सवर्ण और बनिया व्यापारी भाजपा के साथ था ।
ऐसे में IBTL में फिर एक लेख छापा ……… UP में भाजपा 35 सीट ।
Leftist सेक्युलर मीडिया ने फिर खारिज कर दिया ।
Mid 2013 ……. मोदी जी को भाजपा ने तमाम खींच तान उठा पटक के बाद PM प्रत्याशी घोषित कर सिया । IBTL ने लिखा …….. UP में भाजपा 45 सीट …….. लोगों ने कहा पागल हैं …….
मीडिया अब भी भाजपा को 160 सीट दे रहा था देस भर में ……. और सवाल पूछता था कि समर्थन कहाँ से जुटाओगे ……. मोदी तो अछूत है …… आडवाणी होते तो शायद जुटा भी लेते ।
UP में भाजपा की समस्या ये थी कि इसकी पहचान शहरी और सवर्ण और बनियों की पार्टी के रूप में थी । OBC और दलित वोट नदारद थे ।
ऐसे में अमित शाह जी ने UP की कमान सम्हाली और मृत पड़े संगठन को ज़िंदा करना शुरू किया । भयंकर गुट बाजी थी । बीसियों नेता थे और सब के सब PM और CM material थे । नेता भारी भरकम और औकात इतनी भी नहीं कि अपनी सीट निकाल लें । ऐसे मृतप्राय संगठन में अमित शाह और मोदी जी ने जान फूंकी ।
बड़े नेताओं को धीरे धीरे दरकिनार किया ……. नहा नेतृत्व खड़ा किया ……. माहौल बनने लगा । गरमाने लगा । पर अब IBTL की हिम्मत न हुई कि वो 45 से ऊपर जाए ।
ऐसे में हमारे जैसों ने SM पे लिखना शुरू किया ……… 55
सो मेरे एक मित्र हैं । वो हैदराबाद के एक हिंदी अखबार के उप संपादक हैं ।
बोले …… का पहलवान ? भांग खाये हो का ? 55 ??????
मने राम लहर से भी आगे ……..
मैंने उन्हें जवाब दिया ……. राम लहर क्या थी ??????
यहां सुनामी बह रही है ।
चुनाव सिर पे था । टिकट वितरण की उठापटक के बाद जब तस्वीर साफ हुई तो मैंने एक दिन लिखा ……… क्या इस बार हम गाज़ीपुर भी जीत रहे हैं क्या ???????????
क्योंकि लक्षण मिलने लगे थे । और गाज़ीपुर की सीट पूरी UP में भाजपा के लिए सबसे कठिन सीट है ……. जातीय समीकरण ही ऐसे हैं ।
चुनाव में बमुश्किल 10 दिन थे
अंतिम चरण चल रहा था ।मैंने अपने जिले की वोटिंग से कोई 4 दिन पहले लिखा कि हम गाज़ीपुर जीत रहे हैं …….. जल प्रलय होगी ………
Result आया तो सब बह गया । सुनामी सब बहा ले गयी ।
73 सीट …….. सीटें वाकई पेड़ पे लगती हैं ।
पर उस पेड़ को सीचना सहेजना पड़ता है ।

बहरहाल ……. चुनावी मंच फिर सजा है UP में ।
वही अमित शाह हैं और वही मोदी जी हैं ।
और leftist secular मीडिया की वही जड़ता है ।
आज भी राजनीति के पंडितों को भरोसा नहीं ।
या यूँ कहिये कि भरोसा करना नहीं चाहते ।
हालांकि विधान सभा का चुनाव लोक सभा से अलग होता है ……. मुद्दे अलग होते हैं ……. क्षेत्र छोटे होते हैं , स्थानीय factors होते हैं …….. हार जीत का मार्जिन बहुत कम होता है ……. बहुकोणीय मुकाबला हो तो आकलन मुश्किल हो जाता है ……… पर इसके बावजूद ……. चुनाव के basics नहीं बदलते ।
अब जबकि UP में पहले चरण की voting में सिर्फ दो दिन बचे हैं ………..
सवाल है कितनी सीटें ????????
220 में दाग नहीं है ।
जस जस चुनाव होता जाएगा , आकलन ये होगा कि 220 से कितना ऊपर ।
मने 240 ????????
260 ?????????
या 280 ???????????
या फिर 300 ???????

पर इतना तय है कि पिछले 3 दिन में सपा पिछड़ी है और बसपा ने improve किया है ।
आज भाजपा की लड़ाई बसपा से है ।
कांग्रेस से गठबंधन कर सपा पीछे छूट गयी ।
कांग्रेस इतनी भारी है कि वो सपा को ले डूबेगी ।
लड़ाई बसपा भाजपा में हैं ।
परिदृश्य रोज़ बदल रहा है ।
इंतज़ार कीजिये ।

जल्लाद किसी को सुधार नहीं सकता. सिर्फ मार सकता है ……

बच्चों के साथ काम करते हुए बहुत अनुभव होते हैं.

बेचारे बच्चे के साथ बड़ी problem होती है. हर कोई उसे समझाना चाहता है ……. उसे कोई समझना नहीं चाहता …

स्कूल में अक्सर बच्चों को पकड़ के principal के ऑफिस में लाया जाता है. ऐसा आमतौर पे तब होता है जब मामला बेहद serious हो. तब जब बात class teacher के level से ऊपर चली जाती है. ऐसी दशा में जब बच्चे को प्रिंसिपल के सामने पेश किया जाता है तो उसकी वही मनोदशा होती है जो कसाई के सामने बकरे की होती है ……. दूसरी बात मैंने आम तौर पे स्कूलों में ये देखी है कि प्रिंसिपल अपनी इमेज स्कूल में जल्लाद जैसी बना के रखते हैं. आजकल के private स्कूलों में तो ये माहौल है कि वहाँ बच्चा तो छोड़िये teachers की भी टांगें कांपती हैं प्रिंसिपल के सामने जाने में.

मेरी सबसे अच्छी सबसे होनहार student मेरी पत्नी ही रही हैं. मैंने उनसे discuss किया ……. एक प्रिंसिपल की इमेज स्कूल में जल्लाद वाली क्यों होनी चाहिए? लीडर को जल्लाद होना चाहिए क्या ? स्कूल में मुख्य काम होता है learning …… उद्योग में मुख्य कार्य होता है सृजन. सबसे अच्छी learning या सृजन प्यार और सौहार्द्रपूर्ण वातावरण में होगा या terror के माहौल में ? इसलिए मैडम जी ने पहले दिन से ही स्कूल में अपनी छवि एक माँ की बनायी. बच्चों के लिए भी और स्टाफ के लिए भी.

जब टीचर बच्चे को पकड़ के प्रिंसिपल के सामने पेश करती है तो उस से पहले क्लास में वो माहौल कायदे से खराब कर चुकी होती है. और इस आशा में कि प्रिंसिपल अब इस बिगड़े आतंकी को सुधार देगी …..वो उसे सुप्रीम कोर्ट में पेश करती है …… उस दृश्य की कल्पना कीजिये कि एक डरा सहमा बच्चा लाया जा रहा है ….. गिरफ्तार कर के ….. जल्लाद के सामने ….. ज़्यादातर ऐसे cases में बच्चा रोता हुआ पहुंचता है प्रिंसिपल ऑफिस में ……

पर ये क्या …. वहाँ तो जाते ही सीन ही बदल गया ….. अरे क्या हुआ भाई …..क्या हुआ? मेरा बच्चा रो क्यों रहा है …… अरे इधर आओ …… और उसे बुला लिया …… गोद में बैठा लिया ….. दुलार पुचकार के शांत किया …… मुकदमा हारते देख टीचर दलील पेश करती है ……अजी बहुत बड़ा डाकू है ये ……जज साहब चुप करा देते हैं ….. आंसू पोंछे …..मुंह धुलवाया ….. candy दी ….. शांत किया ……. प्यार किया ….. 4- 6 चुम्मियां लीं , वापस भेज दिया. इस से क्या हुआ कि बच्चे में और प्रिंसिपल में परस्पर विश्वास का और प्रेम का माहौल बना. फिर शाम को या अगले दिन …..

प्रिंसिपल पहुंची क्लास में …. पूरा मामला देखा समझा और आज जबकि बच्चा शांत और सहज है उसे प्यार से handle किया. समस्या आम तौर पे बहुआयामी होती है …… हल भी बहुआयामी ही होते हैं …….

सूखे खेत में बीज नहीं फूटते. पहले खेत में अनुकूल माहौल तैयार करना पड़ता है …. अंकुरण के लिए नमी चाहिए.

problem solving के लिए पहले अनुकूल माहौल तैयार कीजिये. रेत को कितना ही पेर लो …… तेल नहीं निकलता …… charged atmosphere में कभी शान्ति की बात नहीं हो सकती.

problem solving से पहले अनुकूल माहौल बनाइये …….

जल्लाद किसी को सुधार नहीं सकता. सिर्फ मार सकता है ……

क्या मायावती के हाथ से दलित वोट वाकई गया ?

पिछले लोक सभा चुनाव के परिणामों पर मायावती ने प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा था कि उन की हार के पीछे मुख्य कारण गुमराह हुए ब्राह्मण, पिछड़े और मुसलमान समाज द्वारा वोट न देना है जिस के लिए उन्हें बाद में पछताना पड़ेगा. इस प्रकार मायावती ने स्पष्ट तौर पर मान लिया था कि उस का सोशल इंजीनियरिंग का फार्मूला फेल हो गया है. मायावती ने यह भी कहा था कि उस की हार के लिए उसका यूपीए को समर्थन देना भी था.

उस ने आगे यह भी कहा था कि कांग्रेस और सपा ने उस के मुस्लिम और पिछड़े वोटरों को यह कह कर गुमराह कर दिया था कि दलित वोट भाजपा की तरफ जा रहा है. परन्तु इस के साथ ही उस ने यह दावा किया था कि उत्तर प्रदेश में उसकी पार्टी को कोई भी सीट न मिलने के बावजूद उस का दलित वोट बैंक बिलकुल नहीं गिरा है. इसके विपरीत उसने अपने वोट बैंक में इजाफा होने का दावा भी किया था.

आइये उस के इस दावे की सत्यता की जांच उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर करें:-

यदि बसपा के 2007 से लेकर अब तक चुनाव परिणामों को देखा जाये तो यह बात स्पष्ट तौर पर उभर कर आती है कि जब से मायावती ने बहुजन की राजनीति के स्थान पर सर्वजन की राजनीति शुरू की है तब से बसपा का दलित जनाधार बराबर घट रहा है. 2007 के असेंबली चुनाव में बसपा को 30.46%, 2009 के लोकसभा चुनाव में 27.42% (-3.02%), 2012 के असेंबली चुनाव में 25.90% (-1.52%) तथा 2014 के लोक सभा चुनाव में 19.60% (-6.3%) वोट मिला था. इस से स्पष्ट है कि मायावती का दलित वोट बैंक के स्थिर रहने का दावा उपलब्ध आंकड़ों पर सही नहीं उतरता है.

मायावती का यह दावा कि उस का उत्तर प्रदेश में वोट बैंक 2009 में 1.51 करोड़ से बढ़ कर 2014 में 1.60 करोड़ हो गया है भी सही नहीं है क्योंकि इस चुनाव में पूरे उत्तर प्रदेश में बढ़े 1.61 करोड़ नए मतदाताओं में से बसपा के हिस्से में केवल 9 लाख मतदाता ही आये थे. राष्ट्रीय चुनाव आयोग द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार भी बसपा का वोट बैंक 2009 के 6.17 % से 2% से अधिक गिरावट के कारण घट कर 4.1% रह गया था. सेंटर फार स्टडी आफ डेवलपिंग सोसाइटी के निदेशक संजय कुमार ने भी बसपा के कोर दलित वोट बैंक में सेंध लगने की बात कही थी.

मायावती का कुछ दलितों द्वारा गुमराह हो कर भाजपा तथा अन्य पार्टियों को वोट देने का आरोप भी बेबुनियाद है. मायावती यह अच्छी तरह से जानती हैं कि दलितों का एक बड़ा हिस्सा चमारों सहित 2012 के असेंबली चुनाव में ही उस से अलग हो गया था. इसका मुख्य कारण शायद यह था कि मायावती ने दलित राजनीति को उन्हीं गुण्डों. माफियों और पूंजीपतियों के हाथों बेच दिया है जो कि उनके वर्ग शत्रु हैं. इस से नाराज़ हो कर चमारों/जाटवों का एक हिस्सा और अन्य दलित उपजातियां बसपा से अलग हो गयी हैं.. मायावती का बोली लगा कर टिकट बेचना और दलित वोटों को भेड़ बकरियों की मानिंद किसी के भी हाथों बेच देना और इस वोट बैंक को किसी को भी हस्तांतरित कर देने का दावा करना दलितों को एक समय के बाद रास नहीं आया. इसी लिए पिछले असेंबली चुनाव और लोक सभा चुनाव में दलितों ने उसे उसकी हैसियत बता दी थी.

किसी भी दलित विकास के एजंडे के अभाव में दलितों को मायावती की केवल कुर्सी की राजनीति भी पसंद नहीं आई है क्योंकि इस से मायावती के चार बार मुख्य मंत्री बनने के बावजूद भी दलितों की माली हालत में कोई परिवर्तन नहीं आया है. एक अध्ययन के अनुसार उत्तर प्रदेश के दलित बिहार. उड़ीसा, मध्य प्रदेश और राजस्थान के दलितों को छोड़ कर विकास के सभी मापदंडों जैसे: पुरुष/महिला शिक्षा दर, पुरुष/महिला तथा 0-6 वर्ष के बच्चों के लैंगिक अनुपात और नियमित नौकरी पेशे आदि में हिस्सेदारी में सब से पिछड़े हैं. मायावती के व्यक्तिगत और राजनीतिक भ्रष्टाचार के कारण दलितों को राज्य की कल्याणकारी योजनाओं का भी लाभ नहीं मिल सका. दूसरी तरफ बसपा पार्टी के पदाधिकारियों की दिन दुगनी और रात चौगनी खुशहाली से भी दलित नाराज़ हुए हैं जिस का इज़हार उन्होंने लोकसभा चुनाव में खुल कर किया था. यह भी ज्ञातव्य है कि उत्तर प्रदेश की 40 सीटें ऐसी हैं जहाँ दलितों की आबादी 25% से भी अधिक है. 2009 के लोक सभा चुनाव में बसपा 17 सुरक्षित सीटों पर नंबर दो पर थी जो कि 2014 में कम हो कर 11 रह गयी थी. इस से स्पष्ट है कि मायावती का दलित वोट बैंक के बरकरार रहने का दावा तथ्यों के विपरीत है.

मायावती ने 2012 के असेंबली चुनाव में भी मुसलामानों पर आरोप लगाया था कि उन्होंने उसे वोट नहीं दिया. पिछले लोकसभा चुनाव में मायावती ने इस आरोप को न केवल दोहराया था बल्कि बाद में उनके पछताने की बात भी कही थी. मायावती यह भूल जाती हैं कि मुसलामानों को दूर करने के लिए वह स्वयं ही जिम्मेवार हैं. 1993 के चुनाव में मुसलामानों ने जिस उम्मीद के साथ उसे वोट दिया था मायावती ने उस के विपरीत मुख्य मंत्री बनने की लालसा में 1995 में मुसलामानों की धुर विरोधी पार्टी भाजपा से हाथ मिला लिया था. इस के बाद भी उसने कुर्सी पाने के लिए दो बार भाजपा से सहारा लिया था. इतना ही नहीं 2003 में उस ने गुजरात में मुसलमानों के कत्ले आम के जिम्मेवार मोदी को कलीन चिट दी थी तथा उस के पक्ष में गुजरात जा कर चुनाव प्रचार भी किया था. आगे भी मायावती भाजपा से हाथ नहीं मिलाएगी इस की कोई गारंटी नहीं है. ऐसी मौकापरस्ती के बरक्स मायावती यह कैसे उम्मीद करती है कि मुसलमान उसे आँख बंद कर के वोट देते रहेंगे. मुज़फ्फरनगर के दंगे में मायावती द्वारा कोई भी प्रतिक्रिया न दिया जाना भी मुसलामानों को काफी नागुबार गुज़रा था.

मायावती द्वारा पिछली तथा 2014 की हार के लिए अपनी कोई भी गलती न मानना भी दलितों और मुसलामानों के लिए असहनीय रहा है. 2012 में उसने इस का दोष मुसलामानों को दिया था. 2014 में उसने इसे कांग्रेस सरकार को समर्थन देना बताया था . अगर यह सही है तो मायावती के पास इस का क्या जवाब है कि उस ने कांग्रेस सरकार को समर्थन क्यों दिया? केवल कट्टरपंथी ताकतों को रोकने की कोशिश वाली बात भी जचती नहीं. दरअसल असली बात तो सीबीआई के शिकंजे से बचने की मजबूरी थी जो कि आय से अधिक संपत्ति के मामले में अभी भी बनी हुयी है. भाजपा भी मायावती की इसी मजबूरी का फायदा उठाती रही है और आगे भी उठाएगी.

उपरोक्त संक्षिप्त विश्लेषण से स्पष्ट है कि दलितों ने पिछली बार मायावती के सर्वजन वाले फार्मूले को बुरी तरह से नकार दिया था. मुसलामानों ने भी उस से किनारा कर लिया था. इस चुनाव में भी इस स्थिति में कोई विशेष परिवर्तन आने की सम्भावना दिखाई नहीं देती है.

  1. लेखक एस. आर. दारापुरी रिटायर आईपीएस अधिकारी हैं. वे आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट के राष्ट्रीय प्रवक्ता भी हैं.

छोटे short cuts अक्सर कहीं नहीं पहुँचते ।

हम हिंदुस्तानी बाप लोग का एक फेवरिट डायलाक होता है ……..
बेटा , बाप के पैसे पे ऐश मत करो ।
अभी मौक़ा है …….. पढ़ लिख लो ।
वरना भीख मांगोगे । साले तुमको तो कोई भीख भी न देगा ।
हिन्दुस्तान का हर होनहार लौंडा अपने खडूस बाप के ये डायलॉग सुन सुन के ही जवान होता है ।

पर रोहित वेमुला की किस्मत में बाप न था ।
शायद इसीलिए रोहित वेमुला पलायन वादी हो गया ।
उसने जीवन भर short cuts खोजे ।
आसान रास्ते ।
काश उसको भी कोई समझाने वाला मिला होता कि बेटा …….. ज़िन्दगी में there is nothing like a free lunch ……
.मुफ़्त में कुछ नहीं मिलता बेटा । ये ज़िन्दगी है , कोई आम आदमी पार्टी की सरकार नहीं , जो हर चीज़ मुफ़्त में दे देगी ।
रोहित ने हमेशा short cut लिया । सिर्फ short cut ही नहीं लिया , बल्कि छोटे से भी छोटा short cut लिया । वो ज़िन्दगी भर short cuts ही खोजता रहा ।
था OBC पर उसने short Cut लिया । दलित बन गया । मर्द होता तो जनरल बनता ।
हिन्दू था , पर यहां भी उसने short cut लिया । ईसाई बन गया ।
पिछड़े हिन्दू से दलित ईसाई बन गया ।
नेता गिरी भी की तो दलितों की । हमारे यहां तो दलित पिछड़ों की तो नेतागीरी भी आसान है । सवर्णों की नेतागीरी करने में तो भैया दांत से पसीना आ जाता है ।

पढ़ लिख के कुछ बन जाता , कुछ हासिल कर लेता , कहीं किसी मोटे तगड़े भारी भरकम package वाली नौकरी करता , मोटे पैसे कमाता , और फिर ज़िन्दगी भर ऐश करता । पर उसने यहां भी short cut लिया । fellowship के पैसे से ही ऐश करने लगा । फ़ेलोशिप indiscipline और गुंडागिरी के कारण बंद हो गयी तो कर्ज़ा ले के जीने लगा …….. once again छोटा short cut ……..

जब hostel से निष्कासन हुआ , और जब university के इस फैसले के खिलाफ अनशन पे बैठे , तो कुछ दिन एकांत लाभ मिला । एकांत लाभ यूँ मिला कि अनशन जैसे बोरिंग काम से तमाशबीन बहुत जल्दी ऊब जाते हैं । अकसर देखा जाता है कि अनशनकारी अकेले पड़े रहते हैं । कोई मूतने भी नहीं आता । सो उस एकांत वास में इन ने जब introspection किया तो पाया कि ज़िन्दगी में तमाम short cuts मार के भी उनकी ज़िन्दगी की गाडी कही पहुँच नहीं रही ।
Phd अटक गयी । और अब तक जो पढ़ाई की उस से कुछ मिलेगा नहीं ।
Hostel था , fellowship थी तो ज़्यादा नहीं तो साल दो साल का जुगाड़ तो था ?
अब इस नेता गिरी में तो वो भी गया ।
Short cut मार के भी ज़िन्दगी कहीं पहुँचती नहीं दिखी तो उन ने इसका हल जानते हैं क्या खोजा ?
एक और Short Cut ।
एक और छोटा Short Cut ………

जनाब पंखे से लटक गए ।
आज एक पोस्ट पे मेरे एक मित्र comment box में पिले पड़े थे और उसके OBC से दलित बन जाने को justify कर रहे थे । तर्क संगत और न्याय संगत बता रहे थे ।
ये पोस्ट बस उन्ही के उस कुतर्क को समर्पित है ।

ज़िन्दगी में छोटे short cut अक्सर बहुत लंबे हो जाते हैं ।
इसलिए जो सच है और जो सही है , उसी मार्ग पर चलो ।
क्योंकि छोटे short cuts अक्सर कहीं नहीं पहुँचते ।

पिछले साल की पोस्ट …….

पंजाब में संभावित AAP सरकार के खतरे

पंजाब में मौड़ मंडी – बठिंडा के कांग्रेस प्रत्याशी की रैली में हुए Bomb Blast को पुलिस ने आतंकी हमला करार दिया है ।
इस हमले में मरने वालों की संख्या बढ़ के 6 हो गयी है ।
इस हमले में प्रयुक्त मारुती Alto कार चोरी की है , उसपे लगी नंबर प्लेट एक स्कूटर की है ।
विस्फोट में कार के परखचे उड़ गए ।
पुलिस का कहना है कि इस हमले में एक अत्यंत परिष्कृत बम का उपयोग किया गया , जिसे remote के जरिये उड़ाया गया । वो remote कोई mobile फोन हो सकता है ।
विस्फोट में दो प्रेशर कुकर इस्तेमाल किये गए जिसमे से सिर्फ एक ही फटा ।
अगर दूसरा भी फट जाता तो बहुत ज़्यादा जानें जातीं ।

अब इसमें कोई गुंजाइश नहीं की ये एक आतंकी हमला है ।
जब से पंजाब के राजनैतिक परिदृश्य में AAP का उदय हुआ है , यहां पंजाब में खालिस्तानी तत्वों के वापस सिर उठा लेने की संभावना बहुत ज़्यादा बढ़ गयी है ।
AAP को धन जन और अब बल का पूरा समर्थन ही खालिस्तानियों से मिल रहा है पर स्थानीय जनता इसे समझ नहीं पा रही है ।

खालिस्तानी आतंकवाद ने पंजाब में दस्तक दे दी है ।
सवाल है कि अगर खालिस्तानी आपियों की सरकार वाकई पंजाब में बन गयी तो क्या होगा ?
बहुत संभव है कि भगवंत मान जैसा एक शराबी कॉमेडियन पंजाब जैसे एक संवेदन शील राज्य का जो कि एक border state है , इसका मुख्यमंत्री बन जाए ।
भगवंत मान या ऐसे किसी भी आपिये नेता को कोई भी प्रशासनिक अनुभव नहीं है जबकि पंजाब जैसे संवेदनशील राज्य जहां communal forces और communal issues की कोई कमी नहीं , यहाँ राज चलाना बहुत मुश्किल है । पंजाब हमेशा से communal tension के मुहाने पे बैठा रहता है और एक छोटी सी चिंगारी विकराल आग में बदल सकती है ।
पिछले कुछ सालों में हमने कई ऐसे मामले देखे जहां स्थिति बहुत खराब हो गयी थी ……. जैसे की बाबा गुरमीत राम रहीम के डेरा सच्चा सौदा के मसले , या फिर डेरा सच खंड के बाबा रामानंद दास जी की Vienna में हुई ह्त्या और उस से उपजे तनाव के मसले हों या फिर पिछले दिनों हुई गुरु ग्रंथ साहिब की बेअदबी से उत्पन्न हुए तनाव के मसले हों …….. ऐसे तमाम मसलों को हल करने और इन communal tensions को control करने के लिए जो प्रशासनिक अनुभव होना चाहिए वो AAP के किसी नेता के पास नहीं है ।
दूसरी सबसे बड़ी समस्या है AAP की केंद्र में मोदी सरकार से हमेशा टकराव की नीति ।
दिल्ली में हम देख चुके हैं कि AAP और केजरीवाल हर छोटी छोटी बात पे केंद्र सरकार और मोदी जी से सींग फंसा लेते हैं , हर बात के लिए मोदी सरकार को blame करते हैं । दिल्ली तो पूर्ण राज्य नहीं और वहाँ के CM के हाथ में बहुत कम प्रशासनिक अधिकार हैं और दिल्ली पुलिस चूँकि गृहमंत्रालय के आधीन है इसलिए किसी तरह काम चल जाता है , पर यदि पंजाब जैसे sensitive पूर्ण राज्य और border state में खालिस्तानी समर्थक कोई सरकार अगर काबिज हो जाती है जिसका मुखिया कोई अनाड़ी खालिस्तानी हो तो इसके खतरे आप समझ सकते हैं । विडम्बना ये है कि आज जो युवा पंजाब में AAP समर्थक हुए हैं उन्होंने 80 और 90 के दशक का खालिस्तानी आतंकवाद न देखा है न झेला है । ये इसके खतरों को समझते ही नहीं ।

सिर्फ 2 दिन बाद पंजाब में वोट डाले जाएंगे ।
देखते हैं कि पंजाब की किस्मत में क्या लिखा है ?

मुलायम के ये लोग ……….

कल चचा सिपाल जादो ने भतीजे अकललेस जादो के पिछवाड़े में खूंटा ठोक दिया है ।

कल जसवंतनगर से साइकिल चुनाव चिन्ह से पर्चा भरने के बाद उन्होंने सरेआम ललकारा कि बेटा अकललेस ये चुनाव तुम जीत लो ( जीत के दिखा दो ) उसके बाद जब 11 मार्च को नतीजे आ जाएंगे तो हम बनाएंगे नयी पार्टी । गौरतलब है कि 11 मार्च को या तो समाजवादी पाल्टी का विजय जलूस निकलेगा या फिर जनाजा ।
विजय जलूस के समय पार्टियां नहीं टूटा करती ।
जाहिर सी बात है कि चचा सिपाल जादो को बोल रहे हैं की ऐ भतीजे …….पहले 11 मार्च को तुमरी G मारेंगे और फिर तुम्हारी उस फटी हुई G में हाथ घुसेड़ के अपने हिस्से की समाजवादी पाल्टी निकाल लेंगे ।

मुलायम और सिपाल ने खुल के बगावत कर दी है ।
कल इटावा में सिविल लाइन्स में , समाजवादी पाल्टी के दफ्तर के ठीक बगल में एक नया दफ्तर खुला ……. उसपे बोर्ड लगा था ” मुलायम के लोग ” । इस दफ्तर का संचालन इटावा के पूर्व सपा जिलाध्यक्ष सुनील यादव कर रहे हैं । सुनील यादव को सिपाल जादो ने जिला अध्यक्ष बनाया था जिसे अकललेस जादो ने हटा दिया ।
इटावा सदर से तीन बार के विधायक रघुराज शाक्य का टिकट भी कलेस जादो ने काट दिया । वो भी अपने समर्थकों के साथ इस ” मुलायम के लोग ” दफ्तर में बैठ रहे हैं ।

आइये अब मैनपुरी चलते हैं ।
मैनपुरी के सपा जिलाध्यक्ष माणिक चंद शाक्य ने भी अपने ( सिपाल जादो के ) 2000 समर्थकों के साथ सपा से इस्तीफा दे के मुलायम के लोग join कर ली है । इन 2000 समर्थकों में 3 जिला पंचायत सदस्य , 40 ग्राम प्रधान , 60 पूर्व प्रधान और कई block प्रमुख हैं ।

इसी तरह कल मैनपुरी में अमित जानी ने शिवपाल यादव यूथ ब्रिगेड का गठन कर दिया ।
अनिल वर्मा ने शिवपाल युवजन सभा का गठन किया ।
Ground report ये है कि इटावा , मैनपुरी , कन्नौज , एटा इत्यादि जिलों में मुलायम शिवपाल को व्यापक जनसमर्थन है । 2012 में इन जिलों में सपा ने 69 में से 55 सीटें जीत ली थीं । खबर है कि इन 67 सीटों पे मुलायम सिपाल ब्रिगेड ने समाजवादी पार्टी – कांग्रेस के उम्मीदवारों को हराने के लिए कमर कस ली है और भितरघात नहीं बल्कि खुली बगावत कर रहे हैं ।
बहुत संभव है कि ये ” मुलायम के लोग ” के दफ्तर प्रदेश के प्रत्येक जिले में खुल जाएंगे । बताया जा रहा है कि मुलायम के ये लोग कांग्रेस को दी गयी 105 सीटों से निर्दल चुनाव लड़ेंगे और शेष 300 सीटों पे समाजवादी पाल्टी के अधिकृत उम्मीदवारों के खिलाफ खुली बगावत कर उनके खिला प्रचार करेंगे । इसके अलावा बहुत से ” मुलायम के लोग ” उन 300 सीटों से बागी उम्मीदवार के तौर पे चुनाव भी लड़ेंगे ।

” मुलायम के लोगों ” ने धार लिया है कि इस चुनाव में अखिलेश को नेस्तनाबूद कर देना है । इस दिशा में पहला हमला सपा – Cong गठबंधन पे हमला है । इस खुली बगावत का सीधा सीधा फायदा भाजपा को होने जा रहा है ।
इसके अलावा मुस्लिम भोटर की बेचैनी भी बढ़ गयी है । सपा – cong गठबंधन पे लटकी तलवार और मुलायम सिपाल की खुली बगावत के बाद मुसलमान एक बार फिर ये सोचने को मजबूर हुआ है कि कहाँ जाए ?

बसपा में ? मुस्लिम भोट का बिखराव भी तय है ।
कांग्रेस तो कहीं की न रही । समझौते में 300 सीट अखिलेश ले गए और बाकी 103 मुलायम के ये लोग ……….

संजीव गांधी से संजय गांधी बनने की कहानी

ये नेहरू खानदान आज से नहीं , बहुत पहले से चुदक्कड़ और चिन्दी चोर रहा है ।
इनकी चुदक्कड़ी के किस्से फिर कभी ।
आज इनके चिन्दी चोर चरित्र का एक किस्सा सुन लीजिये ।
हुआ ये कि इंदिरा जी प्रधान मंत्री थीं ।
संजय गांधी उन दिनों कांग्रेस के युवराज थे ।
जैसे आजकल राहुल G हैं युवराज , वैसे ही तब थे संजय गांधी ।
पर तब उनका नाम संजय गांधी नहीं बल्कि संजीव गांधी था ।

इंदिरा को दो बेटे राजीव और संजीव …….. पुराने जमाने में माताएं Rhyming नाम रखा करती थीं । सो दोनों बेटों के नाम रखे राजीव गांधी और संजीव गांधी ……..
इंदिरा गांधी का बड़ा बेटा पायलट था Air India में । उसको राजनीति से कोई मतलब न था ।
छोटा बेटा संजीव गांधी राजनीति में था । एक नंबर का लुक्खा ……. अय्याश …… लौंडिया बाज ……
भ्रष्ट और कमीशन खोर । इस देश में जातीय राजनीति इंदिरा गांधी ने शुरू की ।
पर चोर उचक्के , गिरहकट , चिन्दी चोर , छिनैत , स्थानीय गुंडों को राजनीति में लाने का श्रेय इस संजीव गांधी को ही था ।
ये उस जमाने की बातें हैं , मने 1970 के आसपास की जब कि हमारे देश में बहुत कम कारें हुआ करती थीं । उन दिनों भारत देश में ले दे के कार के सिर्फ दो मॉडल होते थे । एक हिंदुस्तान मोटर की Ambassador और दूसरी Fiat …….. और ये भी पूरे शहर में दो चार ही होती थीं ।
मने जो शहर के बड़े रईस उद्योगपति जमींदार राजा साहब लोग होते थे उनके पास car होती थी और ये संजीव गांधी उन दिनों नयी उम्र का लौंडा होता था । नया नया जवान हुआ था । कार चलाने का शौक था । इनकी अम्मा की सरकार थी । दिल्ली में किसी की औकात न थी की संजीव गांधी को हरामीपन करने से रोक दे …… सो दिल्ली में इसका ये काम था कि जिसकी भी कार दिख जाती , ये श्रीमान जी उठा ले जाते और अपने दोस्तों के साथ उसे खूब दिल्ली की सड़कों पे दौड़ाते और जहां पेट्रोल ख़त्म हो जाता वहीं छोड़ के निकल लेते ।
सो एक बार ये London चले गए । वहाँ एक से बढ़ के एक car देखी सड़क पे ।
अब इनका मन मचलने लगा कि हमहूँ चलाऊँगा बिदेसी मोटर ……. वहाँ किसी car rental agency में गए पर चूँकि इनके पास ड्राइविंग लाइसेंस न था सो उन ने दी नहीं । इनको आदत पड़ी थी दिल्ली वाली । बाहर निकले । जो पहली गाडी दिखी इन ने उठा ली और निकल लिए ।
घंटे भर दौड़ाई , और उसके बाद वहाँ की पुलिस ने इनको धर लिया …….. कार चोरी में ……. ये सिरिमान जी हवालात में औ पासपोर्ट इनका जप्त …….
तब UK में राजदूत थे कृष्ण मेनन …….
इंदिरा जी ने उनको फून किया …… ए जी सुनो …… हमार बिटवा हवालात में बंद है कार चोरी में …….ओका छुड़ाओ ……. कृष्ण मेनन एक नंबर का कमीना हरामी कांग्रेसी था और कांग्रेसी सब चोरी चकारी हेराफेरी fraud चार सौ बीसी में बहुत तेज होते हैं ……. उसने युवराज की हवालात से जमानत कराई ……. पासपोर्ट तो पुलिस ने जप्त कर लिया था और ये तो खुद्दे राजदूत था सो इसने युवराज का नाम संजीव गांधी से बदल के कर दिया संजय गांधी , 10 मिनट में नया पासपोर्ट बनाया ……. ये वो ज़माना घा जब कि अभी इमीग्रेशन क़ानून बहुत सख्त न थे और इंग्लैंड जाने को तो Visa तक न लगता था …… सो कृष्ण मेनन ने संजीव गांधी को संजय गांधी बना के फ़र्ज़ी पासपोर्ट बनाया और जो पहली flight मिली उसमे लाद के दिल्ली पहुंचा दिया ।
संजीव गांधी आज भी UK में कार चोरी में फरार शुदा मुजरिम के रूप में wanted हैं ।

आगे चल के इस संजय गांधी का कार प्रेम रंग लाया और इसने प्रण किया कि ये भारत में कार बनाने का कारखाना डालेगा और जो कार बनेगी उसका नाम होगा ” मारुती ”
संजय गांधी ने एक कार का prototype तैयार भी कराया पर वो टेस्ट में फेल हो गयी और अपने जीते जी कार बनाने का सपना संजय गांधी पूरा न कर सके और 1980 में दिल्ली के ऊपर एक छोटे हवाईजहाज में कलाबाजियाँ दिखाते एक दुर्घटना में मारे गए ।
उनकी मृत्यु के 4 साल बाद Suzuki कंपनी के साथ collaboration कर मारुती का उसका सपना साकार हुआ ………

ऊपी के अराजक तत्वों को ये साथ पसंद है

बहुत पहले , जब कि बिहार में लालू का शासन था , सवाल पूछा गया कि आखिर लालू बिहार में क़ानून बेवस्था सुधारने के लिए काम क्यों नहीं करते ?
जवाब में एक राजनैतिक विश्लेषक ने बताया कि लालू का भोटर अराजकता को पसंद करता है । लालू का भोटर अराजकता में ही फलता फूलता है ।
एक बार लालू जी किसी गाँव में जनसभा को संबोधित कर रहे थे ।
किसी ने सवाल किया कि पिछली बार जब आये थे तो आपने वादा किया था कि नदी पे पुल बनेगा और गाँव तक सड़क बनेगी ……. क्या हुआ ?????
लालू जी ने जवाब दिया ……. अरे पुलवा अ सड़किया बन जाई त पुलिस क जीप भुर्र देना गाँव में आ जाई …….. त गांजा के खेती कइसे होई ?????

एक अन्य जनसभा में ऐसे ही जब सड़क के लिए सवाल पूछा गया तो लालू जी ने जवाब दिया कि सड़क अगर नहीं बनी तो इस से तुमको क्या फर्क पड़ता है जी ?????
अरे तुमको तो गाँव खेत की पगडण्डी पे ही न चलना है ? सड़क पे तो बाबू साहब की जीप न दौड़ेगी ???????

ऐसे थे लालू जी और ऐसे थे उनके भोटर …….

कल देस के युवराज UP के युवराज के साथ ऊपी की राजधानी लखनऊ में रोड शो कर रहे थे । इन दोनों लौंडों ने ये नारा दिया है कि ऊपी को ये साथ पसंद है …….
मज़े की बात है कि दोनों लौंडों का roadshow मुस्लिम बहुल इलाकों में हुआ । अब मुस्लिम इलाके का मतलब होता है मुफलिसी , गरीबी , पिछड़ापन , anarchy , अराजकता , मिमियाती बकरियां , बजबजाती नालियां …….. मुस्लिम इलाका मने वो इलाका जहां पुलिस भी दिन में जाने से घबराए ……. खांटी मुस्लिम इलाका वो जहां से हिन्दू बेचारा अपना घर दूकान मकान बेच के या ताला लगा के भागने को मजबूर हो जाए ……..
मुस्लिम इलाका मने कैराना ……. एक लाख की आबादी वाले कैराना में एक भी petrol pump नहीं है ……. एक भी ढाबा , होटल धर्मशाला नहीं है ……. तो ऐसे ही एक मुस्लिम इलाके में कल दोनों लौंडे युवराज road show कर रहे थे । ये दोनों लौंडे वो हैं जो कि देश की सबसे प्रभावशाली first families के चश्मो चिराग हैं ……. मने कल तक इनके मूत से चिराग जलते थे देस में ……. cabinet का अध्यादेश फाड़ दिया करते थे भरी सभा में , National TV पे ……. तो कल ये दोनों सर्व शक्तिमान लौंडे प्रदेश की राजधानी में road show कर रहे थे ……… मुस्लिम इलाके से निकलने लगे तो बिजली की चोरी करने वाली कटिया – तारों के जंजाल ने इनका रास्ता रोक लिया …….. इन्हें घेर लिया ……..
और बजाय इन कटियाबाजों की तार हटाने के , दोनों युवराजों ने घुटने टेक दिए ……. उन तारों के सामने सिर झुका दिया , नत मस्तक हो गए …… surrender कर दिया ।
देश के दो कर्णधारों ने अराजकता के सामने surrender कर दिया ।

पुराने लखनऊ में बिजली की चोरी रोकने के लिए और तारों के जंजाल से लखनऊ को मुक्त करने के लिए LESA मने Lucknow Electricity Supply Administration को 100 करोड़ का बजट दिया गया था ।
लक्ष्य था कि शहर की तमाम बिजली की तारों को Under Ground कर दिया जाए जिस से बिजली चोरी भी रुक जाए , और शहर भी तारों के जंजाल से मुक्त हो जाए ।
LESA की टीम जब तार डालने के लिए गड्ढा खोदने पहुंची तो भाई जान लोग ने डंडा ले के दौड़ा लिया……. अगर तार जमींदोज हो गए तो कंटिया कैसे लगेगी ? बिजली चोरी कैसे होगी ?
सपा और कांग्रेस बिजली चोरी की अराजकता को पसंद करता है , शहर में तारों के जंजाल को पसंद करता है ……. ऐसे में जाहिर है कि दोनों युवराज लौंडे इस अराजक भोट बैंक के सामने नत मस्तक हैं ……. दंडवत हैं …… घुटनों पे हैं ……..

ऊपी के अराजक तत्वों को ये साथ पसंद है

पंजाबी समझ नहीं रहे कि वो आग से खेल रहे हैं ।

बात उन दिनों की है जब दिल्ली में अन्ना हज़ारे जनलोकपाल के लिए अनशन पे बैठे हुए थे ।
राम लीला मैदान में उनके जो समर्थक थे उनकी टोपी पे लिखा होता ” मैं भी अन्ना ”
अन्ना का वो आंदोलन कांग्रेस की सरकार के लिए नासूर बना हुआ था इसलिए हम लोगों को बहुत अच्छा लगता था । हम भी अन्ना के मुरीद हो गए ।
और हमरे पिछवाड़े में भी activism का कीड़ा नहीं बल्कि सांप है सो हम भी सपत्नीक पहुँच गए ……. सड़क पे जा खड़े हुए अन्ना के समर्थन में । उन दिनों अन्ना के चेले केजरीवाल और इसकी जो चांडाल चौकड़ी थी उनकी संस्था का नाम था IAC बोले तो India Against Corruption ……..
सो एक दिन जबकि आंदोलन अपने चरम पे था , तो हम दोनों पति पत्नी कुछ safed chart papers और water color ले के स्थीनीय Doaba college के सामने जा डटे और लगे अन्ना और केजरीवाल और AIC के समर्थन में पोस्टर बनाने ।
3 घंटे हम वहाँ रहे । बड़ा ही निराशाजनक अनुभव रहा । कॉलेज से सैकड़ों नहीं बल्कि हज़ारों लड़के लडकियां निकल रहे थे ……किसी ने हमारी तरफ देखा तक नहीं जबकि हम 20 – 25 पोस्टर बना के दीवारों पे लगा चुके थे । कॉलेज के प्राध्यापकों का एक झुण्ड भी हमारे सामने से निकल गया ……..

हमें बड़ी निराशा हुई ……. ये हाल है पंजाब के youth का ?
पंजाब के intelligentsia का ……. इतने ज्वलंत विषय जिसने पूरे देश में तहलका मचा रखा है …… जिस अन्ना केजरीवाल और AIC ने केंद्र की कांग्रेस सरकार की चूलें हिला रखी हैं उस मुद्दे के प्रति पंजाबियों का ये ठंडा response ??????? हम बेहद निराश थे ।

और उसके ठीक एक साल बाद , पूरे पंजाब में AAP और उसकी झाड़ू ही दिखती थी ।
दिल्ली के अलावा सिर्फ और सिर्फ एक प्रदेश ऐसा था जहां AAP के लिए अपार जनसमर्थन दिखा ।
सिर्फ एक साल में ऐसा क्या हुआ कि जिस पंजाब में अन्ना हज़ारे और अरविन्द केजरीवाल को कुत्ता नहीं पूछता था वही पंजाब रातों रात केजरीवाल का दीवाना क्यों हो गया ??????
इतना जनसमर्थन अचानक कहाँ से आया ?
AAP के लिए ये जन समर्थन सिर्फ पंजाब में ही क्यों आया ? देश के अन्य राज्यों में क्यों नहीं आया ?

मेरे लिए ये शोध का विषय था । मैंने चीज़ों को बड़ी बारीकी से देखना शुरू किया । वो कौन लोग हैं जो AAP ज्वाइन कर रहे हैं । कौन इनके नीति नियंता मने think tank हैं ?
Main stream media इनके बारे में क्या लिख रहा है ?
Social media में इनके मुखर समर्थक कौन लोग हैं ?

अंदर झाँकने पे मुझे बड़ी भयावह तस्वीर दिखाई दी ।
सबसे पहला बयान जिस से मैं चौकन्ना हुआ वो पंजाब पुलिस के ex DGP शशिकांत का था जो उसने पटियाला की एक जनसभा में दिया था 2013 में । उसमे उसने कहा की संत जरनैल सिंह भिंडरांवाले तो एक संत एक सोशल reformer थे और उनके रहते किसी की ये औकात नहीं थी कि drugs का सेवन कर लेता ।
ये बयान पढ़ मेरे कान alsatian कुत्ते की माफ़िक़ खड़े हो गए ।
एक आपिया एक दुर्दांत खालिस्तानी आतंकवादी का गुणगान कर रहा है ???????
फिर मैंने पूरे घटनाक्रम को इसी एंगल से देखना शुरू किया ।
UK और Canadaa में बैठे खालिस्तानियों की Fb वाल खंगालनी शुरू की …….
देखा कि AAP को पूरा जनसमर्थन और funding तो खालिस्तानियों से आ रही है ।

AAP के जनसमर्थन को समझने के लिए आपको पहले पंजाब की Socio Economic दशा दिशा को समझना पड़ेगा …….. पंजाब दरअसल एक किस्म का उन्नत बिहार है । जैसे बिहारी दिल्ली मुम्बई सूरत और लुधियाना में आप्रवासी मजदूर बन के जीवन यापन करता है वैसे ही पंजाबी इंग्लैंड अमेरिका कनाडा यूरोप ऑस्ट्रेलिया में जा के आप्रवासी मजदूर बन के खटता है । बिहारी अपने गाँव में बैठी बाप बीवी को मनियाडर भेजता है तो पंजाबी Western Union से । पंजाबी बिहारी को हिकारत से देखता है और इनको ” साला भैया ” बोलता है , तो england अमेरिका वाले इन पंजाबियों को देसी बुलाते हैं ।
पंजाबियों को मलाल रहता है कि साले बिहारियों ने आ के पंजाब गंदा कर दिया , slums में रहते हैं , ठीक उसी तरह वहाँ अंग्रेज इनको गरियाते हैं कि साले पंजाबियों ने आ के इंग्लॅण्ड गंदा कर दिया ।
जिस मोहल्ले में बहुत ज़्यादा पंजाबी रहते हैं , अंग्रेज वहाँ रहना पसंद नहीं करते ।
कहने का मतलब ये कि बिहारी और पंजाबी दोनों मूलतः आप्रवासी मजदूरी करने वाली कौमें हैं ( बिहारी से मेरा आशय हमेशा पूर्वांचल से रहा है , मने anything beyond lucknow )
तो मामला ये है कि यहां पंजाब में शायद ही कोई ऐसा घर होगा जहां का लड़का कहीं बिदेस में मजूरी न कर रहा हो और western Union से पैसा न भेजता हो । अब भैया जो मनियाडर भेजता है उसकी बात तो सुननी / माननी पड़ेगी न ???????
और उसकी समस्या ये है कि वो वहाँ England और Canada में खालिस्तानियों से घिरा है …….. उनके influence में है , उसे वहाँ दिन रात खालिस्तान का सपना दिखाया जाता है , गुरुद्वारों में तकरीरें सुनाई जाती हैं कि कैसे वहाँ पंजाब में सिख हिंदुओं की गुलामी कर रहे हैं और ये कि 1947 में नेहरू ने सिखों को धोखा दिया और खालिस्तान बनाने के वादे से मुकर गए । कहने का अर्थ ये कि NRI वहाँ जा के कब खालिस्तानी हो जाता है उसे पता ही नहीं चलता ।
तो 2013 में कनाडा UK में बैठे खालिस्तानियों को ये समझ आ गया कि एक ये नयी पार्टी आ गयी है जिसे पंजाब में मोहरा बनाया जा सकता है । और फिर अचानक ही रातों रात सभी NRI ( कृपया खालिस्तानी पढ़ें ) आपिये बन गए । और उनकी देखा देखी सारा पंजाब आपिया बन गया ।
आज भी आप यहां पंजाब आ के देख लीजिए ।
पंजाब का ये विस चुनाव यहां नहीं बल्कि कनाडा और UK से लड़ा जा रहा है ।
50,000 से ज़्यादा NRI ( खालिस्तानी ) छुट्टी ले के आये हुए हैं ।
वहाँ विदेश में बाकायदा विधानसभा वार चुनाव दफ्तर बाँय हुए हैं जहां बैठे volunteers यहां बैठे लोगों को फोन कर AAP को भोट देने की अपील कर रहे हैं । Fb और whatsapp पे हज़ारों हज़ारों group और pages बनाये गए हैं ।
दरअसल विदेश में बैठे खालिस्तानियों ने बहुत पहले मने 1994 – 95 में ही ये समझ लिया था कि पंजाब में कांग्रेस और अकाली – भाजपा दोनों ही उनकी दाल नहीं गलने देंगे । ऐसे में उनको केजरीवाल और इसकी AAP में एक संभावना दीखती है ।
पर एक बात तय है कि चुनाव बाद वहाँ बैठे खालिस्तानी इनसे बाकायदे इस समर्थन की कीमत वसूलेंगे ।
फिलहाल report ये है कि पंजाब के मालवा belt में AAP का जोर है ।
पिछले एक हफ्ते में इनकी स्थिति में बहुत सुधार हुआ है ।
खालिस्तानियों ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी है ।
मूर्ख पंजाबी समझ नहीं रहे कि वो आग से खेल रहे हैं ।

क्रमशः ……….